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कोरोना पर फेक न्यूज से पूरे साल लड़ता रहा क्विंट वेबकूफ,130 झूठ का किया पर्दाफाश

आम आदमी से ज्यादा खास लोगों ने फैलाया कोरोना पर झूठ, वैक्सीन को लेकर डर भी पैदा किया

Updated

साल 2021अपने अंत की तरफ बढ़ रहा है, वह साल जब पूरी दुनिया ने कोरोनावायरस (Coronavirus) की दूसरी लहर (Second Wave) का प्रकोप झेला. कोरोना जहां पहले से ज्यादा भयावह रूप में था वहीं ऑक्सीजन की किल्लत ने इस संकट को और भी विकराल बना दिया था.

हालांकि, कोरोना के साथ ही एक बड़ी चुनौती फेक न्यूज (Fake News) भी थी. 2021 के अंत में जब कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन ने दस्तक दी है, तब फिर इसको लेकर फैलाई जाने वाली अफवाहें सिर उठाने लगी हैं.

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साल 2021 की तरफ मुड़कर देखें तो नज़र आता है कि एक तरफ फेक न्यूज के जाल में फंसकर लोग वायरस को गंभीरता से न लेने की गलती कर रहे थे, तो वहीं दूसरी तरफ वैक्सीन (Coronavirus Vaccine) को लेकर फैल रही भ्रामक सूचनाओं को सच मानकर लोगों में वैक्सीन को लेकर झिझक लगातार बढ़ रही थी. इस बीच क्विंट की वेबकूफ टीम ने लगातार इन दावों की पड़ताल की और सच आप तक पहुंचाया.

कैसे वायरस की तेजी से ही फैली फेक न्यूज 

वेबकूफ टीम ने कोरोना महामारी और वैक्सीन से जुड़ी कुल 130 फैक्ट चेक स्टोरी जनवरी से दिसंबर के बीच कीं.

इनमें से तकरीबन 62 स्टोरीज यानी 48% स्टीरी उन दावों की पड़ताल के लिए थीं, जिनमें सीधे तौर पर कोरोनावायरस और वैक्सीन को लेकर झूठा दावा किया गया.

वहीं सिर्फ वैक्सीन को लेकर फैली अफवाहों की बात करें, तो 13% स्टोरी ऐसे दावों की पड़ताल थी जो वैक्सीन को लेकर लोगों को डराते हैं. जैसे - वैक्सीन लेने के 2 साल बाद मौत हो जाएगी या फिर वैक्सीन का दूसरा डोज लेने के बाद संक्रमण का खतरा बढ़ जाएगा. यहां तक की पुरुषों में वैक्सीन लेने के बाद फर्टिलिटी कम होने का डर भी फैलाया गया.

9% यानी 12 स्टोरी में कोरोना का घरेलू इलाज बताते दावों की पड़ताल थी. ऐसा इलाज जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं. मसलन गरम पानी से संक्रमण खत्म हो जाएगा, कपूर सूंघने से ऑक्सीजन लेवल बढ़ जाएगा या फिर फिटकरी से कोरोना संक्रमण खत्म हो जाएगा.

कई दावे तो ऐसे भी थे, जिन्हें अगर कोरोना का सही इलाज मानकर अपना लिया गया, तो शरीर के लिए दूसरे खतरे पैदा कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में दावा किया गया कि नाक में नींबू का रस डालने से वायरस का संक्रमण खत्म हो जाएगा,जबकि एक्सपर्ट्स के मुताबिक ऐसा करने से अल्सर की समस्या हो सकती है.

वहीं गर्म पानी से कोरोना ठीक होने जैसे दावों को सच मानने का नुकसान ये है कि इससे कोरोना प्रूफ होने का झूठा आभास होता है.

वैक्सीन को लेकर भ्रामक दावे पूरे साल किए जाते रहे. वहीं जिस वक्त देश कोरोना की गंभीर दूसरी लहर का सामना कर रहा था और ऑक्सीजन की कमी से कोरोना संक्रमित जूझ रहे थे, तब ऑक्सीजन क्राइसिस को लेकर भी कई भ्रामक दावे किए गए.

कहीं ये दावा किया गया कि मास्क लगाने से ऑक्सीजन लेवल कम हो जाता है, तो कभी बिना वैज्ञानिक आधार के ये कहा गया कि कपूर सूंघने से ऑक्सीजन लेवल बढ़ जाता है.

कम वैक्सीनेशन के लिए फेक न्यूज भी जिम्मेदार?

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में अब तक कोरोना वैक्सीन के 143 करोड़ से ज्यादा डोज लगाए जा चुके हैं.

आबादी के लिहाज से देखें तो लगभग इतने ही डोज और लगने बाकी हैं. जब 50% वैक्सीनेशन बचा हो, ऐसी स्थिति में वैक्सीन को लेकर हो रहे भ्रामक दावों के चलते लोगों में मौजूद झिझक 100% वैक्सीनेशन में बाधा बनेगी. ये कितनी बड़ी चुनौती थी इसका अंदाजा क्विंट के 18 अप्रैल से 12 मई के बीच हुए सर्वे के नतीजों से ही लगाया जा सकता है

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों के करीब 42 प्रतिशत लोगों ने सर्वे में साफ तौर पर कहा था कि वो कोविड 19 वैक्सीन नहीं लगवाएंगे, क्योंकि इससे मौत का खतरा है.

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क्विंट की वेबकूफ टीम ने कोरोनावायरस और वैक्सीन को लेकर फैलाए जा रहे भ्रामक दावों को लेकर एक खास प्रोजेक्ट की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य था ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को वैक्सीन से जुड़ी फेक न्यूज से बचाना और तथ्यात्मक जानकारी उन तक पहुंचाना.

इस प्रोजेक्ट के जरिए हमने न सिर्फ अफवाहों की पड़ताल की बल्कि उनका सच सुदूर क्षेत्र में रह रही उन महिलाओं तक उन्हीं की क्षेत्रीय भाषाओं में भी पहुंचाया, जिन तक आमतौर पर फैक्ट चेक स्टोरीज की पहुंच नहीं होती.

हमने ये सच पहुंचाया कि न तो वैक्सीन से संतानहीनता जैसा कुछ होगा और न ही वैक्सीन में कोई चुम्बकीय शक्ति है, जिससे आपके शरीर पर बरतन खिंचे चले आएं.

वैक्सीन, वायरस को लेकर भ्रमित करने वालों में कथित ''पब्लिक फिगर्स'' का भी हाथ

सोशल मीडिया पर ऐसा कंटेंट तेजी से वायरल होता है जो देखने में जादूई लगे, करिश्माई लगे. जैसे गौमूत्र पीजिए कोरोना ठीक हो जाएगा, एक टेबलेट खाने से कोरोना नहीं होगा. वहीं जब इस तरह के दावों को पब्लिक फिगर, नेता, अभिनेता ही फैलाने लगें तो इनके फैलने की रफ्तार कई गुना बढ़ जाती है.

जैसा कि हमने पहले बताया कि हमारी कुल 130 फैक्ट चेक स्टोरीज में से 12 ऐसे दावों पर आधारित थीं, जिनमें ऐसे घरेलू नुस्खों को कोरोना का इलाज बताया गया था, जिनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. इन 12 में से 7 तो ऐसे दावों पर थीं, जो योग गुरू बाबा रामदेव, सांसद साध्वी प्रज्ञा, एडवोकेट प्रशांत भूषण जैसी जानी-मानी हस्तियों ने ही फैलाए थे. यानी ऐसे दावों में 58% इन जाने माने लोगों का हाथ था.

एक बार नजर डालते हैं ऐसे कुछ दावों पर और दावों को फैलाने वाले फेक न्यूज पेडलर्स पर.

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पिछले साल अप्रैल में जब कोरोना संक्रमण रोकने के लिए देश भर में सख्त लॉकडाउन लगाया गया था. तब कोरोना की रफ्तार से ही फेक न्यूज भी फैल रही थी. वायरस को लेकर भ्रामक दावे करने वालों में योग गुरू बाबा रामदेव का भी नाम था. हद तो तब हो गई जब बाबा रामदेव एक न्यूज चैनल पर ये झूठा दावा कर रहे थे कि नाक में सरसों का तेल डालने से कोरोना संक्रमण खत्म हो जाता है.

2021 में भी रामदेव ने कोरोना को लेकर भ्रामक दावे किए. 19 फरवरी, 2021 में रामदेव ने तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की मौजूदगी में पतंजलि की टैबलेट ‘कोरोनिल’ की री-लॉन्चिंग की. री-लॉन्चिंग के कार्यक्रम में रामदेव ने ये दावा कर दिया कि कोरोनिल को WHO का अप्रूवल मिला है. रीलॉन्चिंग के कार्यक्रम में पीछे लगे बैनर को देखिए.

हालांकि, योगगुरु रामदेव इस कतार में पहला ही नाम हैं.....
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मई 2021 में भोपाल से बीजेपी सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने दावा किया कि गोमूत्र से कोरोना संक्रमण पर काबू पाया जा सकता है. इससे कुछ दिन पहले ही यूपी के बैरिया से विधायक और बीजेपी नेता सुरेंद्र सिंह ने गोमूत्र पीते हुए अपना वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया था. साथ ही ये दावा किया कि गौमूत्र ही कोरोना वायरस से बचा सकता है.

10 अप्रैल को एडवोकेट प्रशांत भूषण ने सोशल मीडिया पर ये दावा किया कि कोविड-19 को रोकने में मास्क प्रभावी नहीं हैं. दावे के साथ प्रशांत भूषण ने एक स्टडी पेपर भी शेयर किया. वेबकूफ की पड़ताल में ये दावा भ्रामक निकला. प्रशांत भूषण ने जो स्टडी पेपर शेयर किया उसका न तो पियर रिव्यू किया गया था, न ही उसमें किसी तरह के वैज्ञानिक प्रमाणों का जिक्र था.

पोस्ट का अर्काइव देखने के लिए यहां क्लिक करें

सोर्स : स्क्रीनशॉट/ट्विटर

2021 की तीसरी तिमाही में हुए सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि उस वक़्त तक भी कोरोना वैक्सीन को लेकर झिझक पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी. बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) द्वारा सितंबर में किए गए एक सर्वे में सामने आया कि वैक्सीन को लेकर झिझक शहरी आबादी और बुजुर्ग आबादी में ज्यादा है.

कोरोनावायरस से जुड़ी फेक न्यूज ज्यादा खतरनाक क्यों है?

जाहिर है सोशल मीडिया के बर्चस्व वाले इस दौर में सिर्फ कोरोना और वैक्सीन से जुड़े भ्रामक दावे नहीं किए जा रहे. कई तरह के दावे हैं राजनीति से जुड़े, इतिहास से जुड़े या अंधविश्वास से जुड़े. कोरोनावायरस को लेकर फैल रही फेक न्यूज ज्यादा हानिकारक इसलिए है क्योंकि ये आपको सीधे मौत की गर्त में ले जा सकती है.

फेक न्यूज के झांसे में आकर अगर आप समय पर वैक्सीन नहीं लेते हैं या फिर संक्रमण को रोकने के लिए मास्क का उपयोग नहीं करते हैं, तो जाहिर है फेक न्यूज जानलेवा साबित हो सकती है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कोरोनावायरस की चपेट में आकर पहले ही 4.80 लाख से ज्यादा भारतीय अपनी जान गंवा ही चुके हैं. वहीं दुनिया भर में ये वायरस 54 लाख से ज्यादा जानें ले चुका है.

अप्रैल- मई में हुए क्विंट के सर्वे में सामने आया था कि 56% लोग WhatsApp को जानकारी का एक विश्वसनीय सोर्स मानते हैं. वहीं करीब 11% ने वॉट्सएप को कोविड 19 के बारे में जानकारी का अपना प्राथमिक सोर्स माना.

वहीं दूसरी ओर, 55 प्रतिशत लोगों ने कहा था कि उन्हें फेसबुक पोस्ट पर भरोसा है. और 9 प्रतिशत इसे जानकारी का प्राथमिक सोर्स मानते हैं.

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सेज जर्नल की स्टडी में भी ये सामने आया कि कोरोनावायरस को लेकर फैल रही 90.05% फेक न्यूज का जन्म इंटरनेट पर ही होता है.

स्टडी में आगे बताया गया है कि इंटरनेट से फैलने वाली कोरोना से जुड़ी फेक न्यूज में से 84.94% का सोर्स सोशल मीडिया है. अकेले फेसबुक से ही कोरोना-वैक्सीन से जुड़े 66.87% भ्रामक दावे अस्तित्व में आते हैं

कोरोनावायरस और वैक्सीन को लेकर फैल रही फेक न्यूज को रोकने के लिए ट्विटर और फेसबुक ने अपनी पॉलिसी में बदलाव किए, ट्विटर ने एक नया फीचर शुरू करने की भी घोषणा की. हालांकि, इन सबके बावजूद भी मोटे तौर पर देखें तो इन प्लेटफॉर्म्स पर फेक न्यूज के फैलने के रास्ते बंद होते नहीं दिखे.

2021 में कोरोना की ही रफ्तार से फेक न्यूज भी फैली. साल के अंत में जब कोरोना के एक और खतरनाक वैरिएंट ओमिक्रॉन ने दस्तक दी है, तब संक्रमण से बचने के लिए मास्क, वैक्सीनेशन के साथ ही जरूरी है कोरोना से जुड़ी फेक न्यूज से बचना और अपने आसपास के लोगों को बचाना. महामारी के इस दौर में जरूरी है कि न खुद वेबकूफ बनें, न बनने दें.

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