उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर योगी सरकार को इलाहबाद हाईकोर्ट ने झटका दिया है. हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण प्रक्रिया पर रोक लगा दी है. हाईकोर्ट ने इस मामले में यूपी सरकार और चुनाव आयोग को 15 मार्च को जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है.
जस्टिस रितुराज अवस्थी और जस्टिस मनीष माथुर की बेंच ने याचिकाकर्ता अजय कुमार की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है.
पंचायत चुनाव में आरक्षण प्रक्रिया पर आपत्ति
हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका में पंचायत चुनावों में आरक्षण की प्रक्रिया के तरीके को लेकर यूपी सरकार पर सवाल उठाए गए हैं.
याचिकाकर्ता का कहना है कि जिला और क्षेत्र पंचायत चुनावों में आरक्षण की रोटेशन व्यवस्था के लिए 1995 को बेस वर्ष माना जा रहा है और उसी आधार पर रिजर्वेशन किया जा रहा है. जबकि, पहले की यूपी सरकार ने सितंबर 2015 को एक आदेश जारी करके बेस वर्ष को 2015 कर दिया था और इसी आधार पर पिछले चुनावों में आरक्षण भी किया गया था. लेकिन अब यूपी सरकार फिर से 1995 को बेस वर्ष मानकर आरक्षण की प्रक्रिया पूरी कर रही है.
याचिकाकर्ता के वकील का कहना है कि “सितंबर 2015 का आदेश अब भी प्रभावी है. इसलिए यूपी में होने वाले पंचायत चुनावों में आरक्षण के रोटेशन के लिए 2015 को ही बेस वर्ष माना चाहिए.”
सवालों में आरक्षण प्रक्रिया: जिस गांव में SC नहीं वहां SC के लिए रिजर्व है सीट
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों को लेकर आरक्षण की रोटेशन की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं. इसे लेकर बिजनौर शहर का एक अमीरपुर सुधा काफी चर्चा में रहा है. मुस्लिम बहुल इस गांव में इस बार पंचायत चुनाव में प्रधान की सीट SC यानि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हुई है.
हैरानी की बात है कि इस गांव में अनुसूचित आबादी रहती ही नहीं है और इससे पहले भी यह गांव अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित नहीं रहा है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में, अधिकारियों ने कहा कि अमीरपुर सुधा गांव में पंचायत चुनाव के लिए सीटों का आरक्षण सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों के आधार पर किया गया है, जो कि ताजा जनगणना पर आधारित है.
बिजनौर के जिला पंचायत अधिकरी संतोष कुमार ने कहा कि, इस बारे में निर्देश सरकार से मिले थे, जिसमें 2011 की जनगणना के तहत सीट के आरक्षण की घोषणा करनी थी.
जनगणना रिपोर्ट के अनुसार गांव में 398 अनुसूचित जाति के परिवार हैं. हालांकि इसकी पुष्टि करने पर पता चला कि गांव में कोई SC परिवार नहीं रहता है. इस मामले में उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी गई है.
नई नीति के तहत यूपी में पंचायत चुनाव
उत्तर प्रदेश में होने जा रहे पंचायत चुनाव से ठीक पहले 'नई आरक्षण नीति' लागू की गई है. इन चुनाव में रोटेशन के जरिए आरक्षण लागू किया जा रहा है. साथ ही कई दूसरी शर्ते भी लागू होने जा रही हैं. ऐसे में पंचायत चुनाव में बड़े फेरबदल होने जा रहे हैं और कई सीटों पर जातिगत समीकरण बदलेंगे.
नई नीति के मुताबिक,
- पंचायत चुनाव में अनुसूचित जाति और पिछड़े वर्ग की सर्वाधिक आबादी वाले जिला, क्षेत्र और ग्राम पंचायतों को रोटेशन में आरक्षित किया जाएगा.
- लेकिन 1995, 2000, 2005, 2010 और 2015 में जो पंचायतें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित थीं, वे इस बार अनुसूचित जाति के लिए आवंटित नहीं की जाएंगी. जो पिछड़े वर्गो के लिए आरक्षित रह चुकी हैं, उन्हें पिछड़े वर्गो के लिए आरक्षित नहीं किया जाएगा.
- 1995 से लेकर 2015 तक पांच चुनावों में अनुसूचित जनजातियों, अनुसूचित जातियों, पिछड़े वर्ग और महिलाओं के लिए आरक्षित रही सीटें इस बार उस कैटेगरी के लिए आरक्षित नहीं की जाएगी.
रोटेशन पॉलिसी में किसे पहली प्राथमिकता?
अपर मुख्य सचिव पंचायतीराज मनोज कुमार के मुताबिक, इस रोटेशन पॉलिसी का सबसे अहम सिद्धांत ये है कि जो ग्राम, क्षेत्र या जिला पंचायतें अभी तक किसी कैटेगरी के लिए आरक्षित नहीं हुई हैं, उन्हें सबसे पहले उसी कैटेगरी के लिए आरक्षित किया जाएगा. मनोज कुमार ने आरक्षण की प्राथमिकता को कुछ इस तरह बताया है:
सबसे पहले अनुसूचित जनजाति महिला, फिर अनुसूचित जनजाति, फिर अनुसूचित जाति महिला, पिछड़ा वर्ग महिला, अनुसूचित जाति पुरुष, जनरल कैटेगरी महिला और फिर जनरल कैटेगरी.
आरक्षण और आवंटन प्रक्रिया पर लगी रोक
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले के बाद आरक्षण व आवंटन प्रक्रिया को अंतिम रूप देने पर रोक लग गई है. इस संबंध में मुख्य सचिव पंचायतीराज ने सभी जिलाधिकारियों को लेटर लिखकर निर्देश दिया है.
बता दें कि 17 मार्च को यूपी सरकार पंचायत चुनावों के लिए आरक्षण की अंतिम जारी करने वाली थी, लेकिन अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद इस पर रोक लग गई है. 15 मार्च को सरकार के जवाब दाखिल करने के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी.
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