Unmasking the man The MS Dhoni edition
Unmasking the man

एक अनकही कहानी

सौरव गांगुली को कौन ना कह सकता है? वो भी तब जब वह आपका क्रिकेट करियर बनाना चाहते हों?

लेकिन युवा महेन्द्र सिंह धोनी को शायद यह नहीं जंचा. उन्हें कोलकाता की तरफ से खेलने का ऑफर खुद गांगुली ने दिया था लेकिन 20 साल के माही ने ऑफर ठुकराकर अपनी झारखंड टीम के साथ खेलना जारी रखा.

वह यंग धोनी हों या रिटायरमेंट के बारे में सोचते धोनी, वह हमेशा अपने साथ ईमानदार बने रहे.

दरअसल, धोनी वही करते हैं जो धोनी चाहते हैं.

यह भारतीय क्रिकेट के लिए लकी साबित हुआ कि सुनहरे समय की शुरुआत में हमारे कीपर-कप्तान अपनी महत्वाकांक्षाओं के पीछे नहीं भागे. धोनी का क्रिकेट करियर उनके दशकों के संघर्ष का नतीजा है. कभी स्कूल की फुटबॅाल टीम का गोलकीपर, कभी क्रिकेट कोच का यंग माही को स्टैंड-इन-विकेटकीपर के तौर पर मैदान में खड़ा करना, ये उस संघर्ष के पड़ाव हैं. चांस मिलेगा क्या?

हमेशा यही सवाल करना, चाहे वह कहीं भी, कोई भी खेल हो. धोनी ने कभी इंडियन क्रिकेटर बनने का, बेमिसाल कप्तान बनने का, वर्ल्डकप विजेता बनने का या एक लीजेंड बनने का सपना नहीं देखा था. लेकिन यह सब बड़े-बड़े टुकड़ों में उनके हिस्से आता रहा, क्योंकि धोनी वही करते हैं जो धोनी चाहते हैं. चाहे पिता से लड़कर क्रिकेट खेलने के लिए ट्रेन टिकट कलेक्टर की जॉब को रिस्क में डालना हो या फिर एक मैच विनर टीम बनाने के लिए इंडियन क्रिकेट टीम के सीनियर खिलाड़ियों को टीम में जगह न देना. यह सब फैसला लेना इतना आसान नहीं था. लेकिन उन्होंने शांति और तर्क के साथ ऐसा किया, जो माही का अपना स्टाइल है और किस्मत भी उनसे रूठी नहीं थी.

एक इन्सान जो सालों से सुर्खियों में है, जिसके निजी जीवन से जुड़ीं सारी बातें लोग जानते हैं, नए-नए मैच विजेता अब उसकी जगह लेने की ताक में रहते हैं, लेकिन धोनी कभी विचलित नहीं हुए. हमेशा की तरह मजबूत, अपनी जगह पर, अपने क्रम में और विकेट के पीछे वह टिके रहे.

खैर, गेम के अलावा धोनी और क्या हैं? उन्हें क्या पसंद है? वह अपना समय कहां बिताते हैं? कौन सी बाइक वो चलाते हैं? द क्विंट आपको उन सारे सवालों के जवाब दे रहा है.

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Dhoni the patriot

धोनी 'एक देशभक्त'

भारत के लोग अपने क्रिकेटर्स को उतना ही सम्मान देते हैं जितना सेना के जवानों को. ऐसे में महेन्द्र सिंह धोनी का एक क्रिकेटर के साथ-साथ आर्मीमेन होना जबरदस्त कॉम्बिनेशन है.

रांची में जन्मे, पले-बढ़े धोनी सेना से जुड़ी हर चीज में काफी दिलचस्पी लेते थे.

अप्रैल 2011 में उन्होंने इतिहास रचने वाली भारतीय वर्ल्डकप विजेता टीम को लीड किया और ठीक उसके बाद 1 नवम्बर 2011 को उन्हें भारतीय प्रादेशिक सेना की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया.

क्रिकेट की बातों से अलग हटकर चल रहे एक इंटरव्यू में धोनी ने कहा था

"जब मैं यंग था, तब हथियारों, टैंकों और युद्ध पर लिखी किताबें पढ़ता था. मुझे सेना में दिलचस्पी थी. बाद में एक भारतीय क्रिकेटर के रूप में मेरी प्रोफाइल ने मुझे इनके बारे में बात करने, जानने का मौका दिया. मैंने सैनिकों के साथ समय बिताया है और उनके जीवन और बलिदान से काफी कुछ सीखा है. मेरे कई दोस्त स्पेशल फोर्सेज में थे. मैं उनकी मिशन की कहानियां सुनता था. इससे मुझे पता चला कि मिशन को सफल करने के लिए वो कितना रिस्क उठाते थे."

धोनी ने कहा था, "मैंने एक बार आर्मी स्टाफ के प्रमुख से मुलाकात की और सेना के अपने आजीवन लगाव के बारे में बताया. मैंने पूछा कि क्या मैं सेना में शामिल हो सकता हूं? यह अविश्वसनीय था, लेकिन कई प्रक्रियाओं के बाद देश के राष्ट्रपति के सामने यह सपना पूरा हुआ. इस सब का नतीजा यह हुआ कि मैं पैराशूट रेजिमेंट में मानद लेफ्टिनेंट कर्नल बन गया."

धोनी ने पर्सनल लाइफ को मीडिया की सुर्खियों से दूर रखने की कोशिश की. उन्होंने हमेशा क्रिकेट के बारे में ही बात की. शायद इसी वजह से देश उनके बायोपिक का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. हालांकि क्रिकेट के अलावा उनके इंटरव्यूज में स्पेशल फोर्सेज के बारे में उनकी बातों और भावनाओं को कोई भी नोटिस कर सकता है.

जून 2012 में जम्मू क्षेत्र में नियंत्रण रेखा (एलओसी) और सियाचिन बॉर्डर के पास सैन्य कर्मी के रूप में अपनी पहली आधिकारिक यात्रा के दौरान धोनी ने कहा था कि वह सेना में "सक्रिय रूप से" सेवा देना पसंद करेंगे. हालांकि, क्रिकेट हमेशा उनकी पहली प्राथमिकता होगी क्योंकि यह ऐसी फील्ड है जिसमें वह "अच्छे" हैं.

धोनी के जीवन के इस पक्ष को ज्यादा हाइलाइट नहीं किया गया, लेकिन हमें विश्वास है कि क्रिकेटर के तौर पर उन्होंने बहुत गंभीरता से राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाया है. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी था कि उनके जीवन का सबसे गौरवपूर्ण पल 2011 का वर्ल्डकप जीतना नहीं बल्कि पैराशूट रेजिमेंट में मानद लेफ्टिनेंट कर्नल की रैंक से नवाजा जाना था. उनके मुताबिक,

""मेरे पास चार रेजिमेंटों का विकल्प था लेकिन मैंने पांचवें विकल्प, पैराशूट को चुना क्योंकि यह सौ प्रतिशत स्वयंसेवक रेजिमेंट है. आप जानते हैं कि यह ब्रिटिश एसएएस से निकली कमाल की यूनिट है. मुझे लगता है कि मैं बाद में इसमें अधिक योगदान दे पाऊंगा. मैं इस सम्मान के लायक था और मैं इसे साबित करने को तैयार हूं."

मार्च, 2015 में वर्ल्डकप के दौरान 100 वनडे मैच जीतने वाले वह पहले गैर-ऑस्ट्रेलियाई कप्तान बने, साथ ही साथ सेना के प्रति लगाव भी बना रहा. उन्होंने अधिकारियों को सैन्य प्रशिक्षण के लिए एक लेटर भी लिखा था. अगस्त, 2015 में धोनी ने आगरा में फोर्स के एलिट पैरा रेजिमेंट के साथ दो सप्ताह का प्रारंभिक प्रशिक्षण लिया और 27 सितंबर, 2016 को राष्ट्र ने भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार-कप्तान को सेना की वर्दी में विमान से बाहर निकलते देखा.

यहां देखिए 'नर्वस' लेफ्टिनेंट कर्नल महेंद्र सिंह धोनी को वायुसेना के विमान से छलांग लगाते हुए.

106 पैराशूट रेजिमेंट में मानद लेफ्टिनेंट कर्नल की पहली उड़ान, भारतीय वायुसेना के एएन-32 विमान लाइन पैराशूट मालपुरा ड्रॅापिंग जोन में, जो आगरा में है. आधुनिक क्रिकेट के सबसे बेस्ट फिनिशर धोनी की एक सैन्यकर्मी के रूप में दूसरी पारी को देखना वाकई आश्चर्यजनक था.

highest average in successful run chases
 Most not outs successful run chases
Most matches as captain keeper
the number game

धोनी आंकड़ों के खेल के विजेता

महेंद्र सिंह धोनी ने अपने करियर में बहुत कुछ किया है. एक बल्लेबाज के रूप में उन्होंने काफी रन बनाए हैं, विकेटकीपिंग ग्लव्स पहनकर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे ज्यादा स्टम्प चटकाने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम दर्ज है. कप्तान के रूप में उन्होंने तीन आईसीसी खिताब देश के लिए हासिल किए हैं और टेस्ट क्रिकेट में भारत का नेतृत्व कर आईसीसी टेस्ट चैम्पियनशिप जिताया है.

उनकी सभी उपलब्धियों और सफलताओं में इन आंकड़ों हटकर तीन खास बातें हैं- 1) उनकी फिटनेस का स्तर, 2) कप्तान के रूप में निर्णय लेने का कौशल और 3) सफलता के आसमान पर पहुंचने के बाद जरा भी गुरूर न होना.

धोनी के करियर की शुरुआत और दिसंबर 2014 में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने तक भारत ने 104 टेस्ट, 293 वनडे और 53 टी-20 मैच खेले. चौंकाने वाली बात यह है कि धोनी इन 450 मैचों में से 87 प्रतिशत मैचों में खेले. यहां ध्यान देना होगा कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के अलावा भी कई मैच खेले हैं. एक विकेटकीपर के लिए (जो शायद क्रिकेट में सबसे अधिक श्रम काम की मांग करता है) इतने सारे मैच खेलना बच्चों का खेल नहीं है. धोनी के फिटनेस लेवल के बारे में इसके बाद कुछ कहने को रह नहीं जाता.

most matches played

धोनी ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में शुरुआत से टेस्ट क्रिकेट से रिटायर होने तक अलग-अलग फॉर्मेट और कॉम्पिटीशन में 565 मैच खेले. इनमें टूर के वार्मअप मैच, इंडियन प्रीमियर लीग और चैंपियंस लीग टी-20 मैच भी शामिल हैं. उस दौरान के शीर्ष पांच सबसे व्यस्त क्रिकेटरों में धोनी का नाम भी है. ध्यान देने वाली बात ये है कि उन पांच क्रिकेटरों में धोनी अकेले खिलाड़ी हैं, जो नियमित रूप से विकेटकीपिंग भी करते रहे.

धोनी के कारनामों को जो चीज खास बनाती है, वो यह है कि करियर के अधिकांश समय में उन्होंने कप्तानी की, जबकि विकेटकीपिंग अपने आप में डिमांडिंग जॉब है. धोनी ने कप्तान की टोपी भी पहनी और गेम फिनिशर भी रहे. वह शारीरिक रूप से फिट और मानसिक रूप से सतर्क भी बने रहे.

MS dhoni's record as captain

धोनी का करियर एक कैप्टन के रूप में शानदार रहा. एक छोटे से शहर का लड़का इंडियन टीम को लीड करे, यह बड़ी चुनौती थी. लेकिन धोनी ने यह काम बड़ी आसानी से कर दिखाया. वह अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारत के सबसे सफल कप्तान हैं. किसी भी कप्तान की तुलना में क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट में भारत को सबसे अधिक जीत उन्होंने दिलाई है.

मैं धोनी की कप्तानी का बहुत बड़ा फैन हूं. विशेष रूप से टी-20 मैचों का, जिनमें वह हर समय सक्रिय रहते हैं और विपक्षी टीम से कई कदम आगे भी. टी-20 रैपिड शतरंज है, जहां एक गलत कदम पड़ जाए तो मैच हाथ से निकल जाता है.

एक और बात जो मुझे धोनी के बारे में पसंद है, वह है उनका व्यक्तित्व. उन्होंने जब देश के लिए खेलना शुरू किया था, वह उस समय जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं. वह ग्राउंड में हों या बाहर, होठों पर हमेशा मुस्कुराहट बनी रहती है. उन तक कोई भी आसानी से पहुंच सकता है. इतनी सफलताओं के बावजूद, जीत के बेहतरीन पलों में वह हमेशा दूसरे खिलाड़ियों की तरह किनारे खड़े रहकर खुश होते हैं.

An encounter with the other dhoni

एक 'दूसरे' धोनी से मुलाकात

2004 के अगस्त में, 23 साल के महेंद्र सिंह धोनी ने भारत की खेल चेतना को पकड़ा. पाकिस्तान 'ए' के खिलाफ भारत 'ए' की तरफ से खेलना और केन्या के खिलाफ नैरोबी में एक त्रिकोणीय टूर्नामेंट में लंबे बालों वाले इस खिलाड़ी ने ऐसी पारी खेली कि इसे नजरअंदाज करना असंभव हो गया और छह महीने के भीतर ही उन्हें भारत की ओर से डेब्यू करने का मौका मिल गया. तीन साल के कम समय के भीतर ही वह एक जुझारू युवा टीम के साथ, जिसने दक्षिण अफ्रीका में पहला वर्ल्डकप टी-20 का खिताब हासिल किया, शीर्ष पर थे और एक दशक में इंडियन आइकॉन बन गए. यह मील का पत्थर साबित होने वाला, रौबदार और प्रेरणादायक व्यक्ति आखिर है क्या?

सच कहूँ तो, यह कहना मुश्किल है.

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की सुर्खियों में धोनी बहुत जल्द आने लगे थे, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने खुद को चमक-दमक से दूर रखा. वह जानते थे कि उनकी जिंदगी सामान्य नहीं रह जाएगी. इसके बावडूद धोनी अपनी सादगी कभी नहीं भूले. पत्रकारों के लिए धोनी बंद दुकान की तरह थे. वह प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए तो अनुकूल थे, क्योंकि उन्हें पता था कि कप्तान के रूप में यह भूमिका निभानी पड़ेगी, लेकिन उसके बाद वह मीडिया के लिए अवलेबल नहीं थे. स्मार्टफोन से धोनी की दूरी के बारे में सबको पता है. याद कीजिए वह घटना जब वीवीएस लक्ष्मण ने रिटायरमेंट के बारे में बताने के लिए धोनी से कई दफा कांटैक्ट करने की कोशिश की थी, लेकिन संपर्क नहीं हो सका था. यह खबर धोनी तक पहुंचने से पहले विवादों में आ गई थी. जब धोनी से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने हंसते हुए कहा कि मैं खुद को सुधार रहा हूं पर कुछ हो नहीं पा रहा है. बड़ी मुश्किल से ही धोनी खुद के इन बैरियर्स को दूर कर पाएंगे.

सहयोगी विमल कुमार के दिल्ली में सचिन तेंदुलकर पर लिखे किताब के लॉन्च पर धोनी की मेजबानी यादगार रही थी. धोनी न केवल इसका हिस्सा बने बल्कि अपने ह्यूमर और नेचर से वहां आए लोगों का मन मोह लिया. अपने बचपन के हीरो के साथ ड्रेसिंग रूम शेयर करने और बाद में कप्तानी की कहानियों से भी धोनी ने ऑडियंस का खूब मनोरंजन किया था.

एक वाकया है कि दलीप ट्राफी मैच के दौरान सचिन ने ड्रिंक के लिए धोनी से पूछा तो वो अवाक रह गए. धोनी विपक्षी टीम के लिए 12वें खिलाड़ी के रूप में खेल रहे थे और यह उनका सचिन से पहला सामना था. सालों साथ रहने और ड्रेसिंग रूम शेयर करने के बावजूद मैदान के बाहर तेंदुलकर के सामने वह शर्मीले बने रहे. वह काफी गर्व के साथ बताते हैं जब चयनकर्ताओं की ओर से कप्तान के रूप में उम्मीदवारी पर विचार हो रहा था तो कैसे बीच में सचिन ने उनका नाम लिया था.

खेल के दौरान रणनीति तय करते समय दोनों की साझेदारी के बारे में धोनी बताते हैं कि कैसे तेंदुलकर अपने विकेटकीपर कप्तान से अक्सर पूछा करते थे- मुझे लेग स्पिन डालनी चाहिए या ऑफ स्पिन? उनकी बॉन्डिंग ऐसी हो गई कि धोनी कुछ समय बाद उनके सुझाव को अस्वीकार करने लगे और तेंदुलकर के लिए यह अपमानित होना नहीं था. मिनटों में दोनों किसी नई रणनीति पर चर्चा करने लग जाते.

"आपने किताब में लिखा है कि आपको तेंदुलकर को खेलते देख खुशी होती है कि उन्होंने फैसला किया कि विकेट कीपिंग उनके बस की बात नहीं थी."

मैंने पूछा नहीं तो आपके पेट पर लात होती. धोनी हंसते हुए कहते हैं कि लात नहीं मिसाइल होती.

"क्रिकेट खत्म होने के बाद आप अपने आपको सचिन तेंदुलकर के साथ दोस्त के रूप में देखते हैं?"

“दोस्त?”

“हां?”

“पर यह काफी मुश्किल होता था.”

धोनी एक पल के बाद ही कहते हैं, "मेरे लिए मैदान से बाहर उनसे बात करना काफी मुश्किल होता था जब तक कि वह कारों और बाइक से जुड़ी बात न हो. मुझे लगता है कि जो चमक उनमें है, वह औरों में मिलना मुश्किल है.“

चार साल बाद भी वो शाम अभी तक मेरे साथ है. धोनी तब इंडियन टीम के कैप्टन नहीं थे. वो लड़कों के झुंड का हिस्सा थे, जो अपने हीरो के बारे में बात कर रहा था, जिससे उसने प्रेरणा ली. ये तमाम सामान्यताएं लिए, एक युवक के दिमाग की वो दुर्लभ झलक थी, जिसने उसे उसके असामान्य दुनिया में पूरी ताकत से जमाए रखा.

WC 2007
MS dhoni captaincy record ODI
 MS dhoni captaincy record test
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