कोरोना से कराहते छत्तीसगढ़ में बीमार हेल्थ सिस्टम की 2 कहानियां

आंकड़े बताते हैं कि राज्य में कोरोना का अटैक महज 10 दिन में डबल हो गया

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कोरोना से कराहते छत्तीसगढ़ में बीमार हेल्थ सिस्टम की 2 कहानियां

छत्तीसगढ़ कोरोना संकेड वेव में सबसे ज्यादा पीड़ित राज्यों में से एक है. लेकिन स्वास्थ्य इंतजाम यहां भी नाकाफी हैं. स्थिति को समझने के लिए क्विंट ने कोविड से जान गंवा चुके दो लोगों के परिवार से जाना कि किस तरह लोग ऑक्सीजन से लेकर बेड हासिल करने की जद्दोजहद में एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल के चक्कर लगाते हैं. कैसे अस्पतालों से लोगों को मदद नहीं मिलती या फिर मदद मिलने में इतनी देर हो जाती है कि उनके अपने बगैर इलाज के अलविदा कह जाते हैं. उसके बाद भी परिजनों का संघर्ष खत्म नहीं होता, अपनों के शव मिलने से लेकर उनके अंतिम संस्कार तक परिजनों को किस तरह से संघर्ष करना पड़ता है. जानिए वह सब कुछ क्विंट की इस ग्राउंड रिपोर्ट में.

पहला केस

रायपुर की रहने वालीं ज्योति गुप्ता बताती हैं कि 'मेरे पिता बाबू लाल वार्शने' को 3 अप्रैल के दिन कोविड डिटेक्ट हुआ. इस खबर के बाद हमने रायपुर के सभी असपतालों से सम्पर्क किया. कहीं बेड नहीं मिल रहा था. बड़े संघर्ष के बाद 'आरोग्यम' अस्पताल पहुंचे. अस्पताल की ओर से कहा गया कि ऑक्सीजन लेवेल डाउन है इसलिए आप ले जाइए. जब कहीं कोई भी उनको भर्ती करने के लिए तैयार नहीं हुआ, तब कई लोगों से पैरवी कराने के बाद हम मेकाहार अस्पताल पहुंचे. वहां कोई इंजेक्शन लगाया गया जिसके बाद पापा की हालत बिगड़ने लगी.'

“पापा को लगी ऑक्सीजन भी ठीक से सप्लाई नहीं हो रही थी. नर्स को कम्प्लेन करने के बाद भी कोई मदद नहीं मिली. डॉक्टर तो उपलब्ध ही नहीं थे. जब कोई सुनवाई नहीं हो रही थी तब हमने पापा की बिगड़ती हालत को देख कर जिले के चीफ मेडिकल ऑफिसर और कलेक्टर से अपने पहचान वालों की मदद से बात करवाई. ये सब होते होते 4 अप्रैल की दोपहर हो चुकी थी. जिले के कलेक्टर से कराई गई पैरवी के बाद एक पेपर अस्पताल की ओर से मिला, कहा गया कि ICU में एडमिट करने का प्रोसेस पूरा कीजिए. हम खुश तो गए, लेकिन प्रोसेस इतना पेचीदा था कि चार घंटे लग गए लेकिन ICU नहीं भेजा गया.” 
ज्योति गुप्ता

ज्योति गुप्ता ने कहा , "हमसे कहा गया कि वार्ड ब्वॉय नहीं है, स्ट्रेचर नहीं है, तभी एक व्हील चेयर टूटी हुई दिखी. हमने कहा हम खुद ले जाएंगे ICU, वह व्हील चेयर मुझे दीजिए. तभी मालूम हुआ कि पापा की सिर्फ पल्स चल रही हैं. हमने हंगामा किया तब पापा को ICU भेजा गया. लेकिन, वहां पहुंचने के बाद मालूम हुआ कि पापा की डेथ हो गई."

“जब हमने दाह-संस्कार के लिए बॉडी मांगी तो नहीं दी गई. कहा गया कि अभी शव को शव गृह में रखा जाएगा. हमारे सामने अस्पताल कर्मी द्वारा शव गृह में शव रख दिया गया. लेकिन 5 अप्रैल की सुबह जब हम शव लेने गए तो कहा गया शाम को आइए. जब शाम को गए तो कहा गया कि सुबह आइए. ये सिलसिला 7 अप्रैल तक चला. 7 अप्रैल को अस्पताल की तरफ से बताया गया कि आपके पेपर गुम हो गए हैं इस लिए शव मिसिंग हो गया है. ये सब देख कर फिर से VIP लोगों की पैरवी कराई गई तब जाकर शव 12 अप्रैल को मिला. शव की जब तलाश हो रही थी तब हमने देखा कि उस वक्त पापा के शव की तलाश 95 शवों से होकर गुजरी, अंततः पापा का शव मिला, फिर उसी दिन उनका दाह संस्कार कर दिया गया.”
ज्योति गुप्ता

रायपुर के जोनल हेल्थ ऑफिसर रवि कुमार लावण्या ने बताया, "बाबू लाल वार्ष्णेय की बॉडी को मेकाहारा अस्पताल का सिग्नेचर ऑफिस दे नहीं पाया. यह बात जब सामने आई हमने तलाश कराकर उसका दाह संस्कार कराया. रही बात आज के हालात के बारे में तो दाह संस्कार में दिक्कत नहीं है. तीन चार दिनों पहले दिक्कत थी. तब शव वाहन से लेकर मुक्ति धाम की कमी थी. लेकिन जब सभी शमशान को दाह संस्कार कराने का आदेश हुआ तब से तत्काल दाह संस्कार हो रहे हैं. साथ ही हमने दस प्राइवेट वाहन को शव वाहन बना दिया है."

दूसरा केस

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के मशहूर जर्नलिस्ट पन्ना लाल को 9 अप्रैल को ऑक्सीजन की कमी थी. ये देख कर परिजन निकट के सरकारी अस्पताल 'मेकाहारा' ले गए. उनके पुत्र मनीष गौतम बताते हैं कि अस्पताल पहुंचने पर हम सुबह 9 बजे से शाम चार बजे तक मिन्नत करते रहे कि मेरे पापा को ऑक्सीजन लगा दीजिए और बेड दे दीजिए. लेकिन उन्होंने न तो बेड दिया, न ही पापा को ऑक्सीजन मिली.

“बाहर चेयर पर बैठे लोगों को देखा कि जिन लोगों को ऑक्सीजन की जरूरत थी, उनके सिलेंडर काम नहीं कर रहे थे. कुछ टेक्नीशियन घंटों बैठ कर सिलेंडर के वाल्व ठीक करने की कोशिश करते रहे. लेकिन सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक उस जगह किसी को गैस सिलेंडर नहीं मिला. जब मैं अस्पतालकर्मी से गिड़गिड़ाने लगा तो उन्होंने कहा अपने पापा की कोविड टेस्ट की रिपोर्ट लाइए.”  
मनीष गौतम

मनीष कहते हैं, "मैं पापा को किसी तरह पैदल मेकाहार के टेस्ट सेंटर ले गया वहां ले जाने के लिए न व्हील च्यर मिली न ही स्ट्रेचर मिला. बहरहाल किसी तरह ढाई बजे मैंने पापा का कोविड टेस्ट कराया. रैपिड टेस्ट का रिजल्ट पॉजिटिव आया. पॉजिटिव रिपोर्ट दिखाकर मेकाहारा अस्पताल में हमने पापा को भर्ती करने की फिर से मिन्नत की. लेकिन मेकाहार ने बेड नहीं दिया. थक हार कर शाम 4:30 बजे हम मजबूरन प्राइवेट अस्पताल केयर & केयर गए."

“उन लोगों ने ऑक्सीजन लेवल की जांच की और अपने हाथ खड़े करते हुए कहा कि ये नहीं बचेंगे घर ले जाइए. मैं गिड़गिड़ाने लगा कि बेड दे दीजिए. उसने कह तो दिया ठीक है लेकिन सात बज गए और न बेड मिला न ही ऑक्सीजन. मजबूरी में हम वहां से निकल कर एम्स पहुंचे. वहां गिड़गिड़ाने के बाद कई घंटे बाद पापा को ऑक्सीजन मिली. फिर पापा की हालात में सुधार आया. लेकिन बेड तो उपलब्ध नहीं था. बेड के लिए एम्स में हमने बहुत मिन्नतें कीं. लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ.”  
मनीष गौतम

मनीष ने क्विंट को बताया, "तब हम शहर के दूसरे अस्पतालों के चक्कर लगाने लगे कि किसी तरह बेड मिल जाए. बहरहाल तीन घंटे बाद मुझे एम्स से कॉल आई कि बेड उपलब्ध है आप आ जाइए. मैं जैसे ही एम्स के रिसेप्शन पर पहुंचा तो मालूम हुआ कि अभी एम्बुलेंस नहीं है, कहा गया कि एम्स में दो ही एम्बुलेंस हैं. दो में से जब कोई एक एम्बुंलेंस आएगी तब ही बेड मिलेगा. दो घंटे गिड़गिड़ाने के बाद एंबुलेंस मिली जिसकी मदद से पापा को 3C ब्लॉक में एडमिट किया."

“उसके बाद मैं घर आ गया. सुबह 5 बजे कॉल आई कि पापा सीरियस हैं उनको ICU शिफ्ट किया. मैं जब वहां पहुंचा, कोई कुछ बता नहीं रहा था. लगभग 9 बजे दो डॉक्टर आए और बताया कि पापा का देहांत हो गया है. मैंने बॉडी मांगी तो मालूम हुआ कि समय लगेगा. मैंने देखा कि लोगों को बॉडी मुक्ति धाम में अंतिम संस्कार के लिए ले जाने के लिए पैरवी चाहिए वरना तीन से चार दिन इंतजार करना पड़ता है. मैंने हालात को देखते हुए पर्सनल एंबुलेंस 4000 ₹ की बड़ी कीमत पर बुक की और पैरवी करवाकर किसी तरह शाम को 5 बजे पिता जी का शव हासिल किया.” 
मनीष गौतम

मनीष का कहना है, "अगर मेरे पास अपनी कार, अपनी बुक की गई एंबुलेंस, बात बात पर खर्च करने के लिए पैसा न होता तो मैं पापा की लाश हासिल करने के लिए सभी की तरह कई दिनों तक संघर्ष कर रहा होता. क्योंकि रायपुर के किसी अस्पताल में कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं है. यह सब तब हुआ है जब मेरे 60 वर्षीय पिता छत्तीसगढ़ के जाने माने जर्नलिस्ट थे."

2011 जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ की आबादी करीब 2.5 करोड़ थी. अब इसके हिसाब से कोविड इंतजाम देखेंगे तो अंदाजा लग जाएगा कि प्रति व्यक्ति सुविधाएं नाम मात्रा की हैं.

गवर्नमेंट डेडिकेटेड कोविड अस्पताल

  • कुल बेड-4276
  • ICU बेड-484
  • HDU बेड-469
  • ऑक्सीजन बेड-1777

गवर्नमेंट कोविड केयर सेंटर

  • कुल बेड-14608
  • ICU और HDU बेड-0
  • ऑक्सीजन बेड-1787

प्राइवेट कोविड अस्पताल

  • कुल बेड-3082
  • ICU बेड-832
  • HDU बेड-381
  • ऑक्सीजन बेड-1232

छत्तीसगढ़ में वेंटिलेटर

  • सरकारी-815
  • प्राइवेट-301
कोरोना से कराहते छत्तीसगढ़ में बीमार हेल्थ सिस्टम की 2 कहानियां

अगर दुर्ग जिला की बात की जाए तो इस जिले की आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 3,343,872 आबादी थी. आज दुर्ग में इस आबादी के लिए कुल 285 ऑक्सीजन बेड हैं.

17 अप्रैल को दुर्ग की स्थिति

  • नए केस- 1887
  • कुल केस - 66048
  • एक्टिव केस - 18137
  • होम आइसोलेशन - 2905
  • मृत्यु - 19

रायपुर में 2011 की जनगणना के अनुसार   4,063,872 आबादी है. इस आबादी के लिहाज़ से प्रदेश की राजधानी रायपुर में ऑक्सीजिनेटेड बेड की संख्या महज 500 है. जबकि इस आबादी और बेड की संख्या की तुलना में रायपुर में 17 अप्रैल को कोविड केस की संख्या पर एक नजर-

  • नए केस- 3603
  • कुल केस - 113735
  • एक्टिव केस - 26514
  • होम आइसोलेशन - 1489
  • मृत्यु - 73

क्यों बढ़ा कोविड?

इस सवाल के जवाब में BJP प्रवक्ता गौरी शंकर कहते हैं कि "सबसे बड़ा कारण दूरदर्शिता की कमी है. कुछ दिनों पहले कोविड केस कम थे लेकिन इसी बीच 'रोड-सेफ्टी' के नाम से क्रिकेट सीरीज रायपुर में हुई. इस सीरीज में बड़ी संख्या में महाराष्ट्र के अलावा विदेश से लोग मैच देखने आए. मैच में भीड़ हो इसके लिए बड़ी संख्या में हर मैच के पास बांटे जाते थे. लोगों को मैच देखने के लिए प्रेरित किया जाता था. इसी समय यहीं से लापरवाही हुई.

“सचिन तेंदूलकर उस सीरीज का हिस्सा थे जो कोविड पॉज़िटिव हो गए थे.आज सबसे बड़ा मसला है कि लोग खुद को कोविड संक्रमित मान कर टेस्ट कराते हैं लेकिन रिपोर्ट पांच से सात दिन में आती है. अब इतने दिनों में उस व्यक्ति से संक्रमण तो फैलेगा, इसके लिए सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किया.’’
BJP प्रवक्ता गौरी शंकर

गौरी शंकर आगे कहते हैं कि आज छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ा चैलेंज रेमडिसिविर इंजेक्शन की अनुपलब्धता है. दरअसल जब लोगों को यह खबर मिली कि यह इंजेक्शन जीवन रक्षक है, वहीं से इसकी कालाबाजारी शुरू हो गई. लोगों ने आठ दस हजार में यह इंजेक्शन खरीदे हैं. जबकि दूसरी तरफ वैक्सीन उस मात्रा में नहीं मिल रही जिस मात्रा में हमें चाहिए. इसी तरह ऑक्सीजन की उपलब्धता प्रदेश भर के अस्पतालों में पूरी तरह प्रभावित है.

“वैक्सीनेशन में हम देश भर में टॉप पर हैं. आज 15% लोगों को वैक्सीनेशन हमने की है. सीमित प्रोडक्शन की वजह से केंद्र सरकार भी मजबूर है. अत: देश भर के लिए हो रहे सीमित प्रोडक्शन की तुलना में हमारे पास सीमित वैक्सीनेशन का विकल्प है. हमारी कैपसिटी साढ़े तीन लाख वैक्सिनेशन की है तो हम डेढ़ लाख के आस पास वैक्सीनेशन कर रहे हैं. हमने विदेशों से वैक्सिन लेने में भी देरी की.”  
क्विंट से स्वास्थ्य मंत्री टी सिंहदेव  

स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि यह हालात बहुत ही चुनौतीपूर्ण हैं. कोविड केसेज में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है. लेकिम हम प्रयास कर रहे हैं कि अपनी ओर से बेहतर सेवा दे सकें. उन्होंने कहा, "6 मेडिकल कॉलेज के अलावा हमने 36 डेडिकेटेड अस्पताल एवं 137 कोविड केयर सेंटर स्थापित किए हैं. हमने ऑक्सीजन बेड की संख्या एक हफ्ते में 11 हजार पहुंचाने का टारगेट रखा है. जबकि रेमडिसिविर इंजेक्शन जिन कंपनियों के द्वारा सप्लाई हेतु टेंडर था, उनके इंकार करने के कारण हमने सेंट्रल गवर्नमेंट की एजेंसीज़ से बात की है, उनका सहयोग मिल रहा है, उन्होंने कंपनी को कहा है कि जल्द आपूर्ति कीजिए. असल में इंजेक्शन तैयार होने के प्रोसेस में 16 से 18 दिन लगते हैं. इस लिए 3 अप्रैल को प्रोडक्शन की शुरुआत हुई है, वह जल्द ही उपलब्ध हो जाएगी. इंजेक्शन की कालाबाजारी अफोससजनक बात है. हम इसे रोकने के लिए प्रयासरत हैं."

छत्तीसगढ़ के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अजय चन्द्राकर कहते हैं कि - "फिलहाल छत्तीसगढ़ में सरकार नाम की जो चिड़िया है वह सिर्फ बयानों में दिखाई दे रही है. छत्तीसगढ़ में चल रही वर्चुअल सरकार को अंदाज़ा ही नहीं था कि स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी. कोविड से जंग के लिए कोई भी चीज चाहे वह रेमडिसिविर हो, अस्पताल के बेड हों, वेंटीलेटर के मामले में हों, ऑक्सीजन बेड हो, सब कागज पर हैं.

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