उर्दूनामा: शायरी की नफ़ासत में लिपटे ‘इंक़लाब’ के जज़्बे को समझिए

उर्दूनामा: शायरी की नफ़ासत में लिपटे ‘इंक़लाब’ के जज़्बे को समझिए

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वीडियो एडिटर: प्रशांत चौहान

कैमरापर्सन: अभिषेक रंजन, मुकुल भंडारी

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स्वतंत्रता के लिए हमारा संघर्ष, फ्रांसीसी क्रांति...इतिहास कई क्रांतियों से भरा है. हाल ही हमने #MeToo आंदोलन देखा. इसे हम इंक़लाब का एक उदाहरण मान सकते हैं, जिसे हमारी पीढ़ी ने देखा है.

2017 में ग्वेनेथ पाल्ट्रो, एंजेलिना जोली और उनके जैसी अन्य अभिनेत्रियों ने अमेरिकी फिल्म प्रोड्यूसर हार्वे विंस्टीन पर यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था. हार्वे के खिलाफ आरोपों की झड़ी लग गई. कई महिलाओं ने खुलकर बताया कि उन्हें भी यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया गया. इसके बाद सेक्सुअल क्राइम और यौन दुर्व्यवहार की शिकार दुनियाभर की महिलाओं ने हैशटैग मी टू (#MeToo) के साथ अपने अनुभवों के बारे में ट्वीट करना शुरू किया. छिपे यौन शिकारियों का पर्दाफाश होने लगा.

किसी भी बदलाव को लाने के लिए, इंक़लाब (क्रांति) का दायरा और स्तर बड़ा होना चाहिए. #MeToo के साथ आया ये बदलाव काफी बड़ा है.

सामाजिक उत्पीड़न, शोषण को दूर करने के लिए, राजनीतिक विचारधारा बदलने के लिए, क्रांति किसी भी रूप में और किसी भी चीज के लिए हो सकती है. किसी चीज की प्रतिक्रिया के रूप में, जब विद्रोह और विद्रोह जैसे कृत्य बढ़ जाते हैं, तो यही वो पॉइंट होता है जहां एक क्रांति जन्म लेती है.

और किसी भी अन्य भाषा की तरह, उर्दू में भी प्रतिरोध दर्ज कराने के लिए कविता, इंक़लाबी शायरी मौजूद हैं. उर्दूनामा के इस एपिसोड में हम आपको रूबरू करा रहे हैं कुछ इन्हीं इंक़लाबी शायरी के नगमों से.

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