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"क्यों दें वोट"-बस्तर की विधवाओं ने मांगा इंसाफ, पूछा-"वे माओवादी थे, किसके पास सबूत"

Bastar Tribals: माओवादी हिंसा से प्रभावित बस्तर की विधवाएं क्यों छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 के बॉयकॉट की अपील कर रही हैं?

विष्णुकांत तिवारी & रौनक शिवहरे
छत्तीसगढ़ चुनाव
Published:
<div class="paragraphs"><p>Chhattisgarh Election: ‘किसके पास सबूत है कि वे माओवादी थे?’ बस्तर की विधवाओं का सवाल</p></div>
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Chhattisgarh Election: ‘किसके पास सबूत है कि वे माओवादी थे?’ बस्तर की विधवाओं का सवाल

(फोटो: क्विंट हिंदी)

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“जिस शख्स की शादी को दो दशक से ज्यादा हो चुके हों, जिसके पास आधार कार्ड, बैंक अकाउंट था और जो किराने की दुकान चलाता था, उसे अचानक माओवादी बताकर कैसे मार सकते हैं?”

छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh Election) के सुकमा जिले के ताड़मेटला गांव में अपने घर के बाहर खड़ी 37 साल की रवा सोढ़ी यह सवाल पूछती हैं. वह उस दिन की घटनाओं को याद करती हैं, जब उनके पति रवा देवा घर से निकले और फिर कभी वापस नहीं लौटे.

रवा सोढ़ी जैसी विधवाएं पूछ रही हैं कि उन्हें क्यों घर से निकलकर वोट देना चाहिए.

(फोटो: विष्णुकांत तिवारी/द क्विंट)

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव (Chhattisgarh Assembly elections) से पहले रवा सोढ़ी जैसी विधवाएं पूछ रही हैं कि उन्हें क्यों घर से निकलकर वोट देना चाहिए?

बस्तर के हरे-भरे जंगली इलाके के बीच बसा ताड़मेटला है, जहां 5 सितंबर 2023 को रवा देवा और सोढ़ी कोरसा का कथित तौर पर जबरन अंतिम संस्कार कर दिया गया था और पीछे दुख में डूबा परिवार और विधवाएं रह गईं. इन दोनों को कथित तौर पर माओवादी गतिविधियों से जुड़ा होने के आरोप में एक फर्जी एनकाउंटर में मार दिया गया था.

लेकिन कथित तौर पर उनका जबरन अंतिम संस्कार क्यों कर दिया गया?

इस सवाल का जवाब बस्तर के इतिहास में छिपा है– यह इलाका सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच संघर्ष का गवाह रहा है.

सरकार और हथियारबंद वामपंथी चरमपंथियों के बीच फंसे आदिवासियों की हालत एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई वाली है और उनके पास बचने का कोई रास्ता नहीं है. पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा स्थानीय निवासियों पर ज्यादती के आरोपों का लंबा इतिहास रहा है.

17 मई 2021 को सबसे हालिया मामला सामने आया था, जिसने बड़े पैमाने पर लोगों का ध्यान खींचा, जब तीन आदिवासियों–कवासी वागा, उइका पांडु और कोरसा भीमा को कथित तौर पर छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के सिलगेर गांव में 12 मई को लगाए गए सुरक्षा बलों के शिविर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों ने गोली मार दिया.

सरकार और हथियारबंद वामपंथी चरमपंथियों के बीच फंसे आदिवासियों की हालत एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई वाली है और उनके पास बचने का कोई रास्ता नहीं है.

(फोटो: रौनक शिवहरे/द क्विंट)

इस घटना के बाद बस्तर में सुरक्षा बलों के खिलाफ प्रदर्शन तेज हो गया. विरोध प्रदर्शन जारी रहने के बीच बस्तर से माओवादियों के एनकाउंटर और उनके झूठे होने के आरोपों के मामले सामने आते रहे हैं.

रवा देवा की विधवा रवा सोढ़ी ऐसी ही एक घटना का जिक्र कर रही हैं. वे कहती हैं...

“मेरे पति और कोरसा तिम्मापुरम में रहने वाले कोरसा के बहनोई से उधार लिए पैसे वापस मांगने सुबह 8 बजे घर से निकले. मगर बहनोई ने पैसे नहीं दिए तो उन्होंने उसे पैसे ताड़मेटला पहुंचाने के लिए कहा, और बाजार जाने के लिए उसकी बाइक उधार ली. वे चिंतलनार में गया सिंह की दुकान पर बाइक में तेल भरवा रहे थे, तभी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और चिंतलनार पुलिस स्टेशन ले गई.”

पुलिस ने दावा किया कि रवा देवा और सोढ़ी कोरसा माओवादी थे पर उनकी विधवाएं इस दावे का खंडन करती हैं.

(फोटो: विष्णुकांत तिवारी/द क्विंट)

पुलिस का दावा है कि रवा देवा और सोढ़ी कोरसा माओवादी थे, जिन पर इनाम था. वे माओवादी गतिविधियों में पूरी तरह शामिल थे और 5 सितंबर को दोनों तरफ से हुई गोलीबारी में मारे गए थे.

हालांकि, गांव वाले और परिवार के सदस्य इन दावों को पूरी खारिज करते हैं और कहते हैं कि दोनों फर्जी एनकाउंटर के शिकार हैं.

पुलिस के दावों को खारिज करते हुए सोढ़ी कहती हैं, ‘मेरे पति की हत्या 4 सितंबर 2023 की रात की गई थी, 5 सितंबर को नहीं.’

“जिस दिन मेरे पति की हत्या हुई, वह अपने जीजा से पैसे लेने काली शर्ट और हाफ पैंट में घर से निकले थे. वह कभी कहीं और नहीं गए, वह घर पर ही काम करते थे. वह कैसे नक्सली हो सकते हैं?”
सोढ़ी नंदे

रवा देवा के घर से महज 200 मीटर की दूरी पर सोढ़ी कोरसा की विधवा सोढ़ी नंदे रहती हैं, जिनका कहना है कि उनके पति पर झूठा आरोप लगाया गया और फर्जी एनकाउंटर में उन्हें मार दिया गया.

(फोटो: विष्णुकांत तिवारी/द क्विंट)

कोरसा के परिवार में उनकी पत्नी हैं, जिनके ऊपर अब अकेले अपने चार बच्चों को पालने की जिम्मेदारी आ गई है.

सोढ़ी नंदे आगे कहती हैं “हमारी छोटी सी राइस मिल है और इसके अलावा वह सिलाई का काम करते थे. इन सबके बाद भी वह नक्सली कैसे हो सकते हैं? वह कभी रात में बाहर नहीं जाते थे और हमेशा अपने काम में जुटे रहते थे. उनकी मौत को एक महीना बीत चुका है, और अब मुझे हमेशा यही फिक्र सताती है कि कैसे अकेले अपने बच्चों को पालूंगी.”

रवा सोढ़ी, सोढ़ी नंदे और सैकड़ों महिलाएं लंबे समय से जारी लड़ाई का खामियाजा भुगत रही हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई समाधान नहीं किया गया है.

बस्तर में फर्जी एनकाउंटर के कई बार लगे आरोप

सोमलु कोहरामी को पुलिस ने नक्सली बताया था और जुलाई 2023 में एक एनकाउंटर में सोमलु की मौत हो गई. उनके पीछे उनकी विधवा और तीन बच्चे रह गए हैं.

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव कवरेज के दौरान बीजापुर जिले के केशकुतुल गांव में जंगल के किनारे एक सुनसान घर में इस संवाददाता की कोहरामी के परिवार से मुलाकात हुई.

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छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव कवरेज के दौरान बीजापुर जिले के केशकुतुल गांव में जंगल के किनारे एक सुनसान घर में क्विंट के रिपोर्टर की कोहरामी के परिवार से मुलाकात हुई.

(फोटो: रौनक शिवहरे/द क्विंट)

कोहरामी की विधवा नंदे याद करती हैं कि कैसे उस दिन उनके पति बैलों को खोजने गए और फिर कभी नहीं लौटे, और उन्हें माओवादी करार दे दिया गया.

“मेरे पति सुबह 6.30 बजे अपने बैलों को ढूंढने गए थे और मुझे जुताई के लिए खेतों में पहुंचने को कहा था. मैंने सुबह 9 बजे तक इंतजार किया, लेकिन वह कभी नहीं लौटे. मन में चिंता लिए मैं घर लौट आई. बच्चों को खाना खिलाया और फिर उन्हें ढूंढना शुरू किया. एक गांव वाले ने मुझे बताया कि उसने मेरे पति को सुबह जंगल की ओर जाते देखा था और कुछ देर बाद गोलियों की आवाज सुनी और सुरक्षा बल के जवानों को एक शव को ले गए. डर के मारे मेरा दिल जोर से धड़कने लगा. मैंने भैरमगढ़ जाकर पता किया तो पता चला कि पुलिस ने उन्हें झूठ में माओवादी बताकर गोली मार दी.”

फर्जी एनकाउंटरों के पिछले मामलों में कोई कार्रवाई नहीं

बस्तर में कई पुलिस एनकाउंटर हुए हैं, जिनके बारे में शुरू में दावा किया गया था कि ये माओवादी ऑपरेशन थे, मगर बाद में न्यायिक आयोगों ने दावे को खारिज कर इन्हें फर्जी एनकाउंटर करार दिया.

इससे पहले, सितंबर 2021 में बीजापुर के एडेसमेट्टा गांव में हुए ऐसे ही एक एनकाउंटर की न्यायिक जांच की गई थी, जहां साल 2013 में आठ लोगों को गोलियों से भून दिया गया और उन्हें माओवादी करार दे दिया गया. लेकिन जांच में पता चला कि मारे गए लोग असल में माओवादी नहीं थे.

2012 में बीजापुर के सारकेगुड़ा में हुए एक और एनकाउंटर की न्यायिक जांच के नतीजों से भी पता चला था कि एनकाउंटर में मारे गए लोग माओवादी नहीं थे.

द क्विंट से बातचीत में बस्तर से रिपोर्टिंग करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है...सरकारें सुरक्षा बलों पर कार्रवाई करने से बचती हैं, जिससे कि वे हतोत्साहित न हों, लेकिन जरूरी नहीं कि यह कदम सही भी हो.

इस लड़ाई की विधवाएं चुनाव के बहिष्कार की हिमायत कर रही हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार ने उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए कुछ नहीं किया है.

(फोटो: विष्णुकांत तिवारी/द क्विंट)

विधवाएं इंसाफ और चुनाव के बहिष्कार की मांग कर रही

छत्तीसगढ़ पुलिस फर्जी एनकाउंटरों के दावों का खंडन करती है. उसका कहना है कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन प्रतिबंधित संगठन की माओवादी साजिश हैं. बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी कहते हैं...

"ताड़मेटला और केशकुतुल मामले में पुलिस पर लगाए गए आरोप निराधार हैं. हमने जांच की है; ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, जिसके आधार पर सिपाहियों या पुलिस पर शक किया जा सके. यह माओवादियों की चाल है, उनका जनाधार घट रहा है, इसलिए वे इस तरह की बातें कर रहे हैं. इस मामले की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दे दिए गए हैं."

इस लड़ाई की विधवाएं चुनाव के बहिष्कार की मांग कर रही हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सरकार ने उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए कुछ नहीं किया है.

ये विधवाएं इंसाफ और मुआवजे की भी मांग कर रही हैं, जिससे कि सुनिश्चित किया जा सके कि भविष्य में उनके बच्चों पर माओवादी होने का झूठा ठप्पा न लगाया जाए.

निराशा से भरी रवा सोढ़ी कहती हैं...

“मेरे पति अक्सर दोरनापाल और सुकमा जाते थे, और हर पुलिस कैंप में उनकी एंट्री थी. फिर भी उन पर माओवादी होने का झूठा आरोप लगाया गया और मार दिया गया. अगर वह माओवादी होते, तो क्या हमारे पास इतने सारे दस्तावेज होते?”

सोढ़ी नंदे कहती हैं, “मेरे पति को बाजार से उठा लिया गया और उनका एनकाउंटर कर दिया गया; हम ऐसे सिस्टम पर कैसे भरोसा कर सकते हैं? हम उन्हें कैसे वोट दे सकते हैं? हम कतई वोट नहीं देंगे.”

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