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'Jogi’ Review': दिलजीत दोसांझ की एक्टिंग शानदार, लेकिन स्लो और बोरिंग है फिल्म
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'Jogi’ Review': दिलजीत दोसांझ की एक्टिंग शानदार, लेकिन स्लो और बोरिंग है फिल्म

नेटफ्लिक्स पर दिलजीत दोसांझ की फिल्म जोगी रिलीज हो चुकी है

दिलजीत दोसांझ की शानदार एक्टिंग, लेकिन स्लो और बोरिंग है फिल्म

जब फिल्में इतिहास के भयानक भयावह क्षणों पर आधारित होती हैं, तो उन लोगों के प्रति फिल्म बनाने वाले की जिम्मेदारी होती है कि वह फिल्म को सत्यता के साथ और कहानी को ईमानदारी के साथ बनाए, दिलजीत दोसांझ की जोगी उस धागे को पकड़ने में कामयाब होती है. नेटफ्लिक्स पर दिलजीत दोसांझ की फिल्म जोगी रिलीज हो चुकी है. आइये जानते हैं कैसी है ये फिल्म

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कैसी है फिल्म जोगी की कहानी 

फिल्म जोगी की कहानी दिल्ली में 1984 के दंगों से शुरू होती है. ऑपरेशन ब्लू स्टार के संक्षिप्त स्मरण के बाद हम सब लोगों को पता है कि आगे क्या होने वाला है, लेकिन निर्देशक अली अब्बास जफर 1984 के सिख दंगों को न दिखाकर फिल्म की कहानी को दिलजीत दोसांझ के सुबह के नाश्ते से शुरू करते हैं.

फिल्म में कुछ ऐसे सीन दिखाए गए हैं, जो हमें बताते हैं कि सिख दंगे कितने भयानक थे, और उसमें कितनों ने क्या खोया.

जब दंगाईयों द्वारा सिखों के खिलाफ हिंसा के सीन की बात आती है, तो जोगी तनाव और सहानभूति दोनों पैदा करने में कामयाब होती है. जोगी में दर्शकों को देखने को मिलेगा कि लोग मारे जाते हैं या जिंदा जलाए जाते हैं.या फिर बेबसी और भय से छिपे रहते हैं.

फिल्म जोगी के एक सीन में दिलजीत 

The Quint

फिल्म में एक्टिंग की बात करें तो दिलजीत दोसांझ ने सभी का दिल जीता है. एक बार फिर उन्होंने अपनी अदाकारी से साबित कर दिया कि वे कितने शानदार एक्टर हैं. वहीं फिल्म में उनकी मोहब्बत कमली यानी अमायरा दस्तूर ने अपने छोटे से किरदार में जान डाल दी. मोहम्मद जीशान और हितेन तेजवानी ने दोस्त का रोल प्ले कर अपने किरदारों के साथ न्याय किया है. हालांकि, हितेन के चेहरे पर उम्र का असर दिखने लगा है.

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मोहम्मद जीशान और हितेन तेजवानी का मिशन स्वाभाविक रूप से आसान नहीं है क्योंकि वे न केवल एक भीड़ का सामना कर रहे हैं, बल्कि एक निष्क्रिय पुलिस विभाग और कुमुद मिश्रा द्वारा अभिनीत एक नफरती स्थानीय राजनेता तेजपाल अरोड़ा का भी सामना कर रहे हैं. जिस तरह से दिल्ली में आग लगाने के दृश्यों के बीच जोगी शिफ्ट होते हैं और अरोड़ा बेपरवाह होकर अपना दिन बिताते हैं, वह काबिले तारीफ है.

एक तरफ फिल्म में दंगे की कहानी दिखाई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ फिल्म में अनावश्यक लव स्टोरी दिखाई गई है, जो दर्शकों का फिल्म के मूल उद्देश्य से थोड़ा ध्यान भटकाने का काम करती है.

फिल्म ने कहीं भी किसी नए विजुअल और थीम का प्रयोग नहीं किया है, लेकिन ज्यादातर दिल दहलाने वाले सीन देखने को मिलेंगे. मोना सिंह की लाल सिंह चड्ढा का वह दृश्य याद है, जो अपनी जान बचाने की कोशिश में एक युवा लाल के बाल काटता है? जोगी इसी तरह की भावनाओं को सामने लाते हैं लेकिन किसी तरह उन्हें बाद की तुलना में अधिक प्रभावी बनाते हैं. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी, आर्ट डायरेक्शन और एडिटिंग कमाल की है. फिल्म में अली अब्बास जफर की मेहनत साफ नजर आ रही है. 

जोगी एक आदर्श फिल्म नहीं है - ऐसे सीन हैं जो अवास्तविक या आधे-अधूरे लगते हैं - लेकिन यह एक ईमानदार फिल्म है.

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टॉपिक:  Bollywood   movie review 

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