रोज का डोज : कहां शौर्य, शहादत की वो रात और कहां ये सियासी अंधकार
शहीद हेमंत करकरे पर प्रज्ञा ठाकुर के बयान से बवाल मच गया है
शहीद हेमंत करकरे पर प्रज्ञा ठाकुर के बयान से बवाल मच गया है(फोटो : अल्टर्ड बाई क्विंट)

रोज का डोज : कहां शौर्य, शहादत की वो रात और कहां ये सियासी अंधकार

एक टोयोटा एसयूवी की पीछे की सीट पर हेड कॉन्सटेबल अरुण जाधव थे. उनकी बांह और कंधे से खून रिस रहा था. उनके ऊपर एक जख्मी और दो शहीद हो चुके कॉन्सटेबल्स की बेजान देह थी. बीच की सीटों पर मुंबई की एंटी टेरर यूनिट के चीफ थे. सीने में गोलियां लगी थीं. उनका चेहरा कार विंडो की तरफ लुढ़क रहा था. आगे की सीटों पर गोलियों से छलनी दो पुलिस ऑफिसर और थे. अजमल कसाब और इस्माइल खान ने तीन अफसरों को कार से निकालकर सड़क पर फेंक दिया. पीछे का दरवाजा नहीं खोल पाए तो शवों के साथ ही कार लेकर निकल गए.

ये 26 नवंबर, 2008 की रात थी. इस कार की बीच की सीट पर जिस जांबाज अफसर का शव पड़ा था उनका नाम था हेमंत करकरे. मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था. हमले में 166 लोगों की मौत हुई थी. अब बीजेपी की एक नेता का कहना है कि ये हमला उनके श्राप के कारण हुआ था. हेमंत करकरे ने देश के लिए अपने प्राण नहीं न्यौछावर किए थे, बल्कि उनके श्राप के कारण आतंकवादियों ने उनका अंत किया था.

सच्चाई ये है कि हेमंत करकरे के साथ 6 वर्दी वाले मुंबई शहर को बचाने निकले थे और इस कोशिश में अपनी जान दे दी. लेकिन इसे अपने श्राप का नतीजा बताने वाली वो नेता हैं जिन्हें बीजेपी ने भोपाल की नुमाइंदगी करने का दावेदार बनाया है, अपना उम्मीदवार बनाया है. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर.

उस समय मैंने करकरे से कहा था कि तेरा सर्वनाश होगा, उसी दिन से सूतक लग गया था और सवा माह के भीतर ही आतंकवादियों ने उसे मार दिया था. हिंदू मान्यता है कि परिवार में किसी का जन्म या मृत्यु होने पर सवा माह का सूतक लगता है. जिस दिन करकरे ने सवाल किए, उसी दिन से उस पर सूतक लग गया था, जिसका अंत आतंकवादियों द्वारा मारे जाने से हुआ.
साध्वी प्रज्ञा सिंह, बीजेपी नेता

प्रज्ञा की बेतुकी बातें जब बाहर आईं तो आग लग गई. सियासत से लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा मच गया. कोई कैसे शहीदों का खुलेआम अपमान कर सकता है? कोई ऐसा कैसे चुनाव लड़ सकता है? कांग्रेस ने कहा - मोदी माफी मांगे. केजरीवाल बोले - बीजेपी का असली चेहरा सामने आ गया. शाम होते-होते बीजेपी घिर गई. चिट्ठी जारी किया.

भारतीय जनता पार्टी का स्पष्ट मानना है कि स्वर्गीय श्री हेमंत करकरे आतंकवादियों से बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. भाजपा ने उन्हें हमेशा शहीद माना है. जहां तक साध्वी प्रज्ञा के संदर्भ में बयान का विषय है. वह उनका निजी बयान है जो वर्षों तक उन्हें हुई शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के कारण दिया गया होगा.
बीजेपी का बयान

यानी इतनी फजीहत के बाद भी बीजेपी ने साध्वी पर कोई एक्शन नहीं लिया. बल्कि दबे शब्दों में उनके बयान का बचाव ही किया और साथ ही निजी बयान बताकर खुद का पल्ला झाड़ लिया. एक टीवी चैनल से साध्वी ने ये भी कहा कि अगर उनके बयान से दुश्मन को फायदा हो रहा है तो वो अपना बयान वापस लेती हैं. मतलब साफ है उन्हें इस बात का दुख नहीं है कि उन्होंने गलत बोला. शर्मनाक. धिक्कार!

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शायद ही इस देश में चुनावी बयानबाजी का स्तर इतना गिरा हो! चुनाव जीतने के लिए सबकुछ दांव पर लगाया जा रहा है. सैनिकों का सम्मान. देश के हीरोज की शहादत. सबकुछ चुनावी बाजार में बेचा जा रहा है. खुद देश के प्रधानमंत्री पुलवामा और बालाकोट के शहीदों-सैनिकों के नाम पर वोट मांग रहे हैं. सेना के शौर्य को बेचकर वोट खरीदने की कोशिशें पार्टी के तमाम नेता कर रहे हैं. योगी तो देश की सेना को मोदी की सेना तक बता चुके हैं. लेकिन सैनिकों के प्रति सम्मान का पाखंड तब खुल जाता है जब प्रज्ञा ठाकुर पर एक्शन लेने की बारी आती है.

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प्रियंका का शिवबंधन

मुंबई में प्रियंका चतुर्वेदी को शिवसेना में शामिल कराते शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे
मुंबई में प्रियंका चतुर्वेदी को शिवसेना में शामिल कराते शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे
फोटो : पीटीआई

टीवी डिबेट के दौरान कभी 4 तो कभी 8 हिस्सों में बटी स्क्रीन की किसी एक खिड़की में प्रियंका चतुर्वेदी अब भी दिखेंगी. उस खिड़की के नीचे नाम तो उनका ही होगा लेकिन उसके आगे कांग्रेस प्रवक्ता के बजाय शिवसेना का पता लिखा होगा. ऐन चुनावों के बीच पिछले 10 सालों से कांग्रेस में रहीं प्रियंका चतुर्वेदी शिवसेना में शामिल हो गईं.

प्रियंका ने कांग्रेस अध्यक्ष को लिखी  चिट्ठी में पार्टी छोड़ने की वजह बताई. बताया कि वो मथुरा में बदसलूकी करने वाले कुछ कांग्रेसियों को वापस पार्टी में लेने से खफा हैं.

प्रियंका आम चुनावों के बीच ही धुर विरोधी खेमे में चली गई हैं तो ये भी याद रखना होगा कि टिकट का टंटा हर तरफ चल रहा है. खबरें यहां तक आई थीं कि प्रियंका संजय निरुपम की सीट से लड़ना चाहती थीं. उधर मुंबई में चुनाव की तारीख (29 अप्रैल) में अभी वक्त है. वही मुंबई जहां की प्रियंका रहने वाली हैं, वही जगह जहां शिवसेना है. ये अलग बात है कि शिवसेना पहले ही मुंबई की सारी सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर चुकी है.

बहरहाल, प्रियंका के जाने से कांग्रेस को झटका तो लगा है. मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला के बयान में इसकी टीस भी दिखी. उन्होंने कहा - ये हमारे लिए पीड़ादायक है. मैं इतना जरूर कहूंगा कि ये मेरी लीडरशिप के बारे में भी कुछ बताता है.

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माया-मुलायम की दोस्ती, बीजेपी का दर्द

मैनपुरी रैली में एक दूसरे का अभिवादन करते माया-मुलायम
मैनपुरी रैली में एक दूसरे का अभिवादन करते माया-मुलायम
फोटो : पीटीआई

एक चौथाई सदी की दुश्मनी भूल मायावती और मुलायम साथ हो गए. मैनपुरी में मंच साझा किया. एक दूसरे की तारीफों के कसीदे कढ़े. माया ने मुलायक में असली पिछड़ा तो मोदी को फर्जी पिछड़ा करार दिया. मुलायम ने कहा- माया के अहसानमंद रहेंगे. ये वही माया-मुलायम हैं जो एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे. 1995 में लखनऊ के गेस्ट हाउस में मुलायम की पार्टी के लोगों ने मायावती से बदसलूकी की थी और तभी से भारी दुश्मनी शुरू हो गई थी. लेकिन यूपी में हवा बदली. सूबे में बारी-बारी से सत्ता सुख का लुत्फ उठाती आ रही बीएसपी और एसपी हाशिए पर चली गईं. आदित्यनाथ योगी ने सरकार बनाई और भारी बहुमत के साथ बनाई. माया-मुलायम के पास एक ही चारा बचा था. अदावत भूलाएं और सियासत बचाएं. वही किया. इस दोस्ती का दर्द भी सबसे ज्यादा उसी बीजेपी को हो रहा है, जिसने उन्हें कमजोर किया है. माया-मुलायम की रैली के बाद बीजेपी की तरफ से खूब बयान आए.

बहन मायावती सम्मान की बात करती हैं लेकिन अपने जीवन के सबसे बड़े अपमान को भूल कर एसपी के साथ गठबंधन कर रही हैं
शाहनवाज हुसैन, बीजेपी नेता
मैनपुरी में एक मंच पर एसपी और बीएसपी परिवार
मैनपुरी में एक मंच पर एसपी और बीएसपी परिवार
फोटो : पीटीआई
हताश मायावती पीएम का अपमान कर  रही हैं. एक तरफ फर्जी बुआ है, दूसरी तरफ फर्जी भतीजा’
केशव प्रसाद मौर्या, डिप्टी सीएम, यूपी

सच ये है कि बीजेपी हमलावर है तो इसकी असली वजह ये है कि लोकसभा चुनाव 2019 में एसपी-बीएसपी गठबंधन के कारण यूपी में उसकी हवा खराब हो रही है. और जहां तक दुश्मनी भुलाकर दोस्ती करने पर आपत्ति का सवाल है तो बिहार में नीतीश-मोदी की दोस्ती ‘सियासत में कोई दुश्मन नहीं’ नाम की किताब का ही एक चैप्टर है.

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