जब वैजयंतीमाला ने ‘देवदास’ के लिए मिला फिल्मफेयर अवॉर्ड ठुकराया था
बिमल रॉय की फिल्म देवदास में चंद्रमुखी के रोल में वैजयंतीमाला
बिमल रॉय की फिल्म देवदास में चंद्रमुखी के रोल में वैजयंतीमाला

जब वैजयंतीमाला ने ‘देवदास’ के लिए मिला फिल्मफेयर अवॉर्ड ठुकराया था

फिल्मी दुनिया की मेरी शिक्षिका और मेरी दादी फयाजी, वैजयंतीमाला की दीवानी थीं. इस हद तक, कि सर्दियों की एक दोपहर उन्होंने मुझे टोपी ओर मफलर के साथ मोटा सा स्वेटर पहना दिया. उस वक्त उन्हें मुझमें फिल्म ‘बहार’ का अक्स दिख रहा था.

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अरसा गुजरने के बाद भी दादी ताली पीटते, गाते और साथ-साथ अपना काम निपटाते हुए 1950 के दशक की उस फिल्म में डूबी रहतीं. “ये वैजयंती सबसे बेहतरीन है.” वो मेरे सिर को प्यार से थपथपाते हुए कहतीं, “कितना बेहतरीन नाचती है, अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से मार ही डालती है और उसके ललाट की वो सि‍लवटें... रोनी सूरत वाली हि‍रोइनों से वो बिलकुल अलग है.”

फिल्म ‘बहार’ के हीरो, करण दीवान भी दादी की पसंद थे (करीने से कटी मूंछों के साथ). वैसे इस लिस्ट में दिलीप कुमार और राज कपूर भी शामिल थे. वो वैजयंती को इन दोनों के साथ काम करते देखना चाहती थी, मानो उनके अंदर छिपा फिल्म निर्देशक बोल रहा हो.

फिल्म ‘ज्‍वेल थीफ’ में वैजयंतीमाला
फिल्म ‘ज्‍वेल थीफ’ में वैजयंतीमाला

काश, दादी आज जिन्दा होतीं. वो निश्चित रूप से वैजयंतीमाला को फूलों का एक विशाल बुके भेजतीं, जिन्होंने उम्र का एक और साल आज पूरा कर लिया है. आमतौर पर फिल्मी हिरोइनों का रुपहला वक्त 13 साल से 30 साल के बीच होता है. लेकिन उनके व्यक्तित्व का करिश्मा कम से कम तीन पीढ़ियों को अपना मुरीद बनाता रहा. मुरीदों की इस फेहरिस्त में अधेड़ उम्र के फिल्म प्रेमी के रूप में मेरा नाम भी शामिल है.

विश्वास मानिए, मैं बातें नहीं बना रहा.

वैजयंतीमाली सही समय पर सही जगह पहुंच गईं. 1950 के दशक को हिन्दी सिनेमा का स्वर्णिम युग माना जाता है. बेहतरीन कहानियां, दूरदर्शी फिल्म निर्देशक और अपनी अदाकारी का करिश्मा बिखेरने वाले अभिनेता.
फिल्म ‘मधुमति’ का एक स्टिल
फिल्म ‘मधुमति’ का एक स्टिल

मद्रास के त्रिप्लिकेन में वसुन्धरा देवी और एमडी रमन की बेटी ने दो तमिल फिल्मों में अभिनय किया. इसके बाद वो बॉलीवुड गईं और उन्हीं की राह चलकर दक्षिण भारतीय अभिनेत्रियों ने बॉम्बे में अपने जलवे दिखाने शुरू किये. इन नायिकाओं में हेमा मालिनी, रेखा, श्रीदेवी और जया प्रदा के नाम उल्लेखनीय हैं. श्रीदेवी को छोड़कर बाकी अभिनेत्रियों ने तो राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में भी हाथ आजमाया.

“चुप रहो.” मैं कल्पना कर रहा हूं कि दादी मुझे डांट रही हैं. “आज के दिन सिर्फ प्यारी वीजू के बारे में बात करो.” दादी की इस काल्पनिक डांट की वजह भी बिलकुल साफ है. उनके बेहतरीन नृत्य और भाव-भंगिमाओं का संगम अद्भुत था.

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फिल्म ‘संगम’ में राज कपूर के साथ वैजयंतीमाला का एक स्टिल
फिल्म ‘संगम’ में राज कपूर के साथ वैजयंतीमाला का एक स्टिल

आप किसी भी फिल्म में वैजयंतीमाला का बेहतरीन नृत्य देख लें: मन डोले मेरा तन डोले (नागिन), ईना मीना डीका (आशा), बक्कड़ बम बम (कठपुतली), चढ़ गयो पापी बिछुआ (मधुमती), ओ छलिया रे (गंगा जमुना), बुड्ढा मिल गया (संगम), होठों पे ऐसी बात (जेवेल थीफ), कैसे समझाऊं (सूरज). कुछ और याद करना चाहते हैं, तो राज तिलक और आम्रपाली में अर्ध-शास्त्रीय संगीतों पर उनका नृत्य.

करियर के मध्य में उनकी बेहतरीन अदाकारी भी पर्दे पर देखने को मिली. उनकी स्क्रिप्ट उनकी शख्सियत के अनुरूप होती. उनके हिन्दुस्तानी उच्चारण में कोई दोष नहीं होता. उनकी शारीरिक भाव-भंगिमा और आंखों के भाव उनकी अदाकारी में विविधता लाते थे. नतीजा ये निकलता कि वो एक घरेलू महिला, ग्रामीण बाला, दरबार की नर्तकी या आधुनिक शहरी महिला जैसी तमाम भूमिकाओं में बिलकुल फिट बैठतीं. यही वजह थी कि दिलीप कुमार (संघर्ष के अलावा, क्योंकि उनके बीच बातचीत बंद थी) और राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी हिट थी.

बेतरीन अदाकारी: देवदास, साधना, मधुमति, गंगा जमुना, संगम, आम्रपाली, संघर्ष, हाटे बाजारे.

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वैजयंतीमाला ने बिमल रॉय की फिल्म देवदास में चंद्रमुखी की भूमिका निभाई थी
वैजयंतीमाला ने बिमल रॉय की फिल्म देवदास में चंद्रमुखी की भूमिका निभाई थी
मनमानी के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली वैजयंतीमाला पहली महिला थीं, जिन्होंने फिल्मफेयर पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया था. उनका मानना था कि बिमल रॉय की फिल्म देवदास में चन्द्रमुखी के रूप में उनकी भूमिका उतनी ही दमदार थी, जितनी पारो के रूप में सुचित्रा सेन की. इस फिल्म में एक सह अभिनेत्री की भूमिका के लिए पुरस्कार उन्हें गवारा नहीं था. हालांकि हर बार उन्होंने पुरस्कार से इनकार नहीं किया. फिल्म साधना, गंगा जमुना और संगम के लिए फिल्मफेयर के बेस्ट एक्ट्रेस का पुरस्कार उन्होंने स्वीकार किया.

काश कि वैजयंतीमाला की जीवनी, Bonding (2007) में दिलीप कुमार और राज कपूर के साथ उनके नजदीकी रिश्तों का स्पष्ट जिक्र होता. उनका कहना था कि शोमैन के साथ उनका सिर्फ “दोस्ताना” रिश्ता था, जिसे ऋषि कपूर ने सरासर गलत बताया.

राज कपूर और फिल्म संगम में उनकी हि‍रोइन के कॉमन फिजीशियन डॉक्टर चमनलाल बाली के साथ शादी के बाद उनके रिश्तों पर विराम लग गया. इसके साथ ही सपनों का सौदागर फिल्म उनके हाथ से निकलकर हेमा मालिनी की गोद में जा गिरी.

शादी के दो साल बाद फिल्मों के लिए उनकी दीवानगी खत्म हो चुकी थी. वो न सिर्फ एक बेहतरीन गोल्फर बन गई थीं, बल्कि गुलजार की मशहूर फिल्म आंधी, यश चोपड़ा की दीवार, मनोज कुमार की क्रान्ति और तमिल फिल्म मप्पिलई में अधेड़ महिला की भूमिका भी ठुकरा दी. इस फिल्म में उन्हें रजनीकांत की क्रूर सास की भूमिका निभानी थी.

वैजयंतीमाली बाली से मेरी मुलाकात बॉलीवुड नृत्यों पर आधारित टीवी सीरियल बाजे पायल के लिए एक वीडियो इंटरव्यू के दौरान हुई. उनका इंटरव्यू करना मेरे लिए एक बेहतरीन यादगार था. उनकी संवेदनशीलता का नमूना ये था, कि उनके सरकारी बंगले में चाय पसोरने वालों ने हमारा सामान पैक करने में भी हमारी मदद की.

दादी ने उनके साथ खींची गई मेरी तस्वीर देखकर कहा, “तुम एक उल्लू की तरह दिख रहे हो. तुमने सूट क्यों नहीं पहना?”

वैजयंतीमाली के साथ लेखक खालिद मोहम्मद. (फोटो: खालिद मोहम्मद)
वैजयंतीमाली के साथ लेखक खालिद मोहम्मद. (फोटो: खालिद मोहम्मद)

दूसरी बार उनसे मुलाकात का मौका नई दिल्ली में मिला. मसला था 1996 के फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार स्वीकार करने का निवेदन करना. केक, सैंडविच के साथ स्वागत किया गया. निवेदन स्वीकार कर लिया गया. साथ ही ताकीद की गई कि अपने कार्यक्रम में मुझसे नाचने के लिए मत कहना.

इस बार मैंने सूट तो पहन रखा था, लेकिन फोटोग्राफ नहीं खींचा गया. क्योंकि तब तक मेरी दादी गुजर चुकी थीं. मैं उनसे कहा, “वैजयंतीजी, मेरी दादी आपकी सबसे बड़ी फैन में एक थीं...” मेरी बात खत्म होने से पहले वो मुस्कुराते हुए बोलीं, “मुझे लगता है कि अब पुरानी पीढ़ी के लोग ही मुझे याद रखते हैं. उन्हें मेरा धन्यवाद कहना.”

(लेखक खालिद मोहम्‍मद एक फिल्म समीक्षक, फिल्म निर्माता, थियेटर निदेशक और एक साप्ताहिक चित्रकार हैं.)

[ये आर्टिकल द क्विंट के आर्काइव्स से निकाला गया है, जिसे पहली बार 13 अगस्त, 2016 को प्रकाशित किया गया था. वैजयंतीमाली बाली के जन्मदिवस के मौके पर इसे फिर से प्रकाशित किया जा रहा है]

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