चुनाव में लगी गैर मान्यता कंपनी-इंजीनियर, जवाब क्यों नहीं देता EC?
अखिलेश यादव की एसपी से लेकर मायावती की बीएसपी और लगभग पूरे विपक्ष ने ईवीएम और VVPAT पर सवाल उठाए.
अखिलेश यादव की एसपी से लेकर मायावती की बीएसपी और लगभग पूरे विपक्ष ने ईवीएम और VVPAT पर सवाल उठाए.फोटो : क्विंट हिंदी 

चुनाव में लगी गैर मान्यता कंपनी-इंजीनियर, जवाब क्यों नहीं देता EC?

पॉडकास्ट एडिटर : फबेहा सय्यद

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क्या हमारे चुनाव फूलप्रूफ हैं? चुनाव आयोग कहता है- हां. क्या किसी प्राइवेट पार्टी को EVM और VVPAT तक पहुंच देना चुनाव के फूलप्रूफ होने पर सवाल खड़ा करता है? जवाब  हैं- हां. क्या चुनाव की प्रक्रिया में किसी प्राइवेट पार्टी को लगाया गया? चुनाव आयोग कहता है- नहीं.

लेकिन क्विंट की पड़ताल बताती है - चुनाव आयोग का दावा गलत है और यही है आज का द बिग स्टोरी पॉडकास्ट.

अखिलेश यादव की एसपी से लेकर मायावती की बीएसपी और लगभग पूरे विपक्ष ने ईवीएम और VVPAT पर सवाल उठाए.

अब द क्विंट के पास 2017 के एक RTI का जवाब हाथ लगा है. इसके मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड यानि ECIL जो EVM और VVPAT बनाने वाली एक कंपनी है, उसने बताया था कि उन्होंने T&M सर्विसेज कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड नाम की एक प्राइवेट कम्पनी के इंजीनियरों की सर्विसेज “कंसल्टेंट” यानी सलाहकार के तौर पर ली थीं.

इन कंसल्टेंट्स का काम बेहद संवेदनशील था, जिनमें EVMs और VVPATs की जांच और रख-रखाव भी शामिल थे. इन प्राइवेट इंजीनियर्स की सर्विसेज First Level Checking से लेकर वोटों की गिनती खत्म होने तक ली गई थीं. यही नहीं हमें ये भी पता चला है कि T&M Services Consulting Private Limited....ECIL से मान्यता प्राप्त वेंडर नहीं है. ये रिपोर्ट क्विंट की रिपोर्टर पूनम अग्रवाल ने की है.
इस बारे में क्विंट ने पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी से बातचीत की. उन्होंने बताया कि 2017 में उत्तराखंड चुनाव के कुछ महीनों बाद ECIL पर आरोप लगे थे कि उसने EVMs और VVPATs की जांच के लिए बाहरी कंपनियों की सेवाएं ली थीं. जब इसको लेकर कुरैशी ने चुनाव आयोग से सवाल पूछे तो उन्हें चुनाव आयोग ने बताया कि चुनावों में सिर्फ सरकारी इंजीनियरों की ही सेवाएं ली गई थीं.

पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने बताया-

“किसी ने मुझसे पूछा था कि क्या चुनाव आयोग EVMs की FLC का काम बाहरी कंपनियों को दे रहा है? इस पर सम्बंधित चुनाव अधिकारी ने मुझे भरोसा दिया था कि किसी बाहरी कंपनी को काम नहीं दिया गया है. उसने कहा कि सभी मशीनों की जांच BEL/ECIL के इनहाउस इंजीनियरों ने की थी, और वो भी अनियमित तरीके से.”

जिन प्राइवेट इंजीनियरों ने ECIL के लिए काम किया उनमें से कम से कम 150 के relieving letters क्विंट के हाथ लगे हैं. ये relieving letters T&M Services ने तब जारी किए थे, जब इंजीनियरों के करार खत्म हुए. इन relieving letters से साबित होता है कि इन्होंने ecil के लिए Junior Consultant के तौर पर काम किया.

क्विंट ने इनमें से कुछ इंजीनियरों से कॉन्टैक्ट किया. एक इंजीनियर ने हमें कन्फर्म किया कि उसने T&M Services के लिए 2018 में काम किया. उसने बताया कि प्राइवेट इंजीनियरों को ECIL ने evm और vvpat की देखरेख का क्रैश कोर्स दिया और फिर उन्हें 2018 में हुए कई चुनावों में evm और vvpat की मरम्मत और देखरेख के काम पर लगाया गया. एक दूसरे junior consultant ने हमें बताया कि जिन इंजीनियरों को चुनावों में लगाया उनमें से 99% कॉन्ट्रैक्ट पर रखे गए थे. ठेके पर रखे गए इन इंजीनियरों को फील्ड वर्क में लगाया गया था.

हमने T&M Services Consulting Private Limited से भी कुछ सवाल पूछे-

  • वो कब से ECIL को इंजीनियर मुहैया करा रहे हैं?
  • consultant engineers का रोल क्या होता है?
  • ECIL ने कितने चुनाव में आपके तैनात इंजीनियर्स का इस्तेमाल किया?
इसके बाद हमें सिर्फ एक लाइन का जवाब मिला. जवाब था- ‘’नीचे दिए गए सवालों का जवाब ECIL से मिलेगा. कृपया ECIL के दफ्तर में संपर्क करें’’

लेकिन चुनाव आयोग इस बात का जवाब नहीं दे रहा है कि चुनाव में प्राइवेट इंजीनियरों का इस्तेमाल हुआ और वो भी एक ऐसी प्राइवेट कंपनी के मुहैया कराए गए इंजीनियरों का जो ECIL के पैनल पर ही नहीं है. इस मामले में हमने चुनाव आयोग से जो नए सवाल पूछे थे,उनका जवाब भी हमें नहीं मिला. चुनाव आयोग हमें पहले बता चुका है कि ECIL ने किसी PRIVATE consultant engineer की सेवा नहीं ली.  पूनम से हम जानना चाहेंगे कि चुनाव आयोग का उनके सवालों का क्या रवैया रहा?

एक इंटरव्यू में former Chief Election Commissioner ओपी रावत ने क्विंट से कहा था - EVM को हैक नहीं किया जा सकता, लेकिन अगर EVM चुनाव आयोग की निगरानी से बाहर जाता है तो कुछ भी हो  सकता है.

अभी हम ये निश्चित तौर  पर नहीं कह सकते कि 2018 के विधानसभा चुनावों और 2019 के लोकसभा चुनावों में कोई गड़बड़ी हुई, लेकिन प्राइवेट इंजीनियरों के इस्तेमाल पर चुनाव आयोग पूरी तरह TRANSPARENT न हो तो हम सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि कहीं दाल में कुछ काला तो नहीं?

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