बीजेपी की लिस्ट में मुसलमानों से परहेज, एंटी इंकम्बेंसी का डर
बीजेपी की  लिस्ट में मुसलमानों से परहेज, एंटी इंकम्बेंसी का डर 
(फोटो: PTI)

बीजेपी की लिस्ट में मुसलमानों से परहेज, एंटी इंकम्बेंसी का डर

बीजेपी ने बिहार में 17 उम्मीदवार समेत देशभर में 201 उम्मीदवारों के नाम तय कर चुनावी बिसात बिछाना शुरू कर दिया है. आलाकमान ने छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में मौजूदा सांसदों पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' कर दी है, तो वह महाराष्ट्र जैसे राज्य में ऐसे कदमों से बचती भी दिखी है. यूपी में मौसम देखकर चाल चली गई है तो असम, उत्तराखण्ड जैसे राज्यों में पार्टी थोड़ी सशंकित नजर आ रही है.

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नुकसान पहुंचाने में सक्षम नेताओं को पार्टी ने नहीं छेड़ा है- जैसे साक्षी महाराज, जनरल वीके सिंह, महेश शर्मा आदि. खास बात यह है कि बीजेपी ने मुसलमानों से दूर दिखने की कोशिश जारी रखी है.

बात छत्तीसगढ़ और राजस्थान से शुरू करते हैं. इन राज्यों में बीजेपी ने पांच महीने पहले ही सरकार गंवाई थी. छत्तीसगढ़ में पार्टी के 11 में से 10 सांसद हैं. 5 उम्मीदवारों की लिस्ट आ चुकी है. सभी नए उम्मीदवार हैं. मौजूदा सांसदों पर छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हारने का ठीकरा फोड़ा गया है. पार्टी ने यह भी मान लिया है कि रमन सिंह सरकार की हार के पीछे सांसदों का प्रदर्शन जिम्मेदार था और 2019 में भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है.

हालांकि राजस्थान में बीजेपी ने ज्यादा कड़े कदम नहीं उठाए हैं. यहां 25 से 16 लोकसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों का ऐलान हो चुका है. केवल एक सीट पर उम्मीदवार बदला गया है.

छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव के दौरान भी टिकट बांटते समय आलाकमान की 'उदारता' वसुंधरा राजे सिंधिया के लिए बनी हुई थी. इसका खामियाजा पार्टी ने भुगता भी, मगर ना उसकी कभी चर्चा हुई और ना ही होने की कोई संभावना है. छत्तीसगढ़ में 49 विधायकों में से 14 के टिकट काटे गए थे, तो राजस्थान में 163 विधायकों में से करीब 50 विधायक बेटिकट हुए थे. ज्यादातर विधायकों को दोबारा चुनाव लड़ने का मौका देने का मतलब ये हुआ कि आलाकमान को हार के बाद पता चला कि बीजेपी सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी चल रही थी.

यूपी में भी डरी हुई दिख रही है बीजेपी

यूपी में 28 उम्मीदवारों की घोषणा हुई है. इनमें से 6 सांसदों को बेटिकट किया गया है. हालांकि तैयारी और सांसदों के भी टिकट काटने की थी, लेकिन जनरल वीके सिंह, साक्षी महाराज सरीखे सांसद बच गए हैं. यूपी में जिन 6 सांसदों को बेटिकट होना पड़ा है, उनमें आगरा से राम शंकर कठेरिया, मिश्रिक से अनुज बाला, सम्भल से सत्यपाल सैनी, फतेहपुर सीकरी से चौधरी बाबूलाल, शाहजहांपुर से कृष्णराज और हरदोई से अंशुल वर्मा शामिल हैं. इन सांसदों की जगह क्रमश: एसपी बघेल, अशोक रावत, परमेश्वर लाल सैनी, राज कुमार चाहर, अरुण सागर और जय प्रकाश रावत को चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिए गए हैं. मतलब साफ है कि जो सांसद टिकट कटने के बाद नुकसान पहुंचा सकते थे, उन्हें छेड़ा नहीं गया है.

लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद केंद्रीय मंत्री बनीं स्मृति ईरानी पर आलाकमान मेहरबान है. वहीं, राजनाथ सिंह को भी सहते रहने का इनाम मिला है. जनरल वीके सिंह को गाजियाबाद में विरोध के बावजूद पार्टी ने अनर्गल बयान देते रहने के लिए पुरस्कृत किया है.

मथुरा से हेमामालिनी को भी इस चुप्पी के लिए पारितोषिक प्राप्त हुआ है कि एक टीवी एक्ट्रेस हारकर भी मंत्री बन सकती है लेकिन एक सफल अभिनेत्री और लंबे समय से पार्टी की सांसद होकर भी वह मंत्री नहीं बन सकीं. इन उदाहरणों का एक मतलब ये भी निकलता है कि डरे-सहमे हुए नेता बीजेपी आलाकमान को खूब पसंद हैं. बदायूं में बीजेपी ने स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य को उम्मीदवार बनाया है. वह समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव को चुनौती देंगी.

बीजेपी में 'एलर्जी' पैदा करेगा आडवाणी से दुर्व्यवहार

लालकृष्ण आडवाणी को टिकट ना देने की काफी चर्चा हो रही है. यह चर्चा इसलिए है क्योंकि जो लालकृष्ण आडवाणी विरोधी दलों का खौफ हुआ करते थे, उस खौफ को खुद बीजेपी ने ही खत्म कर दिया. जिन्हें विरोधी दल नहीं हरा पा रहे थे, उन्हें बीजेपी ने चुनाव मैदान से ही हटा दिया. संसद में 92 फीसदी उपस्थिति के बावजूद पार्टी के संस्थापक और मार्गदर्शक नेता को बेटिकट किया जाना उनकी बेइज्जती करने जैसा जरूर है. यह बीजेपी के समर्पित और अनुशासित कार्यकर्ताओं के लिए नकारात्मक संदेश है. बीजेपी के इस कदम से पार्टी कार्यकर्ताओं में एक 'एलर्जी' जरूर पैदा होगी.

सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या बीजेपी के मौजूदा अध्यक्ष को खुद की खातिर लालकृष्ण आडवाणी का टिकट काटना चाहिए था? अमित शाह को राज्यसभा सांसद बने अभी दो साल भी नहीं हुए हैं. उनका चार साल का कार्यकाल बाकी है. फिर लोकसभा पहुंचने के लिए यह बेताबी क्यों? वह भी आडवाणी का टिकट काटकर, जिनके लिए अमित शाह कभी बूथ संभाला करते थे. यह फैसला देश में पार्टी के किस हिस्से में एलर्जी के कारण पैदा होने वाले चकत्ते पैदा करेगी, यह देखने वाली बात होगी.

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असम-उत्तराखण्ड में भी लग रहा है डर

एंटी इंकम्बेंसी से निपटने के लिए बीजेपी ने असम मे 8 घोषित उम्मीदवारों में से 3 मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए हैं. असम वह राज्य है जहां एनआरसी एक्ट के बाद बहुत हंगामा बरपा. यहां तक कि सहयोगी दल एजीपी भी छिटक गई, हालांकि बाद में वह एनडीए में लौट आई. गुवाहाटी में सांसद विजय चक्रवर्ती की जगह पार्टी ने क्वीन ओझा के रूप में महिला उम्मीदवार को टिकट दिया है. वहीं, मंगलदोई सीट से सांसद रमेन डेका और जोरहाट से बीजेपी सांसद कामख्या प्रसाद तासा के टिकट भी काट दिए गए हैं.

उत्तराखण्ड में गढ़वाल और नैनीताल से मौजूदा सांसदों को टिकट नहीं दिया गया है. इन सीटों पर बीसी खंडूड़ी और भगत सिंह कोश्यारी जैसे कद्दावर नेताओं के टिकट कटे हैं. गढ़वाल से तीरथ सिंह रावत को उम्मीदवार बनाया गया है तो नैनीताल से अजय भट्ट पार्टी के उम्मीदवार होंगे.

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महाराष्ट्र में नहीं है एंटी इंकम्बेंसी या लाचार है बीजेपी?

महाराष्ट्र में बीजेपी ने 16 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं. इनमें सिर्फ दो सांसदों के टिकट कटे हैं. अहमदनगर सीट से दिलीप गांधी और लातूर से सुनील गायकवाड़ को टिकट नहीं दिया गया है. महाराष्ट्र ऐसा राज्य है जहां किसानों ने बड़े प्रदर्शन किए और यहीं भीमा-कोरेगांव जैसी घटना भी घटी. फिर भी बीजेपी एंटी इंकम्बेंसी स्वीकार नहीं कर रही है तो इसके पीछे उसकी लाचारी ज्यादा है. पार्टी को आईना दिखाते रहने वाले नितिन गडकरी को छूने की हिम्मत भी पार्टी नहीं कर सकी. वह नागपुर से चुनाव लड़ेंगे. हालांकि शिवसेना से गठबंधन हो जाने के बाद बीजेपी आलाकमान के पास आत्मविश्वास भी लौटा है.

बीजेपी की मजबूरी मुसलमानों से दूरी?

बीजेपी ने अभी तक 20 राज्यों में 184 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं. इन नामों को देखकर ये साफ लगता है कि बीजेपी को मुस्लिम उम्मीदवारों से परहेज है. उत्तर प्रदेश में जिन 28 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की गई है, उनमें एक भी मुसलमान नहीं है. छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तराखण्ड समेत बाकी राज्यों में भी मुसलमानों को टिकट देने से बीजेपी बची है. कश्मीर में जरूर दो मुसलमान उम्मीदवार बनाए हैं. इसके अलावा लक्षद्वीप की एकमात्र सीट पर भी मुसलमान उम्मीदवार बनाया गया है. अगर बिहार की बात करें, जहां नाम तय हो चुके हैं और गठबंधन के सहयोगी दलों के पास उचित रूप से सार्वजनिक करने के लिए भेज दिए गए हैं, तो यहां भी बीजेपी ने एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं बनाया है. भागलपुर से चुनाव लड़ने वाले शाहनवाज हुसैन बेटिकट रह गए हैं. यह सीट पार्टी ने जेडीयू को दे दी है.

मेहमान उम्मीदवार भी देती दिखी बीजेपी

मेहमान उम्मीदवार वो होते हैं जो चुनाव के मौके पर अपनी पार्टी छोड़कर टिकट लेने के एवज में ही नई पार्टी ज्वाइन करते हैं. बीजेपी ने ऐसे मेहमान उम्मीदवारों का भी उदारता से स्वागत किया है. कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार में मंत्री रहे ए मंजू हासन लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे. वह एचडी देवगौड़ा के पोते प्रज्जवल रवन्ना से मुकाबला करेंगे. लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ कलबुर्गी में भी बीजेपी ने कांग्रेस से आए उमेश जाधव को उम्मीदवार बनाया है.

बीजेपी की सूची में संतान उम्मीदवार भी

बीएस येदियुरप्पा के बेटे बी वाई राघवेन्द्र को शिवमोगा से टिकट दिया गया है. यूपी के बदायूं में बीजेपी ने स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य को उम्मीदवार बनाया है. वह समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव को चुनौती देंगी. हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए सुजय विखे पाटिल को अहमदनगर से उम्मीदवार बनाया गया है. सुजय विखे के पिता राधाकृष्ण विखे पाटिल महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं.

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