बनारस में अमेठी-रायबरेली जैसे हालात बने तो मोदी के लिए चुनौती!

बनारस में अमेठी-रायबरेली जैसे हालात बने तो मोदी के लिए चुनौती!

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  • वीडियो प्रोड्यूसर- अभय सिंह
  • वीडियो एडिटर- मोहम्मद इरशाद आलम

उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर जा चुके कांग्रेसी अब पूरे जोश में है. प्रियंका के सहारे यूपी में ऐसी सियासी बिसात बिछाने की तैयारी की जा रही है. जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी उलझकर रह जाए...

जोश इतना कि कांग्रेसी अब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को बनारस से चुनाव लड़ाने की मांग कर रहे हैं. मान भी लीजिए कि प्रियंका और राहुल बनारस से चुनाव लड़ते हैं तो वाराणसी की चुनावी तस्वीर क्या होगी? क्या कांग्रेस के ये स्टार नरेंद्र मोदी को टक्कर दे पाएंगे....

वैसे तो पार्टी का हाई लेवल पर इन दोनों ही नेताओं के चुनाव लड़ने को लेकर कोई चर्चा नहीं है. लेकिन राजनीति में कुछ भी संभव है. लिहाजा कांग्रेसियों का उत्साहित होना लाजमी है. और कांग्रेस भी यही चाहती है कि कार्यकर्ताओं में उत्साह बना रहे.

उत्तर प्रदेश में बनारस बीजेपी का सबसे मजबूत गढ़ है. इसे मूड और मिजाज से भाजपाई कहा जाता है. तभी तो साल 1991 से लेकर 2014 तक हुए लोकसभा ही नहीं बल्कि निकाय चुनाव में भी बीजेपी की बादशाहत रही है. इस बीच सिर्फ एक बार 2004 में ऐसा हुआ, जब बीजेपी के अलावा दूसरी किसी पार्टी यानि कांग्रेस ने यहां जीत हासिल की.

(फोटो: पीटीआई)

साल 1952 से लेकर 84 तक बनारस पर कांग्रेस का राज था. कह सकते हैं कि कमलापति त्रिपाठी का. हालांकि इस बीच 1977 में युवा तुर्क चंद्रशेखर ने ये सीट कांग्रेस से छीनी थी.. इसके पहले 1967 में कम्युनिस्टों ने ये सीट लपक ली. लेकिन इसके बाद बोफोर्स के साथ आयी जनता दल ने 1989 में बनारस से कांग्रेस को बेपटरी कर दिया और फायदा राम मंदिर आंदोलन से उठे बीजेपी को मिला. शहरी बनारसी कांग्रेसी से भाजपाई हो गए.

बनारस की सीट हमेशा से बड़े नेताओं की पहली पसंद रही है. चंद्रशेखर सिंह, लालबहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री, मुरली मनोहर जोशी.

राजनरायण सिंह भी यहां से प्रत्याशी थे हालांकि हार गए. और अभी तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही यहां से सांसद है. जिन्हें टक्कर देने के लिए अरविंद केजरीवाल बनारस पहुंचे थे.

यकीनन पिछले तीन दशकों से बनारस पर बीजेपी का ही राज है. लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि कांग्रेस के रिवाइवल को खारिज कर दिया जाए. वैसे तो मोदी से बनारस की सीट को छीनने के बारे में सोचना भी मुश्किल भरा है, लेकिन बदले हालात में राहुल या प्रिंयका वाराणसी से चुनाव लड़ते हैं तो लड़ाई रोमांचक होगी.

नरेंद्र मोदी के कुल 581,022 वोटों की तुलना में एसपी, बीएसपी और कांग्रेस को 390,722 वोट मिले. पिछले नतीजों को ही आधार बनाए और जातिय समीकरण में थोड़ी भी लचक आयी तो बाजी पलट सकती है. बनारस में सबसे अधिक बनिया 3.25 लाख है, जो वैसे तो बीजेपी के कोर वोटर माने जाते हैं लेकिन नोटबंदी और जीएसटी से ये भनभनाया हुए हैं.

ब्राह्मणों का संख्या भी ढाई लाख है. ये भी एससी-एसटी और राममंदिर को लेकर बहुत खुश नहीं हैं, साथ ही हमें नहीं भूलना चाहिए कि ये कभी कांग्रेस के मूल वोटर थे. इसके बाद बड़ा वोट बैंक मुस्लिमों का है जिनकी संख्या तीन लाख के आसपास है.

माना जाता है कि ये वर्ग उसी को वोट करता है जो बीजेपी को टक्कर दे रहा हो और इनका वोटिंग परसेंटेज भी सबसे हाई होता है, जो चुनाव पर अच्छा-खासा असर डालता है.

साल 2009 में मुरली मनोहर जोशी बीजेपी के कौंडिडेट थे, जिन्हें बीएसपी से मैदान में उतरे माफिया मुख्तार अंसारी ने कड़ी टक्कर दी थी. कहा जाता है कि आखिर दौर में वोटों के हिन्दू-मुस्लिम पोलराइजेशन के बाद बड़ी मुश्किल 17 हजार वोट से जीते.

2004 के चुनावी नतीजे ये बताते हैं कि बनारस में कांग्रेस के लिए अभी बहुत कुछ है. याद कीजिए फीलगुड और साइनिंग इंडिया के दौर के बीच राहुल गांधी के एक रोड शो ने पूरी सियासी फिजा ही बदल दी थी. लगातार तीन बार से बीजेपी सांसद शंकर प्रसाद जायसवाल को कांग्रेस के राजेश मिश्रा ने धुल चटा दी. इस चुनाव में ब्राह्मण और मुसलमान कॉम्बिनेशन कांग्रेस के पक्ष में दिखा था.

अब अगर साझेदारी पर बात बनी और जातिय समीकरण ने साथ दिया तो राहुल मोदी को टक्कर दे सकते हैं लेकिन इसके साथ ही मोदी ने जिस तरह से पिछले साढे़ चार सालों में वाराणसी में विकास के जो काम किया है उसे बनारस कैसे नजरंदाज कर पाना मुश्किल है.

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