देश में इन दिनों कोविड की दूसरी लहर तेजी से बढ़ रही है, अब एक दिन में दो लाख से ज्यादा पॉजिटिव मरीज भी देखने को मिलने लगे हैं. साल भर बीतने के बाद भी सरकार और जनता की आंखें नहीं खुलीं, इस कारण कोरोना आउट ऑफ कंट्रोल होता हुआ दिख रहा है. आइए जानते हैं आखिर किन गलतियों से कोरोना इतनी तेजी से बढ़ रहा है...
1.जिम्मेदार ही नहीं निभा रहे जिम्मेदारी
फरवरी के अंत में देश के पांच राज्यों में चुनाव की घोषणा हुई थी. पश्चिम बंगाल को छोड़ दें तो बाकी चार राज्य असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में चुनाव संपन्न हो गए हैं. इस चुनावी माहौल में अलग-अलग मीम्स और जोक्स भी देखने को मिले. इसमें से सबसे ज्यादा जिसका प्रचार हुआ वह ये था कि कोरोना चुनाव से डरता है और इस वजह से चुनाव वाले राज्यों में नहीं जाता. चुनाव आयोग की ओर से इन चुनावों के लिए कोविड प्रोटोकॉल भी जारी किए गए थे, लेकिन हमारे नेताओं ने इन नियमों की धज्जियां उड़ा दीं.
चुनाव प्रचार के दौरान देश के गृहमंत्री और भाजपा के स्टार प्रचारक अमित शाह के साथ-साथ अन्य बड़े नेताओं ने जहां बंपर भीड़ के साथ सभाएं कीं, वहीं वे बिना मास्क के भी दिखे.
- बीबीसी के अनुसार विशेषज्ञों ने चेताया कि विधानसभा चुनाव होने पर बंगाल में कोरोना संक्रमण का नया रिकॉर्ड बन सकता है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि आठ चरणों तक चलने वाली चुनाव प्रक्रिया कोरोना के लिहाज से भारी साबित हो सकती है.
- पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना कि चुनावी रैलियों में भीड़ से संक्रमण फैलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. इन रैलियों में सामाजिक दूरी के नियमों का पालन नहीं किया गया.
- पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों के सामूहिक मंच ‘द ज्वॉइंट फोरम ऑफ डॉक्टर्स-वेस्ट बंगाल' ने निर्वाचन आयोग को पत्र भेज कर चुनाव अभियान के दौरान कोरोना प्रोटोकॉल की सरेआम धज्जियां उड़ने पर गहरी चिंता जताते हुए उससे हालात पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाने की अपील की है. इस समूह ने अपने पत्र में लिखा है, "क्या आपने कभी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को मास्क पहनते देखा है? अगर प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और मुख्यमंत्री ही कोविड प्रोटोकॉल का उल्लंघन करें तो हम क्या कर सकते हैं?’
बीबीसी से चर्चा के दौरान पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा है कि “पश्चिम बंगाल से रैलियों की जो तस्वीर सामने आ रही है, उसमें हम साफ देख रहे हैं कि स्टार कैम्पेनर बिना मास्क लगाए स्टेज पर हैं. उससे मैसेज ये जा रहा है कि जब उन पर कोई रोक नहीं, तो दूसरों पर क्या होगी. एक नेता पर एक्शन होने से पूरी जनता में मैसेज जाएगा कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं. चुनाव आयोग को यहीं करना चाहिए था, जो नहीं हुआ.”
“मुझे याद नहीं कि किसी नेता पर कोविड प्रोटोकॉल तोड़ने के लिए बैन की खबर कोई मीडिया में आई हो. ये जिम्मेदारी (कोविड प्रोटोकॉल का पालन) निर्वाचन अधिकारी की होनी चाहिए कि वो नेताओं से प्रोटोकॉल का पालन करवाएं. शुरुआत में ही एक्शन लिया होता, तो सब बढ़िया रहता.”-ओपी रावत, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त
पांच दौर के चुनाव प्रचार के बाद अब जाकर चुनाव आयोग ने शाम 7 से सुबह तक प्रचार न करने की हिदायत दी है. वैसे इसका ज्यादा असर होगा , कह नहीं सकते क्योंकि ज्यादातर प्रचार तो दिन में ही होता है.
2.आस्था पर भारी महामारी
जहां एक ओर पूरी दुनिया में सोशल डिस्टेंसिंग का संदेश दिया जा रहा है, वहीं हरिद्वार कुंभ में लाखों की भीड़ देखने को मिल रही है. यहां श्रद्धालु बिना मास्क और अन्य सावधानियों के बिना दिख रहे हैं. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह खुद मेले में बिना मास्क के शामिल होते हैं और कहते हैं कि ‘श्रद्धालुओं पर कोई रोक टोक नहीं होगी....हमें विश्वास है कि भगवान में आस्था कोरोना को हरा देगी.’ लेकिन अब करीब 600 साधुओं की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई है. पिछले 24 घंटे में राज्य में 2,220 नए मामले सामने आए, जबकि इस दौरान 9 मरीजों की मौत हो गई.
- सरकार ने कुंभ मेले के लिए 25 स्पेशल ट्रेन्स की व्यवस्था की है.
- 35 लाख लोगों ने 12 अप्रैल को तो 13 लाख लोगों ने 14 अप्रैल को हरिद्वार में शाही स्नान में हिस्सा लिया था.
- वहीं अगला शाही स्नान 27 अप्रैल को है, जबकि कुंभ मेला अधिकारिक तौर पर 30 अप्रैल को समाप्त होना है.
पीएम मोदी ने अब अपील की है कि अब कुंभ को प्रतीकात्मक ही रखा जाए. हालांकि लगता है इस अपील में देर हो चुकी है.12,13 और 14 अप्रैल को कुल मिलाकर 50 लाख लोग शाही स्नान में हिस्सा ले चुके है और अब देश भर में फैल चुके होंगे.
3.सख्ती में जरूतमंदों को नहीं मिली ट्रेन, लेकिन अनलॉक में व्यवस्था हुई फेल
पिछले साल लॉकडाउन के दौरान जब तपती गर्मी में देशभर के प्रवासी मजदूर पैदल ही अपने घरों के लिए निकल पड़े थे तब सरकार ने समय पर ट्रेनों की व्यवस्था नहीं की थी, उसके बाद कई महीनों तक आम आदमी के लिए गाड़ियां बंद रहीं, लेकिन जब सरकार ने बुकिंग शुरू की तो डिस्टेंसिंग का ध्यान ही नहीं रखा, हर सीट को बुक करने की छूट दी गई. लिहाजा कुछ ट्रेनों में ठसा-ठस भीड़ देखने को मिली. यहां सरकार को उचित कदम उठाने की जरूरत थी.
4.मूलभूत मेडिकल व्यवस्थाओं में नहीं हुआ बड़ा सुधार
देश में कोरोना संक्रमण के पहले मामले से लेकर अब तक एक साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया है. इस एक साल में देश में कोरोना के इलाज के लिए काफी कुछ काम हुआ, लेकिन अन्य देशों में कोरोना की विभिन्न लहरों को देखने के बाद भी जो चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था होनी चाहिए उससे हम अभी भी दूर हैं. हमारे देश और राज्यों की सरकारों ने बाकी देशों से सबक न लेकर ऐसी गलती की है, जिससे हम कोरोना की लड़ाई में पिछड़ रहे हैं. अभी भी दवाओं की किल्लत दूर नहीं हुई. अस्पताल, वेंटिलेटर, आईसीयू बेड के साथ-साथ सामान्य बेड, ऑक्सीजन सिलेंडर, एम्बुलेंस आदि की पर्याप्त व्यवस्था केंद्र और राज्य सरकार ने नहीं की. नतीजा आपके सामने है, देश के कई राज्यों में अभी भी मूलभूत अवश्यकताओं के लिए हाहाकार मचा हुआ है. अस्पताल, डॉक्टर, नर्स और टेक्नीशियन की संख्या अब भी कम पड़ रहे हैं.
इस मामले में क्विंट फिट ने मुंबई के इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ स्वप्निल पारिख और दिल्ली के होली फैमिली हॉस्पिटल में क्रिटिकल केयर मेडिसिन डिपार्टमेंट के हेड डॉ सुमित रे से बात की. जिस पर डॉ स्वपनिल ने कहा कि बेड की संख्या और सप्लाई के बजाए असल मुद्दा कोरोना के तेजी से बढ़ते मामले हैं. जब तक हम इस उछाल पर काबू नहीं पाते, तब तक शॉर्टेज की समस्या बदतर ही होगी. हमने बेड, PPE वगैरह की सप्लाई पहले से ही बढ़ा रखी है. हमने तैयारी की, लेकिन इसकी भी एक सीमा है और सिस्टम पर बोझ काफी बढ़ गया है. मेडिकल प्रोफेशनल्स जो कर सकते हैं, वो कर रहे हैं, हम उनसे इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं कर सकते हैं.
“इस उछाल की भविष्यवाणी की गई थी और चेतावनी के शुरुआती संकेत थे. इसकी चेतावनी देने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की उपेक्षा नेतृत्व की एक भयावह विफलता है. यह वही महामारी है, जिसके बारे में हमें चेतावनी दी गई थी. 2020 एक शुरुआत थी, अब जो आ रहा है, वह और भी बुरा है. सभी को लग रहा था कि महामारी खत्म हो गई है. यह एक गलत धारणा थी और कई सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेताया भी, लेकिन उनकी चेतावनी को अनसुना कर दिया गया. देश में हर्ड इम्यूनिटी या भारतीयों की इम्यूनिटी बेहतर होती है जैसी धारणाएं बन रही थीं.”डॉ. स्वप्निल पारिख, मुंबई के इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट
- वहीं डॉ सुमित रे कहते हैं कि “2020 में लॉकडाउन के साथ उछाल धीमा था और हम क्षमता बढ़ा सकते थे. अब लोगों के घूमने-फिरने और सामूहिक समारोहों, शादियों, कुंभ मेला आदि के साथ-साथ, अस्पतालों को तुरंत COVID अस्पतालों में बदलना मुश्किल है.”
- डॉ. रे कहते हैं कि हम पिछली महामारियों से सीख सकते हैं और भविष्यवाणी कर सकते हैं कि यह छोटे क्षेत्रों में शिफ्ट होगा, हम पहले से ही टियर 2 और 3 शहरों को प्रभावित होते हुए देख रहे हैं. उनके पास बुनियादी ढांचा नहीं है और इससे मृत्यु दर बढ़ सकती है.
5.वैक्सीनेशन से उम्मीद, लेकिन यहां भी है फेल
दुनिया के बाकी देशों से जो अनुभव देखने को मिले हैं वो बताते हैं कि कोरोना अपनी दूसरी लहर में तेजी से फैलता है. लगभग सारे देशों में पहली लहर के मुकाबले दूसरी लहर अधिक घातक रही है. लेकिन हमारे यहां किसी भी प्रकार की ठोस व्यवस्था सरकार ने नहीं की. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोरोना की दूसरी लहर को नियंत्रित करने के लिए, वैक्सीनेशन पर भी जोर देने की जरूरत है, लेकिन इस मोर्चे पर भी सरकार पीछे होते हुए दिख रही है.
बीबीसी के मुताबिक मुंबई के जसलोक अस्पताल के मेडिकल रिसर्च के डायरेक्टर डॉक्टर राजेश पारेख ने कहा कि है पोलियो और स्मॉल पॉक्स में भारत ने घर-घर जैसे वैक्सीन पहुंचाया था, राज्य सरकार को वैक्सीनेशन अभियान में तेजी लाने के दूसरे उपाए जल्द करने होंगे. इस मामले में राज्य सरकार और भारत सरकार दोनों ही दूसरे देशों से सबक नहीं ले पाए.
• डॉक्टर राजेश पारेख ने महामारी पर ‘दि कोरोना वायरस बुक' और ‘दि वैक्सीन बुक' नाम से दो किताबें लिखी है. उन्होंने अपनी पहली किताब में कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर के बारे में लिखा था और बताया था कि हमें तैयार रहने की जरूरत है.
खुद के लिए हो रही है वैक्सीन की कमी, एक्सपोर्टर से इम्पोर्टर बन रहा भारत
अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में जहां वैक्सीन लगाने की गति काफी तेज है. वहां की आबादी के एक बड़े हिस्से को टीका लग चुका है. कुछ हफ्ते तक दूसर देशों को वैक्सीन एक्सपोर्ट करने वाला हमारा देश अब वैक्सीन आयात करने की बात कर रहा है. TOI की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत जनवरी के आखिर और मार्च के बीच 64 मिलियन डोज दूसरे देशों को भेज चुका है. लेकिन अब जब देश में वैक्सीनेशन की प्रकिया को गति देने की बात की जा रही है तो वैक्सीन की कमी होने लगी है. यहां भी सरकार का पूर्वानुमान और रणनीति फेल हो गई है.
दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट उत्पादन बढ़ाने के लिए महज 3 हजार करोड़ मांग रहा है लेकिन इस पर कोई एक्शन नहीं है. अब जाकर हम कई विदेशी वैक्सीनों को मंजूरी देने की बात कर रहे हैं लेकिन ये काम पहले क्यों नहीं किया. अमेरिका ने एक साथ सात वैक्सीन पर दांव लगाया था.
6. पहला नहीं दूसरा कदम
पूरे महामारी के काल में आप सरकार एक रवैया ये देख सकते हैं कि जब स्थिति नाजुक होती है तो एक्शन लेती है. पहला कदम नहीं उठाती. जब कोरोना अपनी चाल चल जाता है तो सरकार प्रतिक्रिया देती है न कि पहले से रोकथाम करती है. जैसे हमने पिछले साल लॉकडाउन में शायद देरी की. लॉकडाउन लगाया तो शायद पूरी तैयारी के साथ नहीं. लाखों की जिंदगी मुश्किल में पड़ गई. 24 मार्च को पीएम ने लॉकडाउन का ऐलान किया और 13 मार्च को यानी महज 9 दिन पहले स्वास्थ्य मंत्रालय कहा रहा था कि भारत में कोई हेल्थ इमरजेंसी नहीं है. सरकार के एक हाथ को लगता है दूसरे हाथ के बारे में पता नहीं...ताजा केस देखिए अब सरकार ने विदेशी वैक्सीनों को फास्ट ट्रैक अप्रूवल देने का फैसला किया है, इसके महज चंद दिनों पर पहले राहुल गांधी ने यही मांग की तो एक केंद्रीय मंत्री ने कहा था - राहुल गांधी विदेशी कंपनियों के लिए लॉबिइंग कर रहे हैं. चाहे वो टेस्ट किट की बात हो या फिर RT-PCR टेस्ट या फिर पीपीई किट की, जब भारी कमी हो गई तो हमने कदम उठाया और चीजें ठीक करने लगे.
इस बार भी शायद हम वैक्सीन का उत्पादन बढ़ा लेंगे लेकिन जो किल्लत पैदा हुई है उसके कारण शाय लाखों संक्रमित हो जाएंगे, हजारों की मौत हो जाएगी.
7.सरकार के साथ-साथ जनता ने भी की लापरवाही
देश-दुनिया के विशेषज्ञ और डॉक्टर्स यही कहते आए हैं कि कोरोना से बचाव के लिए मास्क, दो गज दूरी, बार-बार हाथ धोना और भीड़ से बचना सबसे ज्यादा जरूरी है. लेकिन हमारे देश में कुछ दिनों बाद लोगों ने इसे गंभीरता से लेना बंद किया जिसके परिणाम अब खौफनाक रूप से सामने आ रहे हैं. मेडिकल सुविधाओं की कमी के कारण संक्रमितों के बढ़ने के साथ-साथ मौतों का अंकड़ा भी बढ़ता जा रहा है. हम और हमारी सरकारें में अभी भी सुधार नहीं हुआ तो परिणाम और भयानक हो सकते हैं.
- डॉ. स्वपनिल पारिख का कहना है कि बड़े पैमाने पर भीड़ और नेताओं ने बिना मास्क वाली भीड़ देखी है. इससे जनता का रवैया भी ढीला हो जाता है.
- वहीं डॉ. सुमित रे कहते हैं कि कई नेताओं का मानना है कि उन्हें वैक्सीन लग चुकी है या वो कोविड से उबर चुके हैं और सार्वजनिक रूप से बिना मास्क या बिना दूरी बनाए लोगों से मिल रहे हैं.
तो आखिर में यही बात कहनी है कि कोविड महामारी के लिए दूसरों को दोष से कुछ फायदा होता नहीं दिखता, ऐसे में खुद ही सावधान रहें. सामाजिक दूरी और हैंडवॉश और मास्क जरूरी.
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