टिकरी बॉर्डर: ‘ठंड, शौचालय, सफाई की दिक्कतों से हो रही मुश्किल’

प्रदर्शन कर रहे किसानों को नहीं मिल रही साफ सुथरे टॉयलेट तक की  सुविधा 

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नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के चल रहे प्रदर्शन को 1 महीने से भी ज्यादा समय हो चुका है. टिकरी और सिंघु बॉर्डर पर लाखों किसान इस कड़ाके की ठंड में भी अपने प्रदर्शन पर अड़े हुए हैं. लेकिन इस ठंड के साथ-साथ उन्हें साफ सुथरे टॉयलेट ना होने की समस्या को भी झेलना पड़ रहा है जिसकी वजह से महिलाओं और बुजुर्गों को ज्यादा तकलीफ हो रही है.

टिकरी बॉर्डर पर किसानों की मुश्किलें बढ़ती जा रही है क्योंकि वहां पर उन्हें साफ सुथरे और अच्छी तरह से निर्मित टॉइलेट की सुविधा भी नहीं मिल रही है. टॉइलेट में टॉइलेट सीट नहीं है जिसके कारण बुजुर्गों को काफी तकलीफ हो रही है. महिलाओं के लिए उनकी प्राइवसी सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है लेकिन यहां महिलाओ को भी मजबूरी मे खुले मे शौच के लिए जाना पड़ रहा है.

किसानों ने वहां खुद के लिए ‘मेकशिफ्ट टॉइलेट’ तो बना रखें है लेकिन उनका कहना है की ये इस तकलीफ का स्थायी निवारण नहीं है. इस मामले में किसानों की नाराजगी दिल्ली सरकार से है क्योंकि कई सारे वादों के बावजूद भी किसानों को सही सेनिटेशन की सुविधा नहीं मिल रही है. सरकार ने वहां पोर्टेबल टॉयलेट लगवाएं है लेकिन किसानों का कहना है कि, उनमें जरा भी सफाई नहीं है, पानी भी आता तो है लेकिन फिर 1-2 घंटों मे वापस चला जाता है.

“महिलाओ के लिए माहवारी के दौरान, पानी की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है, जो की उन्हें पर्याप्त मात्रा मे नहीं मिल पा रहा है”

पंजाब के किसानों का कहना है कि वो हरियाणा के किसान और उन स्थानीय लोगों को धन्यवाद करना चाहते है जिन्होंने उन किसानों की इस मामले मे काफी ज्यादा सहायता की है.

“जब हम यहां आए थे , शुरुवात के 2-3 दिन हमे बहुत ज्यादा परेशानी हुई थी क्योंकि पानी की सुविधा उपलब्ध नहीं थी. लेकिन फिर हरियाना के किसान हमारे लिए पानी के टेंकर लेकर आए. पीने के पानी की सुविधा भी हमे हरियाना के लोगों ने ही उपलब्ध कारवाई, क्योंकि वो हम किसानों की परेशानी को समझ पा रहे थे.”
कलदीप कौर कुस्सा, किसान

सेनिटेशन की अच्छी सुविधा न होने पर अब किसानों को यह डर भी है कि इस वजह से काफी सारी बीमारियां फैल सकती है, और उसमे भी कोरोना वायरस का खतरा सबसे ज्यादा है.

इतनी सारी तकलीफों को सहने के बाद भी किसानों ने हार नहीं मानी है, फिर चाहे वो बुजुर्ग व्यक्ति हो या महिलाएं, सभी का यही कहना है कि हम तब तक यहां डटे रहेंगे जब तक तीनों कृषि कानून वापस नहीं ले लिए जाते.

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