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"हम कहां जाएंगे?"- मणिपुर के चुराचांदपुर में 500 घरों को तोड़े जाने पर मैतेईयों का दर्द

चुराचांदपुर के 19 मैतेई बहुल गांवों में रहने वाले लगभग 15,000 मैतेई लोगों से या तो गांव खाली करा लिया गया है या वे भाग गए.

तनुश्री पांडेय
भारत
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<div class="paragraphs"><p>'हम कहां जाएंगे?' मणिपुर के चुराचांदपुर में घरों के तोड़े जाने के बाद विस्थापितों का दर्द</p></div>
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'हम कहां जाएंगे?' मणिपुर के चुराचांदपुर में घरों के तोड़े जाने के बाद विस्थापितों का दर्द

(फोटो: क्विंट हिंदी)

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आठ साल का खुमानथेम मंगल इम्फाल पूर्व के अकम्पट में मैतैई के लिए बने एक राहत शिविर में खेल रहा था, तभी कुछ अन्य विस्थापित बच्चों ने उसे एक तस्वीर दिखाई, जिसने खुमानथेम को अंदर से झकझोर कर रख दिया. तस्वीर मणिपुर (Manipur Violence) के चुराचांदपुर जिले के थेंगरा लीराक में बने उसके घर की थी. अब वहां घर की जगह केवल कंक्रीट और मलबा का ढेर पड़ा है.

उसके आंखों से आंसू बह निकले, लेकिन उसने अपने माता-पिता को यह बात नहीं बताने का फैसला किया. दिन भर बीतने के बाद, खुमानथेम अपने दुख को छुपा नहीं पाया और वह टूट गया. आखिरकार, वह एक बच्चा ही था. उसने अपने माता-पिता को टूटे घर की तस्वीर दिखा दी. तस्वीर देखकर उसके माता-पिता स्तब्ध रह गए.

लेकिन कुकी बहुल वाले चुराचांदपुर के गांवों में उनका एकमात्र मैतेई घर नहीं था, जिसे कथित तौर पर पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया था.

इंफाल पूर्व के कुकी बहुल इलाके हाओकिप वेंग में घर जला दिए गए.

(फोटो क्रेडिट: तनुश्री पांडे)

कीशम ने द क्विंट को बताया कि उन्होंने कंस्ट्रक्शन में काम करने वाले मजदूर के रूप में डबल शिफ्ट में काम करके-करके और जीवन की सारी जमा पूंजी लगाकर बड़ी मुश्किल से ये घर बनाया था. उनकी पत्नी रंजीता ने द क्विंट को बताया, ''वह पहली बार था, जब मैंने उन्हें रोते हुए देखा था.''

ऐसा शायद इसलिए है, क्योंकि जिस जगह उनका और उनके माता-पिता का जन्म हुआ था, उसी जगह पर शरणार्थी बनने की कठोर वास्तविकता कुछ ऐसी थी, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

"जब लड़ाई खत्म हो जाएगी, तो हम कहां जाएंगे?"

जुलाई में, मणिपुर सरकार ने राज्य भर के विभिन्न राहत शिविरों में रहने वाले विस्थापित मैतेई और कुकी-जो समुदाय का डेटा सुप्रीम कोर्ट को सौंपा था. उसके अनुसार, 3 मई को मणिपुर में बहुसंख्यक मैतेई और अल्पसंख्यक कुकी-जो समुदाय के बीच जातीय संघर्ष शुरू होने के बाद से चुराचांदपुर के 19 मैतेई बहुल गांवों में रहने वाले लगभग 15,000 मैतेई लोगों से या तो गांव खाली करा लिया गया या वे भाग गए.

राज्य भर से विस्थापित कुकियों की कुल संख्या 40,000 से अधिक है. चूराचांदपुर कुकियों का मुख्य गढ़ है, जो मुख्य रूप से पहाड़ियों में रहते हैं. दूसरी ओर, मैतेई ने घाटी क्षेत्रों (जैसे इंफाल) पर कब्जा कर लिया है.

विस्थापित कुकी और मेतैई वर्तमान में पूरे मणिपुर में विभिन्न राहत शिविरों में आश्रय मांग रहे हैं.

द क्विंट आपको यहां की और कुकी राहत शिविरों की कुछ कहानियों से रू-ब-रू करवा रहा है.

एक कहानी अकम्पट में मैतई के लिए बने राहत शिविर की है, जहां द क्विंट ने हाल ही में दौरा किया था. यहां एक गर्ल्स कॉलेज है, जिसमें अब चुराचांदपुर के 200 से अधिक विस्थापित परिवार रह रहे हैं.

कीशम कहते हैं कि...

"इस लड़ाई में केवल गरीब पीस रहे हैं, जो लगता है कि कभी खत्म नहीं होगा. हमने इस राहत शिविर में दयनीय स्थिति में चार महीने बिताए हैं, लेकिन कोई भी हमारे लिए नहीं आया."

इन परिवारों का एक कूड़े के ढेर के बगल में स्थित एक कॉलेज की जर्जर क्लास उनका अब नया 'घर' बन गया है. उन्होंने दीवारों पर कपड़े लगाकर छह बड़े कमरों को बांट लिया है, जिससे प्राइवेसी में रहने के लिए 4x4 रहने की जगह बन गई है.

राहत शिविरों में से एक में कीशम फ्रांसिस.

(फोटो क्रेडिट: तनुश्री पांडे)

राहत शिविर के प्रत्येक कमरे में, लगभग 30 परिवार रहते हैं. उनके गद्दे के पास ही खाना पकाने के लिए एक गैस स्टोव रखा है.
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शिविर में रहने वालों और प्रबंधकों के अनुसार, मणिपुर इंटीग्रिटी पर समन्वय समिति (COCOMI), समाजिक संगठन की देखरेख में राहत शिविर में न्यूनतम सरकारी भागीदारी नजर आती है.

बड़े हॉलों में से एक को राशन रखने की जगह बना दिया गया है, जहां बच्चे पढ़ और खेल सकते हैं. 150 से अधिक बच्चे अपना अधिकांश समय वहीं बिताना पसंद करते हैं, क्योंकि यह खिड़कियों और वेंटिलेशन वाला एकमात्र कमरा है.

उनकी पीड़ा इस अहसास के साथ और बढ़ गई है कि उनके पास घर बुलाने के लिए कोई अन्य जगह नहीं बची है.

"हमारा जन्म और पालन-पोषण चुराचांदपुर में हुआ. आज, हम उस क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं कर सकते और हमारे खून-पसीने से बनाए गए घर टूटी ईंटों और कंक्रीट के ढेर में बदल गए हैं. जब लड़ाई खत्म हो जाएगी, तो हम कहां जाएंगे? "
कीशम फ्रांसिस

"मैतेई के मकान एक-एक कर ढहाए गए"

कई FIR में, जो चुराचांदपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) कार्तिक मलादी द्वारा शुरू किए गए स्वत: संज्ञान मामले का हिस्सा हैं, यह आरोप लगाया गया है कि हिंसा के मद्देनजर मैतेई इलाकों में "व्यवस्थित रूप से घर ढहाए गए हैं."

क्विंट ने इसकी FIR देखी, जिसमें दावा किया गया है कि जिले के 19 मैतेई गांवों में से कम से कम सात पूरी तरह से तबाह हो गए हैं. (यहां 500 घर हैं) इनमें मंडोप लीकाई, नगाथल, डी फेलियान, थिंगकांगफाई, थेंगरा लीराक, खुमुजाम्बा और खुगा तम्पाक शामिल हैं.

चूड़ाचंदपुर में मैतेई बहुल बस्ती थेंगरा की बस्ती को उजाड़ दिया गया.

(फोटो क्रेडिट: तनुश्री पांडे)

क्विंट को पता चला है कि मुआवजे के लिए इन FIR की कॉपी मुख्यमंत्री कार्यालय के साथ भी साझा की गई है.

कीशम ने आरोप लगाया कि...

"चुराचांदपुर में कुछ मैतेई घरों को हमारी आंखों के सामने जला दिया गया लेकिन हमारे जाने के बाद, हमारे सहित कई अन्य मैतेई घरों को उपद्रवियों ने भारी मशीनरी का उपयोग करके व्यवस्थित रूप से जमींदोज कर दिया."

हाल ही में 9 सितंबर को दर्ज की गई FIR में अज्ञात युवाओं, नशा करने वालों और इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (आईटीएलएफ) के सदस्यों को शामिल किया गया है, जो मणिपुर में कुकी-जो समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले सबसे बड़े नागरिक समाज संगठनों में से एक है.

चुराचांदपुर में थेंगरा लीराक.

(फोटो क्रेडिट: तनुश्री पांडे)

एसपी मलाडी ने फील्ड पर जाकर जांच की, जिसके बाद ITLF का नाम FIR में जोड़ा गया.

ये FIR भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं में दर्ज की गई है. जिनमें धारा 143, 149 (गैरकानूनी सभा), धारा 380 (चोरी), धारा 427 (नुकसान या नुकसान पहुंचाने वाली शरारत), धारा 447 (आपराधिक अतिक्रमण), धारा 483 (किसी अन्य द्वारा उपयोग किए गए संपत्ति चिह्न की जालसाजी करना) और 34 (सामान्य इरादा) शामिल हैं.

द क्विंट से बात करते हुए, आईटीएलएफ के प्रवक्ता गिन्ज़ा ने कहा, "मैतेई घरों और बस्तियों के बड़े पैमाने पर उजाड़े जाने का कोई मतलब नहीं है, जैसे इंफाल में कुकी घरों में तोड़फोड़ और आग लगाने का कोई मतलब नहीं है."

"मुझे लगता है कि चूराचांदपुर में जो कुछ हुआ, वह इंफाल में कुकियों के साथ घटना का प्रतिशोध में था. भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता है और जिस भीड़ ने मैतेई के घरों को नष्ट किया, उसने गुस्से में ऐसा किया होगा, लेकिन आईटीएलएफ ने इसे मंजूरी नहीं दी. वास्तव में, आईटीएलएफ ने अपने सार्वजनिक नोटिस में कुकी-जो लोगों से कहा कि वे किसी भी मेतैई के घर को तब तक न छूएं जब तक कि कोई समाधान न हो."
गिन्ज़ा, ITLF प्रवक्ता

सीएम बीरेन सिंह का दावा, "ऐसी कोई क्षति नहीं हुई"

2 सितंबर को मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने इस दावे को खारिज कर दिया कि चुराचांदपुर में थेंगरा लीकाई के घरों को पूरी तरह से ढहाया गया. हालांकि, उन्होंने अन्य गांवों पर कोई टिप्पणी नहीं की.

"हम घर तोड़े जाने की कुछ घटनाओं से अवगत हैं और हम यहां नागरिकों को आश्वस्त करने के लिए हैं कि मामले की पूरी जांच की जाएगी. विस्थापित व्यक्तियों को उनकी मूल भूमि पर वापस बसाने की दिशा में कदम उठाए गए हैं."

सीएम ने बताया कि सरकार के पास इन आरोपों का खंडन करने वाले वीडियो सबूत हैं, जिनमें ऐसे घरों को जमींदोज करने वाली कोई घटना नहीं है. हालांकि, अभी तक किसी की गिरफ्तारी की खबर नहीं है.

राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने द क्विंट को बताया कि जो लोग कुकी और मैतेई दोनों पक्षों की संपत्तियों के तोड़फोड़ के जिम्मेदार पाए जाएंगे, जांच के बाद उनपर कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

इम्फाल ईस्ट के एसपी शिवकांत सिंह ने द क्विंट से पुष्टि की कि चुराचांदपुर में मैतेई घरों को ध्वस्त करने के अलावा, घाटी के इलाकों में हजारों कुकी घरों को जला दिया गया, लूट लिया गया और उनकों तोड़ा गया.

इसके अतिरिक्त, उन्होंने आश्वासन दिया कि आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों, जिन्होंने भूमि रिकॉर्ड, शैक्षिक प्रमाण पत्र और वित्तीय रिकॉर्ड जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज खो दिए हैं, उन्हें फिर से जारी किया जाएगा.

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सभी जिलाधिकारियों को प्रभावित व्यक्तियों के डॉक्यूमेंट जारी करने की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित तरीके से और जल्दी करने को कहा है.

इंफाल में न्यू चेकऑन, ये एक पूर्व कुकी-बहुल क्षेत्र, जहां आखिरी बचे कुकी एक सप्ताह पहले चले गए थे.

(फोटो क्रेडिट: तनुश्री पांडे)

"हम वापस जाना चाहते हैं"

चार महीने के संघर्ष के बाद, और राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 40,000 से अधिक सुरक्षा बलों को तैनात किए जाने के बावजूद हिंसा में लोगों की जान जा रही है.

राज्य में अब तक 200 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और लगभग हर दिन ताजा हिंसा के कारण मरने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है.

नंदिनी, चुराचांदपुर के खुमुजम्बा की एक विस्थापित मैतेई महिला, जो उन सात गांवों में से एक है, जिन्हें कथित तौर पर तबाह कर दिया गया है, अब अपनी मां और दो बच्चों के साथ खुद को इंफाल पूर्व राहत शिविर में रह रही हैं.

"चुराचांदपुर राज्य का एकमात्र आदिवासी जिला है, जहां सबसे बड़ी मैतेई आबादी निवास करती है. 3 मई को हिंसा के दौरान भी, मेरी मां, जो डिमेंशिया से पीड़ित हैं, हमारा घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. वह सवाल करती रहीं कि हमें उनके जन्म स्थान से क्यों भागना चाहिए."
नंदिनी, खुमुजाम्बा, चुराचांदपुर से मैतेई

उन्होंने बताया कि मां को जबरदस्ती वहां से ले जाया गया, क्योंकि वो घर छोड़कर जाना नहीं चाहती थीं. "उन्होंने तब से रोना बंद नहीं किया है और कहती रहती हैं कि वह घर वापस जाना चाहती हैं. मेरे पास उसे यह बताने की हिम्मत नहीं है कि हमारे घर पर बुलडोजर चला दिया गया है."

इस बीच, मणिपुर सरकार ने 9 सितंबर को कैबिनेट बैठक की और हिंसा प्रभावित पीड़ितों के लिए 75 करोड़ रुपये के घरों के निर्माण को मंजूरी दी.

लेखिक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं, जिन्होंने देश भर और विदेशों की ह्यूमन इंटरेस्ट की स्टोरी और इन्वेस्टिगेशन को कवर किया है. उन्हें 2023 में रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिल चुका है.

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