क्या राहुल गांधी सेवा दल की खोई प्रतिष्ठा वापस दिलाएंगे ?
राहुल करेंगे सेवा दल के महाधिवेशन को संबोधित 
राहुल करेंगे सेवा दल के महाधिवेशन को संबोधित (फोटो-पीटीआई) 

क्या राहुल गांधी सेवा दल की खोई प्रतिष्ठा वापस दिलाएंगे ?

राजस्थान के अजमेर में करीब 30 साल बाद हो रहे सेवा दल के महाधिवेशन को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी संबोधित करेंगे. इस कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया जा रहा है. सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालजी देसाई ने अजमेर के पटेल इनडोर स्टेडियम में कार्यक्रम की तैयारियों का जायजा लिया. इसके बाद उन्होंने पत्रकारों को कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी दी.

देसाई ने कहा कि सेवा दल का राष्ट्रीय अधिवेशन अजमेर के कायड़ विश्रामस्थली पर 13 और 14 फरवरी को आयोजित किया जा रहा है.

सेवा दल का इतिहास?

  • सेवा दल की स्थापना 1 जनवरी 1924 को हिंदुस्तानी सेवा मंडल के रूप में हुई थी
  • जवाहरलाल नेहरू इसके प्रथम अध्यक्ष थे
  • ब्रिटिश राज की हुकूमत के खिलाफ गठित इस दल को मिलिशिया की तर्ज पर बनाया गया था
  • शुरुआत में कांग्रेस के भीतर इसका काफी विरोध हुआ
  • सत्य और अहिंसा के मूल सिद्धांतों को मानने वाले अधिकांश कांग्रेसी नेता शुरुआत में इसके पक्षधर नहीं थे
  • साल 1931 में इसका नाम बदलकर कांग्रेस सेवा दल कर दिया गया
  • इसका प्रमुख काम कांग्रेस के लिए वॉलेंटियर तैयार करना और उन्हें ट्रेनिंग देना था

उस समय के हिंदुस्तान के सभी प्रांतों में इस दल का गठन किया गया और हर प्रान्त में इसके कमांडिंग ऑफिसर बनाए गए. इसके सदस्यों को किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होने की इजाजत नहीं थी.

साल 1932 में सेवा दल ने महिलाओं का सशस्त्र दस्ता गठित किया, जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने आजीवन बैन कर दिया.

दो साल बाद इसकी ही तर्ज पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गठन किया गया था. सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, राजगुरु जैसे क्रन्तिकारी इस दल के अध्यक्ष रहे. सेवा दल को गांधी टोपी के नाम से भी जाना जाता था. इसके उग्र तेवर और कार्यप्रणाली से अंग्रेज भी डरते थे.

इस संगठन से अंग्रेज कितना घबराते थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1932 में अंग्रेजों ने कांग्रेस और इस दल पर बैन लगा दिया. बाद में कांग्रेस से तो प्रतिबन्ध हटा लिया गया, लेकिन हिंदुस्तानी सेवा दल से नहीं.

इसकी युवाओं में बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए 1931 में सरदार वल्लभ भाई पटेल की सिफारिश पर इसके स्वतंत्र अस्तित्व को खत्म करते हुए इसे कांग्रेस का हिस्सा बना दिया गया. आजादी मिलने के बाद इस संगठन का कोई मूल मकसद नहीं रह गया था.

कांग्रेस पार्टी और उसके सदस्य चुनाव प्रक्रिया में जुट गए. उनकी राजनीतिक भागीदारी कायम रही, वहीं सेवा दल उपेक्षित होते-होते लगभग निष्क्रिय हो गया.

कैसे बना सेवा दल?

आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के नेता अंग्रेजों का विरोध करते हुए जेल जाते थे और फिर बाद में सरकार से माफी मांग कर बाहर आ जाते थे. पहली बार 1921 में नागपुर में झंडा सत्याग्रह के दौरान डॉ. नारायण सुब्बाराव हार्डिकर और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

बहुत से कांग्रेसी नेता, अंग्रेजों के जुल्म और प्रताड़ना से तंग आकर माफीनामा लिखकर बाहर आ जाते थे. लेकिन हार्डिकर और उनके हुबली सेवा मंडल के साथियों ने माफी मांगने से इनकार कर दिया. इसके बाद कांग्रेस के बड़े नेताओं की नजर इन पर पड़ी और ये तय किया गया की पार्टी के सदस्यों को प्रशिक्षित करने की जरूरत है.

जेल से छूटने पर हार्डिकर नेहरू से मिले और ब्रिटिश राज से लड़ने के लिए एक लड़ाका संगठन बनाए जाने पर विचार विमर्श हुआ. 1923 में कांग्रेस के कर्नाटक के काकिनाका अधिवेशन में कांग्रेस ने नारायण सुब्बाराव हार्डिकर के नेतृत्व में एक कमिटी का गठन किया गया. पंडित नेहरू इसके प्रथम अध्यक्ष बनाये गए.

आजादी के बाद सेवा दल के प्रमुख काम

सेवा दल हमेशा से कांग्रेस पार्टी के लिए बैक-अप सपोर्ट का काम करती रही है. आजादी के बाद जब भी कांग्रेस संकट में आयी है, तब-तब सेवा दल ने अपनी भूमिका का निर्वाह किया है.

पंजाब में खालिस्तान चरमपंथ के दौर में इंदिरा गांधी ने जब इसके खात्मे के लिए ऑपरेशन ब्लू स्टार वॉर चलाया, तो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में काम करना नामुमकिन सा हो गया था. ऐसे में सेवा दल ने आतंक के साये में रहते हुए शांति व्यवस्था कायम करने में बेहतरीन भूमिका निभाई.   

आपातकाल के बाद जब इंदिरा गांधी सत्ता से बाहर हुईं, तो उनकी जान को काफी खतरा था. ऐसे में एक बार फिर से सेवा दल के सदस्यों ने इंदिरा गांधी को सुरक्षा प्रदान की. इसके सदस्य हमेशा इंदिरा गांधी के इर्द गिर्द चौबीसों घंटे उनकी हिफाजत में खड़े रहे.

मौजूदा राजनीतिक हालातों में इसे संघ के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे समय में 30 साल बाद हो रहे सेवा दल के राष्ट्रीय अधिवेशन को आयोजित करने के पीछे राहुल गांधी की मंशा तो आगे देखने को मिलेगी.

लेकिन एक बात तो तय है, कांग्रेस अध्यक्ष एक बार फिर से इसे एक्टिव करने के पूरे मूड में हैं और ये बीजेपी के लिए चिंता की बात हो सकती है.

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