अयोध्या का सच: एक चमत्कार... और बाबरी मस्जिद में रामलला की वापसी
द क्विंट अपनी इस विशेष डॉक्यूमेंट्री सीरीज में बाबरी का पूरा सच जानने की कोशिश कर रहा है.(ग्राफिक्स: लिजुमोल जोसफ)
द क्विंट अपनी इस विशेष डॉक्यूमेंट्री सीरीज में बाबरी का पूरा सच जानने की कोशिश कर रहा है.(ग्राफिक्स: लिजुमोल जोसफ)

अयोध्या का सच: एक चमत्कार... और बाबरी मस्जिद में रामलला की वापसी

करीब 25 साल पहले तोड़ी गई बाबरी मस्जिद आज भी भारतीय राजनीति और समाज में एक संवेदनशील टॉपिक है. अयोध्या विवाद ने कई दशकों तक देश की राजनीति को प्रभावित किया है, लेकिन ये विवाद भी एक दिन में पैदा नही हुआ था. आखिर क्या हुआ था बाबरी विध्वंस से पहले?

द क्विंट की एक्सक्लूसिव पड़ताल में हम आपको सिलसिलेवार तरीके से उन घटनाक्रम से रूबरू कराएंगे जो आजादी के बाद के वर्षों में अयोध्या विवाद का मूल कारण बनी.

बात साल 1949 की है. आजाद भारत की उम्र कुल मिलाकर दो साल ही हुई थी. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू अभी भी भारत के विचार को साकार करने में लगे हुए थे, और उनके सहयोगी सरदार वल्लभभाई पटेल देश की सीमाओं को परिभाषित कर रहे थे. 1949 में देश भले ही आजाद हो गया था लेकिन विभाजित भारत के लोग अभी भी विभाजन की त्रासदी में तार-तार हुए सामाजिक तानेबाने के चीथड़े को समेटने की कोशिश कर रहे थे. इन्हीं सबके बीच उत्तर प्रदेश में जमीन तैयार की जा रही थी 22 दिसंबर की रात को अयोध्या घेरने की.

सुबह करीब 3 बजे अचानक से बिजली चमकी और श्री राम बाबरी मस्जिद में प्रकट हो गए. चमत्कार मानकर विश्वास कर लिया गया यह वाकया “राम जन्मभूमि को आजाद करवाने” की दिशा में हिंदुओं के “सदियों लंबे” संघर्ष में पहला महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. दावा किया जाता है कि बाबरी मस्जिद को बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने साल 1528 में श्रीराम जन्मभूमि पर बने मंदिर को तोड़कर बनवाया था.

वह जगह जहां देवदूत उतरे थे

लेकिन इस वाकये से जुड़ी एक ज्यादा जमीनी व्याख्या 23, दिसंबर 1949 को दर्ज हुई एफआईआर में है, जिसमें अयोध्या के पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इंचार्ज ने मुख्य रूप से तीन लोगों को नामजद किया था - अभिराम दास, राम शकल दास और सुदर्शन दास. इसके अलावा 50 से 60 अज्ञात लोगों के खिलाफ भी दंगा भड़काने, अतिक्रमण करने और एक धर्मस्थल को अपवित्र करने का मामला दर्ज किया गया था.

[…] 50 से 60 लोगों का एक समूह बाबरी मस्जिद परिसर के ताले को तोड़कर, दीवारों और सीढ़ियों को फांदकर अंदर घुस आए और श्रीभगवान की प्रतिमा वहां स्थापित कर दी. साथ ही उन्होंने पीले और केसरिया रंग में सीता और रामजी, आदि की तस्वीरें मस्जिद की भीतरी और बाहरी दीवारों पर बना दीं. [...] मस्जिद में घुसपैठ करनेवालों ने मस्जिद को ‘नापाक’ किया है. 

इस घटना के कुछ समय बाद ही एक 6 फीट लंबे तुनकमिजाज साधु अभिराम दास को “उद्धारक बाबा” के नाम से पुकारा जाने लगा. लेकिन क्या एक मस्जिद को मंदिर में बदलने का ये पुख्ता प्लान बिना स्थानीय प्रशासक की मदद के बन पाना संभव था?

बाबरी मस्जिद करीब सौ साल पहले (फोटो: ब्रिटिश लाइब्रेरी बोर्ड)
बाबरी मस्जिद करीब सौ साल पहले (फोटो: ब्रिटिश लाइब्रेरी बोर्ड)

चमत्कार नहीं था ये

उस समय गुरुदत्त सिंह फैजाबाद के सिटी मैजिस्ट्रेट थे और उनके बारे में यह मशहूर था कि उन्होंने अपने ब्रिटिश आकाओं को खुश करने की खातिर अपने तौर-तरीके कभी नहीं छोड़े थे. उनके पोते शक्ति सिंह, जो कि फैजाबाद में बीजेपी के नेता हैं, के अनुसार गुरुदत्त “पक्के हिंदूवादी” थे.

गुरुदत्त सिंह शाकाहारी थे, कोई नशा नहीं करते थे और अपने कॉलेज के दिनों से ही रामभक्त थे.

गुरुदत्त सिंह भारत की आजादी के पहले से ही एक सरकारी अफसर थेे और ये उनका ही प्लान था कि बाबरी मस्जिद को मंदिर में बदल दिया जाए. (फोटो: द क्विंट)
गुरुदत्त सिंह भारत की आजादी के पहले से ही एक सरकारी अफसर थेे और ये उनका ही प्लान था कि बाबरी मस्जिद को मंदिर में बदल दिया जाए. (फोटो: द क्विंट)

गुरुदत्त सिंह के बेटे गुरू बसंत सिंह, 86, पहले तो हमसे बात करने में हिचके लेकिन थोड़ी देर बाद उन्होंने द क्विंट को उन खुफिया बैठकों के बारे में बताया जो उनके घर ‘राम भवन’ में हुआ करते थे. उस समय बसंत सिंह सिर्फ 15 साल के थे और मेहमानों को नाश्ता-पानी देने के लिए उन बैठकों में आते-जाते रहते थे. इन बैठकों में उनके पिता के अलावा जिला मजिस्ट्रेट केके नायर, पुलिस अधीक्षक कृपाल सिंह और जिला जज ठाकुर बीर सिंह शामिल थे.

शहर के चार बड़े अधिकारी बाबरी मस्जिद में भगवान राम की मूर्ति स्थापित करने की जिद पर थे. कौन करता इनका विरोध और उससे क्या हो जाता? उनकी गतिविधियों से लगता था कि वो सतर्क अधिकारी थे, लेकिन असल में वो भक्तों को छूट देते थे ताकि वो मस्जिद में घुस सकें और पूजा-पाठ कर सकें
गुरू बसंत सिंह

लेकिन जो कुछ भी इन अधिकारियों ने किया उसे कबूल लेने की बजाय उन्होंने ‘चमत्कार’ की कहानी क्यों गढ़ी? इस सवाल का जवाब गुरू बसंत सिंह के पास है. उन्होंने हमें बताया कि इस घटना से आम लोगों को जोड़ने के लिए ऐसा किया गया. मस्जिद में स्वयं रामलला के प्रकट होने के दावे से बेहतर युक्ति क्या हो सकती थी?

(ग्राफिक्स: राहुल गुप्ता)
(ग्राफिक्स: राहुल गुप्ता)

गुरुदत्त सिंह के सीनियर और फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट केके नायर एक मृदुभाषी मलयाली थे. कहा जाता है कि उनका झुकाव हिंदू महासभा की तरफ था - जो कि भारत की सबसे पुरानी हिंदूवादी राष्ट्रवादी पार्टी थी. जिस दिन बाबरी मस्जिद में घुसपैठ हुई, उस दिन केके नायर छुट्टी पर थे, लेकिन वो फैजाबाद छोड़कर नहीं गए.

इस योजना में केके नायर की मिलीभगत की बात इससे भी साबित होती है कि वो घटनास्थल पर सुबह चार बजे ही पहुंच गए थे, लेकिन उन्होंने लखनऊ में अपने वरिष्ठों को इस घटना की सूचना सुबह 10:30 बजे तक नहीं दी.

बाबरी मस्जिद में हिंदू धर्म के कुछ लोग रात के अंधेरे में घुस आए और वहां भगवान की स्थापना की. जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक और पुलिस के जवान मौके पर पहुंच चुके हैं. स्थिति नियंत्रण में है. पुलिस पिकेट के 15 जवान, जो रात को ड्यूटी पर थे, ने भीड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं किया. 
संयुक्त प्रांत के मुख्यमंत्री गोबिंद बल्लभ पंत को केके नायर का रेडियो संदेश

सुबह 4 बजे बाबरी मस्जिद पहुंच चुके नायर ने अगले पांच घंटे तक ना तो मस्जिद खाली कराने की कोशिश की और ना ही मूर्ति को हटाया. नायर बाद में जनसंघ में शामिल हो गए और चुनाव जीतकर सांसद भी बने.

प्रधानमंत्री नेहरू क्या कर रहे थे?

26 दिसंबर,1949 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गोविंद वल्लभ पंत को टेलिग्राम भेजकर अपनी नाराजगी जाहिर की और लिखा कि “वहां एक बुरा उदाहरण स्थापित किया जा रहा है जिसके भयानक परिणाम होंगे.”

इसके बाद 5 फरवरी, 1950 को उन्होंने पंत को एक और चिट्ठी लिखी और उनसे पूछा कि क्या उन्हें अयोध्या आना चाहिए.

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की यह यात्रा कभी नहीं हो पाई

बाबरी मस्जिद के अंदर मूर्तियों की स्थापना के 66 साल बाद आज भी इस बात पर बहस जारी है कि 22 दिसंबर, 1949 को हुई यह घटना “एक सुनियोजित साजिश थी जिसमें राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर के नेता शामिल थे.”

रामलला की स्थापना के 43 साल बाद बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया. (फोटो: Reuters)
रामलला की स्थापना के 43 साल बाद बाबरी मस्जिद को तोड़ दिया गया. (फोटो: Reuters)

लेकिन जमीनी स्तर पर, इसे स्थानीय प्रशासन और मीडिया द्वारा एक स्थानीय सांप्रदायिक घटना के रूप में प्रस्तुत किया गया. 22 दिसंबर, 1949 को घटी इस घटना ने अंग्रेजों द्वारा बनाई गई उस व्यवस्था को भी खत्म कर दिया जिसके अंतर्गत हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए मस्जिद के अंदर पूजा और नमाज पढ़ने की व्यवस्था की गई थी.

वीएचपी, बीजेपी और कांग्रेस ने चार दशक बाद इस मामले को इस तरह उठाया जिसकी पहले कभी कल्पना नहीं की गई थी. बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा शुरू की, जो एक जन आंदोलन बन गया, जिसका अंत 6 दिसंबर, 1992 के दिन बाबरी के विध्वंश के साथ हुआ.

बाबरी मस्जिद परिसर, कानून की धारा 145 के तहत सभी के लिए बंद कर दिया गया. इससे जुड़े सिविल मामलों की सुनवाई में आदालत ने मूर्तियां हटाए जाने या पूजापाठ में किसी तरह की रुकावट पर रोक लगा दी. छह दिसंबर 1992 तक मस्जिद के दरवाजे बंद रखे गए और अंदर आने की इजाजत सिर्फ उन पुजारियों को दी गईं जो रामलला की ‘देखभाल और पूजापाठ’ करते थे.

सीरीज के बाकी 5 एपिसोड भी पढ़ें

अयोध्या का सच पार्ट-2: क्या एक दिव्य वानर ने खुलवाई बाबरी मस्जिद?

अयोध्या का सच, भाग 3: राम मंदिर का राजनीतिकरण कांग्रेस ने किया

अयोध्या का सच, भाग 4: शिलान्‍यास के पीछे सियासी फायदे की मंशा

अयोध्या का सच, भाग 5: मंडल कमीशन बनाम बीजेपी का रथ और राम राग

अयोध्या का सच, भाग-6: ...तो इस तरह हुआ ‘मुल्‍ला मुलायम’ का जन्म

ये सीरीज क्विंट हिंदी पर पहली बार 9 दिसंबर 2015 को छपी थी.

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