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ईरान-सऊदी के बीच 7 साल बाद संबंध बहाल: क्या था विवाद, पंच बने चीन को क्या फायदा?

Saudi Arabia-Iran:दोनों देशों ने फ्लाइट फिर से शुरू करने और नागरिकों के लिए यात्रा वीजा जारी करने पर भी चर्चा की.

मोहम्मद साकिब मज़ीद
दुनिया
Published:
<div class="paragraphs"><p>ईरान,सऊदी और चीन के विदेश मंत्री</p></div>
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ईरान,सऊदी और चीन के विदेश मंत्री

(फोटो- पीटीआई)

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सऊदी और ईरान (Saudi Arabia-Iran Relations) के बीच सात साल बाद राजनीतिक संबंध बहाल हो गए हैं. दोनों देश के विदेश मंत्रियों ने गुरुवार, 6 अप्रैल को मुलाकात की. खास बात है कि दोनों देशों के राजनयिक संबंधों को बहाल करने के लिए चीन ने मध्‍यस्‍थता की है. सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद (Prince Faisal bin Farhan Al Saud) और ईरान के विदेश मंत्री होसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन (Hossein Amir-Abdollahian) ने दूतावासों को फिर से खोलने, राजदूतों की नियुक्ति और ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रायसी के सऊदी अरब दौरे पर चर्चा करने के लिए बीजिंग में मुलाकात की.

दोनों देशों के बीच फ्लाइट सेवा फिर से शुरू करने और एक-दूसरे के नागरिकों के लिए यात्रा वीजा जारी करने पर भी चर्चा हुई.

आइए आपको यहां इन सवालों के जवाब देने की कोशिश करते हैं:

  • Saudi Arabia-Iran के बीच क्यों टूटे थे संबंध?

  • Saudi Arabia और Iran अब एक साथ क्यों आए हैं?

  • Saudi Arabia-Iran के बीच संबंध बहाल होने से चीन को क्या फायदा होगा?

Saudi Arabia-Iran के बीच क्यों टूटे थे संबंध?

सऊदी अरब द्वारा एक प्रमुख सऊदी शिया मौलवी को फांसी दिए जाने के बाद 2016 में ईरानी प्रदर्शनकारियों ने तेहरान में मौजूद सऊदी के दूतावास पर धावा बोल दिया था. इसके बाद सऊदी अरब ने ईरान के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह से काट दिया था.

रियाद और तेहरान मिडिल ईस्ट में प्रभुत्व स्थापित करने और यमन और सीरिया में गृह युद्ध जैसे मसलों पर एक दूसरे के खिलाफ रहे हैं.

इसके अलावा तेहरान यमन के हूती विद्रोहियों को तेहरान समर्थन देता है जबकि रियाद वहां की सरकार का समर्थन करने वाले एक सैन्य गठबंधन को सपोर्ट करता है.

साल 2019 में सऊदी और ईरान के बीच का तनाव काफी बढ़ गया था, जब एक प्रमुख सऊदी ऑयल प्लांट पर एक मिसाइल और ड्रोन हमला हुआ. इसकी वजह से क्रूड ऑयल उत्पादन पर खासा असर हुआ था. इस दौरान अमेरिका की ओर से कहा गया था कि हमला ईरान की निगरानी में हुआ था.

सऊदी अरब के अधिकारियों ने भी बार-बार ईरान के न्यूक्लिर प्रोग्राम पर भी शक जाहिर किया है. ईरान की तरफ से भी कहा जा चुका है कि सऊदी के लोग ही ईरान के लिए सबसे अहम टारगेट होंगे.

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Saudi Arabia और Iran एक साथ क्यों आए?

हाल के वर्षों में चीन ने ईरान और सऊदी अरब के साथ अच्छे आर्थिक संबंध बनाए हैं और दोनों देश दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले चीन के लिए तेल के एक अहम सप्लायर हैं. लेकिन यह पहली बार हुआ है, जब चीन ने मिडिल ईस्ट राजनीतिक उठापटक में कूटनीति समझौता करवाने के लिए हस्तक्षेप किया है.

ईरान के लिए यह समझौता राजनयिक संबंधों के नजरिए से काफी अहम है, वो अपने खिलाफ प्रेशर बनाने वाले गठबंधनों को आर्थिक मजबूती की उम्मीद के साथ औपचारिक रूप से कम करना चाहता है.

अगर सऊरी अरब के नजरिए से देखा जाए तो, यह समझौता ऐसे वक्त में हो रहा है, जब वाशिंगटन और रियाद के बीच पिछले दिनों तनावपूर्ण संबंध देखे गए, जिससे अमेरिका की तरफ से सुरक्षा गारंटी भी घटती नजर आ रही है.

रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia Ukraine War) के दौरान कच्चे तेल की कीमतों को बनाए रखने के लिए तेल उत्पादन में कटौती को लेकर भी सऊदी और ईरान के बीच तनाव देखा गया. इस तरह से देखा जाए तो ईरान के साथ समझौता करना, सऊदी को फायदा दे सकता है.

सऊदी अरब को उम्मीद है कि वह एक नागरिक परमाणु कार्यक्रम विकसित करने के लिए सुरक्षा गारंटी और ग्रीन सिग्नल हासिल करने अमेरिका पर दबाव बढ़ा सकेगा.

दोनों देशों के बीच समझौता एक तरफ और इशारा करता है. Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने 2015 के न्यूक्लियर समझौते (डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा 2018 में इसे खत्म कर दिया गया था) को फिर से लागू करने के दो साल के असफल अमेरिकी प्रयासों के बाद अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू किया.

हालांकि, एक क्रूर शासन और आंतरिक तनाव की वजह से ईरान अपने लक्ष्यों को पूरा करने में कामयाबी नहीं हासिल कर सका है. ऐसे कार्यों के लिए सहयोगी खोजना ईरान के लिए बहुत जरूरी है.

Saudi Arabia-Iran के बीच संबंध बहाल होने से चीन को क्या फायदा होगा?

अमेरिका ने लंबे वक्त से पश्चिम एशिया में अपना काफी प्रभाव बनाया है. यह प्रमुख वैश्विक शक्ति रही है, जिसका संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों की भू-राजनीति पर खासा असर रहा है.

The New York Times की रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों के साथ संबंध बनाए रखे हैं और यह डील इस इलाके में चीन के बढ़ते राजनीतिक और आर्थिक दबदबे की ओर इशारा करती है. रिपोर्ट के मुताबिक वॉशिंगटन के Atlantic Council में मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के सीनियर फेलो Jonathan Fulton ने कहा कि चीन इस इलाके में स्थिरता चाहता है, क्योंकि पश्चिमी एशिया के देश अपनी ऊर्जा का 40 प्रतिशत से अधिक खाड़ी से प्राप्त करते हैं और दोनों (ईरान और सऊदी अरब) के बीच तनाव उनके हितों को खतरे में डालता है.

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक बराक ओबामा के राष्ट्रपति काल के दौरान राजनयिक रहे डेनियल रुसेल ने कहा कि यह कदम ग्लोबल स्टेज पर चीन की एक बड़ी कूटनीतिक भूमिका निभाने की ख्वाहिश को दर्शाता है.

फारस की खाड़ी विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में चीनी उत्पादों, निवेश और बुनियादी ढांचे के लिए आकर्षण का एक केंद्र रहा है. चीन की इस महत्वकांक्षा को खाड़ी के राजशाही में कई राष्ट्रीय पहलों से बल भी मिला है.

इसमें सऊदी विजन (Saudi Vision 2030) भी शामिल है, जो खाड़ी अर्थव्यवस्थाओं में जान फूंकने और उन्हें तेल व्यापर से आगे अपना अस्तित्व खड़ा करने के तैयार करना चाहता है. इसने अक्षय ऊर्जा, उपग्रह प्रौद्योगिकी और 5G प्रौद्योगिकी पर चीन-खाड़ी सहयोग को और अधिक आसान बनाया है.

डरहम यूनिवर्सिटी (Durham University) के बेंजामिन ह्यूटन ने अपने एक रिसर्च पेपर में लिखा है कि यह क्षेत्र कई अन्य कारणों से भी चीन के लिए महत्वपूर्ण है. घरेलू स्तर पर, बीजिंग यह चिंता जताता रहा है कि अल्पसंख्यक उइगर मुसलमान (इसमें से ज्यादातर झिंजियांग के उत्तर-पश्चिमी प्रांत में रहते हैं) चरमपंथी, आतंकवादी या अलगाववादी गतिविधियों में भाग ले सकते हैं. लेकिन उन पर सरकारी कार्रवाई, निगरानी और क्रूरता की नीतियों ने पश्चिमी देशों के दावों को हवा दी है कि बीजिंग उइगर मुसलमानों के मानवाधिकारों का गला घोंट रहा है.

दूसरी तरफ फारस की खाड़ी कई प्रभावशाली मुस्लिम देशों के लिए अहम है. ईरान और सऊदी अरब दोनों ही इस्लाम के सच्चे रहनुमा होने का दावा करते हैं. ऐसे में चीन की सरकार ने झिंजियांग में अपनी नीतियों को सही ठहराने के लिए इन राज्यों के साथ अपने संबंधों का हवाला दे सकती है.

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