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Iraq Political Crisis: इराक के शिया मुस्लिम आपस में क्यों 'लड़' रहे?

राजधानी बगदाद में संसद के बाहर सैंकड़ों लोगों ने डेरा डाला हुआ है. ये लोग एक शिया नेता मुक्तदा अल-सद्र के समर्थक हैं.

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21वीं सदी में संसद और राष्ट्रपति भवन कब्जाने की कोशिश का नया ट्रेंड चला है. हमने अमेरिका(America) में ट्रम्प के समर्थकों को कैपिटल हिल में घुसते देखा. फिर हमने अफगानिस्तान में तालिबान(Taliban) को राष्ट्रपति भवन में फोटोशूट कराते देखा. और अभी पिछले दिनों हमने श्रीलंका(Sri Lanka) में पुरानी पार्लियामेंट बिल्डिंग से लेकर प्रदर्शनकारियों को राष्ट्रपति और प्रधनामंत्री के घरों पर कब्ज़ा जमाए हुए देखा और अब बारी आई है इराक की(Iraq Political Crisis).

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इराक की राजधानी बगदाद में संसद के बाहर सैंकड़ों लोगों ने डेरा डाला हुआ है. दरअसल ये इराक के शिया नेता मुक्तदा अल-सद्र(Muqtada Al-Sadr) के समर्थक हैं. वैसे तो इन्होंने संसद के अन्दर भी कब्जा कर लिया था. लेकिन अल-सद्र की एक अपील के बाद ये लोग संसद से बाहर निकल आए और पिछले 3 हफ़्तों से बाहर जमे हुए हैं. इन्होंने संसद के बाहर एक पूरी टेंट सिटी ही खड़ी कर दी है. ये लोग ईरान विरोधी नारे भी लगाते हैं. और दिलचस्प है कि इसी संसद के बाहर वो लोग भी डेरा जमाए हुए हैं जो अल-सद्र के विरोधी हैं यानी कोर्डिनेशन फ्रेमवर्क के समर्थक हैं. इराक एक शिया बहुल देश है.

मुक्तदा अल-सद्र भी शिया हैं, कोर्डिनेशन फ्रेमवर्क वाले भी शिया हैं. तो माजरा चल क्या रहा है? मुक्तदा अल-सद्र कौन है कोर्डिनेशन फ्रेमवर्क क्या है? क्या इराक में कोई सिविल वॉर होने वाला है? इराक के इस संकट में ईरान की क्या भूमिका है? आगे क्या हो सकता है? इस तरह के कई सवाल आपके दिमाग में आ रहें होंगे. सवालों का जवाब जानने के लिए इराक के इस राजनीतिक संकट को समझते हैं.

2003 में अमेरिका के हमले से पैदा हुए संकट के बाद इराक एक बार फिर अपने सबसे लंबे राजनीतिक संकट से जूझ रहा है. मंगलवार, 16 अगस्त को इराक के वित्त मंत्री ने कैबिनेट मीटिंग के दौरान इस्तीफा दे दिया. उन्होंने अपना इस्तीफा देकर 2003 के बाद पैदा हुए सबसे बड़े राजनीतिक संकट का विरोध जताया और संसद भंग कर जल्द चुनाव कराने की मांग की.

पिछले 10 महीनों से इराक में कोई सरकार नहीं बनी है और इससे आम नागरिकों समेत पूरे देश को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. संसद के बाहर जमा अल-सद्र के समर्थकों की भी यही मांग है कि संसद भंग की जाए और जल्द से जल्द नए सिरे से चुनाव हो.

इस राजनितिक डेडलॉक की स्थिति पर विचार करने के लिए इराक के केयर टेकर प्रधानमंत्री मुस्तफा अल-काज़मी ने सभी राजनितिक पार्टियों की मीटिंग भी बुलाई हुई है. बावजूद इसके कुछ बात नहीं बन पा रही है.

सद्री मूवमेंट के लीडर मुक्तदा अल-सद्र की तस्वीर लिए इराक की संसद में खड़ा शख्स

फोटो: ट्विटर

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ये सब शुरू कैसे हुआ?

इसे समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा, 10 महीने पहले यानि अक्टूबर 2021 में इराक में आम चुनाव होते हैं. मुक्तदा अल-सद्र नाम के शख्स की पार्टी सद्री मूवमेंट 73 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरती है. लेकिन स्पष्ट बहुमत से दूर रह जाती है.

इराक की संसद को काउंसिल ऑफ रिप्रेजेन्टेटिव्स कहा जाता है. संसद में सदस्यों की कुल संख्या 329 है. ये सदस्य आम चुनाव के जरिए चुने जाते हैं. इसके बाद राष्ट्रपति का चुनाव होता है. यहां जीतने के लिए संसद के दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की ज़रूरत होती है. फिर इसके बाद चुना जाता है प्रधानमंत्री. प्रधानमंत्री का चुनाव साधारण बहुमत से होता है. संसद में बहुमत के लिए हाफ़ प्लस वन यानी 165 सासंदों के समर्थन की जरुरत होती है और तभी कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री बन सकता है.

इराक में भी भारत की तरह मल्टी पार्टी सिस्टम है. और इसीलिए बहुमत पाने के लिए पार्टियां आपस में गठबंधन कर सकती हैं. अल-सद्र की पार्टी और बाकि पार्टियों में गठबंधन की कोशिशें होती हैं. अल-सद्र की पार्टी सद्री मूवमेंट को इराक की सुन्नी पार्टियों और कुर्दिश डेमोक्रेटिक पार्टी का समर्थन मिलता है.

अल-सद्र इराक में सुन्नी मुसलमानों और कुर्दों जैसे विभिन्न संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करने वाली "राष्ट्रीय बहुमत वाली सरकार" बनाने की बात करते हैं. लेकिन फरवरी 2022 तक कई कोशिशों के बावजूद भी प्रधानमंत्री के नाम पर सहमति नहीं बन पाती है. जिसके बाद 13 जून को अल-सद्र के कहने पर ‘सद्री मूवमेंट’ के सभी 73 सांसद इस्तीफा दे देते हैं.

कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क का गठन

इनके इस्तीफे के फौरन बाद इराक की बाकी शिया पार्टियों के बीच नए सिरे से बात-चीत शुरू होती है. एक नया गठबंधन तैयार होता है जिसका नाम रखा जाता है कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क. इस गठबंधन को इराक के पड़ोसी मुल्क ईरान का समर्थन हासिल होता है. ये गठबंधन अब सरकार बनाने की कवायद शुरू कर देता है. 25 जुलाई को कोर्डिनेशन फ्रेमवर्क मुहम्मद शिया-अल-सुदानी का नाम अगले प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करता है. जो मुक्तदा अल-सद्र के विरोधी हैं. नियमों के अनुसार अगले प्रधानमंत्री के चुनाव से पहले राष्ट्रपति का चुनाव होना जरूरी है. लेकिन ये प्रक्रिया शुरू होती, उससे पहले ही अल-सद्र के समर्थक सड़क पर आ जाते हैं.

‘सद्री मूवमेंट’ के नेता, मुक्तदा अल-सद्र, अल-सुदानी पर आरोप लगाते हैं कि वे पूर्व प्रधानमंत्री नूरी-अल-मलिकी के प्यादे हैं. और वो उनके इशारे पर ही चलेंगे और अगर वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो ईरान का दखल भी ज्यादा होगा.

इसी के विरोध में 27 जुलाई को सद्री मूवमेंट के समर्थक मुक्तदा अल-सद्र की तस्वीरें लिए संसद पर धावा बोल देते हैं.

इराक की राजनीति का केंद्र बने हुए मुक्तदा अल-सद्र कौन हैं?

अल-सद्र इतने पावरफुल क्यों है और इनके तार कहां जुड़े हैं ये समझने के लिए हमें 1999 में जाना होगा. जब सद्दाम हुसैन इराक के राष्ट्रपति थे. तब इराक में कई शिया धर्मगुरुओं की हत्याएं हुई थीं. इनके पीछे सद्दाम हुसैन और उनकी बाथ पार्टी के लोगों के हाथ होने का आरोप था. दरअसल, 1980 से 1989 तक चले इराक-ईरान युद्ध के बाद से ही शियाओं को निशाना बनाया जा रहा था. सद्दाम हुसैन सुन्नी थे, जबकि इराक की 65% जनता शिया थी. उनको शक था कि शिया धर्मगुरु ईरान का समर्थन कर रहे हैं.

इसी दमन चक्र में इराक के शिया समुदाय के जाने माने धर्मगुरु अयातुल्लाह मुहम्मद सादिक अल-सद्र की भी हत्या कर दी जाती है. इनकी हत्या के बाद इराक में इतना ब़ड़ा हंगामा खड़ा हो जाता है कि खुद सद्दाम हुसैन को आगे आकर सफाई देनी पड़ी थी. उन्होंने सफाई दी थी कि इसके पीछे उनका, या उनकी पार्टी का हाथ नहीं है. ये कोई विदेशी साजिश है. जाहिर है सद्दाम की सफाई पर किसी ने यकीन नहीं किया.

अयातुल्लाह मुहम्मद सादिक अल-सद्र

फोटो: विकिपीडिया

सादिक अल-सद्र को तबसे शिया समुदाय में शहीद का दर्जा मिला हुआ है. और सद्री मूवमेंट के लीडर मुक्तदा अल-सद्र इन्हीं के बेटे हैं. शियाओं की बड़ी आबादी इन्हें अपना सबसे बड़ा नेता मानती हैं.

2003 में जब अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का तख्ता पलट किया तो उसके बाद अल-सद्र गुमनामी से निकलते हैं और बगदाद के करीब मदीनतुल सौरा में अपने पिता के नाम पर ऑफिस खोलते हैं. मदीनतुल सौरा का हिंदी में अर्थ है क्रांति का शहर. जल्द ही मदीनतुल सौरा में अल-सद्र का कंट्रोल हो जाता है. और फिर अल-सद्र मदीनतुल सौरा का नाम बदलकर अपने पिता के नाम पर रख देते हैं. नाम रखा जाता है सद्र सिटी. और इस तरह 2003 के अंत तक इराक में शियाओं की सबसे मजबूत पार्टी जन्म लेती है सद्री मूवमेंट.

अल-सद्र की पार्टी सद्री मूवमेंट के ज्यादातर समर्थक युवा हैं और वो लोग हैं जो गरीब और कमज़ोर पृष्ठभूमि से आते हैं. सद्री मूवमेंट में राष्ट्रवाद का फ्लेवर भी ज्यादा है. ये ईरान या किसी अन्य देश का इराक की राजनीति में दखल का विरोध करते हैं.

हालांकि हालिया प्रदर्शनों के बाद अल-सद्र पर आरोप लगे कि उन्होंने सिविल वॉर जैसे हालात पैदा कर दिए हैं जिसका नुकसान इराक की जनता को हो रहा है.

फिलहाल इराक के केयर टेकर प्रधानमंत्री मुस्तफा अल-काजमी के जरिए इस संकट पर चर्चा और हल खोजने के लिए बुलाई गई राजनितिक दलों की मीटिंग ‘इराकी नेशनल डायलोग’ जारी है. जिसका अल-सद्र ने बॉयकोट किया हुआ है.

इराक के केयर टेकर प्रधानमंत्री मुस्तफा अल-काजमी के जरिए बुलाई गई मीटिंग

इराक का ये राजनितिक संकट किसी तरह खत्म होता नजर नहीं आ रहा है. कहा जा रहा है कि अगर अल-सद्र और उनके समर्थकों की मांगों को नहीं माना गया तो सिविल वॉर जैसी हालत भी हो सकती है. लेकिन 3 हफ़्तों तक संसद के बाहर जारी शांतिपूर्ण प्रदर्शन को देख फिलहाल ये कहना अतिश्योक्ति है. बगदाद में मौजूद अमेरिकी दूतावास में राजिनितक मामलों के पूर्व काउंसलर रॉबर्ट फोर्ड ने इराक में जरी इस संकट पर अपनी प्रतिक्रिया दी.

“इराक का ये राजनितिक संकट 2003 से 2011 के बीच अमेरिका की छत्र छाया में बने इराकी पॉलिटिकल सिस्टम के अंत की शुरुआत है”
रॉबर्ट फोर्ड
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आगे क्या हो सकता है?

कयास लगाए जा रहे हैं कि इराक में फिर से चुनाव होंगे. और अल-सद्र को पिछली बार से भी ज्यादा समर्थन मिल सकता है. मतलब देर से ही सही लेकिन सरकार अल-सद्र की बनेगी. एक्सपर्ट ये भी बता रहे हैं, कि अमेरिका भी यही चाहेगा क्योंकि ईरानी समर्थन प्राप्त कोर्डिनेशन फ्रेमवर्क के मुकाबले अल-सद्र उसके लिए छोटा दुश्मन है.

इन सबके बीच आम इराकी का क्या हाल है? 10 महीने से जारी इस संकट से आम इराकी अब परेशान हो गया है. इरान की केयर टेकर सरकार लोगों को पानी और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवा पा रही है. क्योंकि एक मान्य सरकार ही बजट पास कर सकती है, जो अबतक नहीं बन पाई है. वर्ल्ड बैंक के अनुसार इराकी सरकार के वार्षिक बजट में 85% इनकम का हिस्सा तेल से से आता है. इस संकट से तेल का पूरा कारोबार प्रभावित हुआ है और बेरोजगारी भी बढ़ी है. खेती और मछली-पालन भी प्रभावित हुआ है.

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