उस रात ‘छोटे कपड़ों’ में होने के बावजूद हमें कोई घूर नहीं रहा था
अनजान शहर में दो लड़कियां रात 1 बजे सड़क पर... वो भी ‘छोटे कपड़ों’ में
अनजान शहर में दो लड़कियां रात 1 बजे सड़क पर... वो भी ‘छोटे कपड़ों’ में(फोटो: सांकेतिक तस्वीर/iStock)

उस रात ‘छोटे कपड़ों’ में होने के बावजूद हमें कोई घूर नहीं रहा था

रात को करीब 1 बजे मैं और मेरी दोस्त एक एलजीबीटी क्लब से बाहर निकले... हमें दूसरे शहर जाना था, ट्रेन से. हमने सड़क पर काफी देर इंतजार किया लेकिन जब स्टेशन जाने के लिए कोई बस नहीं मिली तो हम पैदल ही निकल गए. अनजान शहर में दो लड़कियां रात 1 बजे सड़क पर... वो भी 'छोटे कपड़ों' में. क्लब से स्टेशन का रास्ता करीब 2 किलोमीटर का रहा होगा. हमारे जैसी और लड़कियां भी 'छोटे कपड़ों' में उस सड़क पर दिख रही थीं. हम चले जा रहे थे. स्टेशन पहुंचे और ट्रेन लेकर फिर दूसरे शहर. वहां भी हमें अपने ठिकाने पर जाने के लिए बस का लंबा इंतजार करना पड़ा. बस एक घंटे बाद की थी. रात 2 बजे से लेकर 3 बजे तक हम स्टेशन पर ही रुके. एक तरफ बगल में कुछ लड़कियां बैठी थीं, एक लड़की तो दूसरी के गोद में लेट भी गई थी. दूसरी तरफ एक लड़का बैठा था.

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फिर 3 बजे बस आई... हम दोनों चढ़े. ड्राइवर से टिकट लिया. हमारे ‘छोटे कपड़ों’ में होने के बावजूद उसने हमें ऊपर से नीचे तक घूरा नहीं. उसने टिकट दिया और हम आगे जा कर बस में बैठ गए. बस में किसी ने हमें स्कैन नहीं किया.

रात करीब सवा 3 बजे हम बस से उतरे... सड़क एकदम सुनसान थी... दूर-दूर तक कोई नहीं दिख रहा था... बस से उतर कर हम पैदल ही अपने ठिकाने की ओर चल दिए... इस पूरे सफर में मुझे या उसे, रत्ती भर भी डर नहीं लगा. आया ही नहीं मन में कि 'कुछ' हो सकता है. कोई आ कर छेड़ सकता है या कोई उठाकर कहीं ले जा सकता है. मेरा ये सफर एम्सटर्डम से यूट्रेक्ट का था.

अब आते हैं दिल्ली-एनसीआर पर... जहां मैं पिछले सात सालों से रह रही हूं. तो एक दिन भरी दोपहरी में किसी काम से कहीं जा रही थी, भीड़-भाड़ वाली जगह पर एक ई-रिक्शे में बैठी. अकेली थी. तभी दूसरे ई-रिक्शे में बैठे दो लड़के इसमें आ कर बैठ गए. एक मेरे एकदम सामने. पूरे रास्ते मुझे घूरता रहा. मैंने स्कार्फ से अपना चेहरा छिपा रखा था, लेकिन तब भी उसका घूरना जारी रहा. जब ई-रिक्शा रुका तो फट से नीचे उतर गई और दूसरा रिक्शा ले लिया. जहां जाना था वहां पहुंची तो चैन की सांस ली कि सही-सलामत हूं. मेरे साथ कुछ हुआ नहीं, ऐसा-वैसा.... रेप जैसा!

आंखों से किसी का रेप करना क्या होता है, वो मैंने उस दिन महसूस किया. दिल्ली की उस भरी दोपहरी वाला डर मैं रोज महसूस करती हूं. और सिर्फ मैं नहीं, इस शहर और देश में रहने वाली तमाम लड़कियां करती हैं. फिर हम चाहे सड़क पर चल रहे हों या कैब-ऑटो में बैठे हों. रात हो या दिन. जगह सुनसान हो या लोगों से खचाखच भरी हुई. हम अकेले हों या किसी के साथ. हम तो वो हैं जो ना सड़क पर सेफ हैं, ना बस में, ना मेट्रो में और ना अपने घरों में.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आए ‘ताजा’ आंकड़ों के मुताबिक, 2017 में रेप के 33,658 मामले दर्ज किए गए. इसमें से 10,221 मामले नाबालिग से थे. रेप करने की कोशिश के कुल 4,372 मामले दर्ज किए गए. महिलाओं से छेड़खानी के 87,924 मामले सामने आए.

ये डर कि मेरे साथ कभी भी कुछ भी हो सकता है, ये मेरी जिंदगी का एक हिस्सा सा बन गया है. घर बना लिया है इसने मेरे दिल में. डर के साथ जीने के कारण ये समाज मुझे आए दिन देता रहता है... दिल्ली, कठुआ, हैदराबाद तो बस कुछ हैं.

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मेरे मां-बाप, मेरा परिवार... हर कोई इसी डर के साथ जीता है. जिनकी बेटियां दूसरे शहरों में पढ़ने या नौकरी करने गई हैं, वो रोजाना इसी खौफ में रहते हैं. उन्हें डर होता है कि जब अगली सुबह टीवी खोलें तो फ्लाईओवर के नीचे मिली जली लाश उनकी बेटी की ना निकले.

मेरी एक दोस्त ने मुझसे एक दिन कहा कि अगर उसने अपनी पूरी जिंदगी बिना रेप्ड हुए बिता ली, तो उसके लिए ये एक अचीवमेंट होगा. आप इस एक लाइन का मतलब समझ सकते हैं? क्या कोई भी इस बात का दर्द, इस बात का डर समझ सकता है जो लड़कियां आए दिन महसूस करती हैं?

ये वो लड़कियां हैं जिन्होंने चाइल्ड सेक्स एब्युज सहा है, सड़क पर लड़कों के कमेंट सहे हैं, ट्रेनों में लड़कों का घूरना सहा है, बस-मेट्रो में लड़कों का छूना सहा है... इतना कुछ सहने के बाद वो सोचने लगी हैं कि रेप तो नहीं हुआ... रेप कर के जला तो नहीं दिया, निर्भया के साथ जो हुआ, वैसा कुछ तो नहीं हुआ.

इस देश में जीने के लिए मुझे और मुझ जैसी तमाम लड़कियों को कितनी बातों का ध्यान रखना पड़ता है, ये बात क्या कभी इस समाज ने जानने की कोशिश की है? सुरक्षा, जो कि मेरा अधिकार है, उसका ध्यान भी मुझे खुद ही रखना पड़ता है.

मुझे इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि सड़क चलते कोई मेरा पीछा तो नहीं कर रहा. अगर मैं कहीं बाहर गई हूं, तो 'वक्त रहते' वापस आ जाऊं. अगर कोई कैब या ऑटो लेती हूं, तो इस बात का भी ध्यान रखना पड़ता है कि ड्राइवर को कुछ ज्यादा न बोल दूं, उससे ज्यादा बहस न हो जाए.. कहीं उसकी ईगो हर्ट हो गई, तो मैं घर पहुंचने के बजाय कहीं और ही न पहुंच जाऊं. मैं ये नहीं कह रही कि सभी ऑटो-कैब ड्राइवर रेपिस्ट होते हैं, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि कौन नहीं है.

ये डर है. और इस डर के साथ जीना कैसा होता है, ये कोई... कोई भी मर्द नहीं समझ सकता. हम इस डर के साथ जीए जा रहे हैं.

रात को 3 बजे सड़क पर घूमना या रात 12 बजे मेट्रो से घर आना... ये 'सेफ फीलिंग' एक प्रिवलेज, एक लग्जरी है. इस समाज ने सुरक्षा को, जो 'हर किसी का अधिकार' है, उसे भी एक लग्जरी बना दिया है. ये लग्जरी मुझे नीदरलैंड्स में तो मिली... लेकिन इस देश में कभी मिल पाएगी?

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