(फोटो: The Quint)
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नोटबंदी से इकोनॉमी को झटका लगना तो तय है

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को कहा कि नोटबंदी के चलते बिजनेस को हुए नुकसान और छंटनी की खबरें गलत हैं. उन्होंने कहा कि दिसंबर में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों में हुई बढ़ोतरी इस बात की गवाही देती हैं कि अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है. लेकिन क्या सच में ऐसा है?

अमेरिका से शुरू हुए ग्लोबल वित्तीय संकट के चलते अक्टूबर-दिसंबर 2008 तिमाही और जनवरी-मार्च 2009 तिमाही में देश की ग्रॉस डोमेस्टिक प्रॉडक्ट (जीडीपी) ग्रोथ 5.8% रह गई थी. नोटबंदी के चलते पिछले तीन महीनों की ग्रोथ उससे भी कम हो सकती है.

हमारे सहयोगी न्यूज वेबसाइट ब्लूमबर्ग क्विंट में लिखे एक कॉलम में आईआईएम कलकत्ता में विजिटिंग फैकल्टी दीप नारायण मुखर्जी ने बताया है कि इस वित्त वर्ष की दूसरी छमाही यानी अक्टूबर 2016 से मार्च 2017 के बीच ग्रोथ 2-5% के बीच रह सकती है.

हालांकि सरकारी एजेंसी सीएसओ ने वित्त वर्ष 2016-17 में 7.1% ग्रोथ का अंदाजा लगाया है, लेकिन इसमें नोटबंदी के असर को शामिल नहीं किया गया है. वित्त मंत्री के दावे की तरह सरकारी एजेंसी का अनुमान भी हवा-हवाई है. क्या आपने कभी सोचा है कि जीडीपी पर इतनी चर्चा क्यों होती है?

सिर्फ नंबर नहीं है जीडीपी

जीडीपी सिर्फ एक संख्या नहीं है. जीडीपी ग्रोथ में अचानक बड़ी गिरावट आने पर कंपनियों का मुनाफा घट जाता है, वे कम लोगों को काम पर रखती हैं और कई कंपनियां छंटनी भी करती हैं. जब लोगों को नौकरी बने रहने का भरोसा नहीं रहता, तब वे कंजूसी से पैसे खर्च करते हैं. 2008-09 में हम यह देख चुके हैं.

हाल में कई ऐसे आंकड़े आए हैं, जो ग्लोबल आर्थिक संकट की याद दिला रहे हैं. मसलन सर्विस सेक्टर को लीजिए, जिसमें दूरसंचार और बैंकिंग जैसे क्षेत्र आते हैं. देश की अर्थव्यवस्था में इसका 60% योगदान है. इसका हाल बताने वाला निक्केई इंडिया सर्विसेज परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) पिछले दो महीनों से मंदी में है. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का भी ऐसा एक सूचकांक है, जो दिसंबर में मंदी में चला गया.

उद्योग-धंधे का चक्का जाम

उधर, कोयला, कच्चा तेल, गैस, पेट्रोल-डीजल जैसे रिफाइनरी प्रॉडक्ट्स, खाद, स्टील, सीमेंट, बिजली जैसे 8 क्षेत्रों वाले कोर सेक्टर का उत्पादन पिछले साल नवंबर में 4.9% बढ़ा. इस पर नोटबंदी की चोट दिसंबर के आंकड़ों में नजर आएगी, जिसका ऐलान इस महीने की आखिरी तारीख को किया जाएगा.

इसमें भी कंजम्पशन ग्रोथ का संकेत देने वाले स्टील और सीमेंट सेक्टर की हालत बहुत खराब है. नवंबर में स्टील उत्पादन 5.6% बढ़ा, जिसमें अगस्त-अक्टूबर के बीच 17% की बढ़ोतरी हुई थी. सीमेंट प्रॉडक्शन तो नवंबर में सिर्फ आधा पर्सेंट बढ़ा. 2008-09 में कोर सेक्टर की ग्रोथ 2.7% थी. वित्त वर्ष 2017 में इसका आंकड़ा आसपास रहे तो चौंकिएगा मत.

इंडस्ट्री की नब्ज बताने वाले औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में कोर सेक्टर का वेटेज 38% है और उसका भी चक्का जाम है. आईआईपी में पिछले साल अप्रैल से अक्टूबर तक 0.3% की गिरावट आई थी, जबकि एक साल पहले की इसी अवधि में यह 4.8% बढ़ा था. 2008-09 में इसमें 2.6% की बढ़ोतरी हुई थी यानी इस मामले में भी हाल वैश्विक आर्थिक संकट वाले दौर से बुरा है.

कब नॉर्मल होगी इकोनॉमी

2008-09 में प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करने वालों के अंदर पहली बार बेरोजगार होने का डर बैठा था. हाल यह था कि अचानक सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन बढ़ गए थे. तब शायद पहली बार प्राइवेट कंपनियों में काम करने वालों के अंदर तनख्वाह में कटौती और नौकरी जाने का डर पैदा हुआ था. नोटबंदी से पैदा हुआ आर्थिक संकट वैसा नहीं है, क्योंकि कुछ महीनों में अर्थव्यवस्था के ‘नॉर्मल’ होने की उम्मीद की जा रही है.

2008-09 संकट से भी देश दो तिमाहियों के बाद बाहर आ गया था, लेकिन उसके लिए सरकार को उद्योगों को टैक्स छूट देनी पड़ी थी. रिजर्व बैंक ने तब ब्याज दरों में कई बार कटौती की थी, ताकि सस्ते लोन से निवेश बढ़े और लोग हाथ खोलकर पैसे खर्च करें. नोटबंदी के बाद लोगों के पास बहुत कम कैश आ रहा है. इससे कंजम्पशन में जैसी कमी आई है, वैसी 2008-09 में भी नहीं दिखी थी.

कंजम्पशन भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है. जब तक इसमें बढ़ोतरी नहीं होती, कंपनियां निवेश नहीं करेंगी, जो अर्थव्यवस्था की दुखती रग है. सिर्फ सरकार के खर्च बढ़ाने से जीडीपी ग्रोथ में तेजी नहीं आएगी. वैसे भी उसे वित्तीय घाटे को काबू में रखना है.