अहोई अष्टमी:क्यों किया जाता है ये व्रत, क्या है पूजा का विधि-विधान
उत्तर भारत में ज्यादा प्रचलन में है अहोई अष्टमी
उत्तर भारत में ज्यादा प्रचलन में है अहोई अष्टमी(फोटोः Twitter)

अहोई अष्टमी:क्यों किया जाता है ये व्रत, क्या है पूजा का विधि-विधान

देशभर में आज अहोई अष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है. अपने संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए महिलाएं यह व्रत रखती हैं. इस व्रत के विधि विधान, कथा और महत्व के बारे में विस्तार से जानते हैं.

कब रखा जाता है यह व्रत

करवा चौथ और दिवाली के बीच में अहोई अष्टमी व्रत होता है. दरअसल कार्तिक महीने की अष्टमी को इस व्रत को रखा जाता है. उत्तर भारत में और विशेष रूप से राजस्थान में इस व्रत का ज्यादा प्रचलन है. इन इलाकों की महिलाएं अपनी संतान के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं.

खास महत्व

अहोई का मतलब होता है 'अनहोनी को होनी बनाना'. यह व्रत मां खासतौर से अपनी संतान को किसी भी तरह की अनहोनी से बचाने के लिए करती हैं. इस व्रत के करने से संतान को कोई रोग-दुख, दुर्घटना का खतरा नहीं रहता. उनकी आयु लंबी आयु होती है और सभी तरह की परेशानियों का समाधान होता है.

व्रत विधि

यह व्रत निर्जला रखा जाता है. हालांकि सूर्योदय से पहले सरगी में फल या कुछ मीठा खाया जा सकता है. सूर्योदय के बाद से व्रत की शुरुआत होती है और पूरे दिन का उपवास होता है. शाम के समय में अहोई माता की पूजा करने के बाद तारों का दर्शन कर व्रत खोला जाता है. जिस तरह करवाचौथ में चांद के दर्शन किए बगैर व्रत नहीं खोलते, ठीक उसी तरह इस व्रत में तारे को देखे बगैर महिलाएं व्रत नहीं खोलती हैं.

कैसे होती है पूजा

घर में किसी पवित्र स्थान पर अहोई माता की तस्वीर को रखकर उसके सामने पानी से भरा एक कलश रखा जाता है. कलश को मौली से बांधा जाता है और उस पर स्वास्तिक का निशान बनाया जाता है. माता के सामने गेहूं भरी थाली रखी जाती है. इसके अलावा महिला को चावल के साथ पूरी, हलवा का भी भोग लगाया जाता है. धूप-दीप जलाकर अहोई अष्टमी व्रत कथा पढ़ी जाती है. पूजा संपन्न होने के बाद परिवार के सदस्यों में प्रसाद बांटा जाता है.