मोदी से बड़ी जंग से पहले राहुल को जीतनी होंगी कुछ छोटी लड़ाइयां
भारतीय राजनीति में राहुल ने अपनी जगह बना ली है और उनका दायरा बढ़ रहा है.
भारतीय राजनीति में राहुल ने अपनी जगह बना ली है और उनका दायरा बढ़ रहा है. (फोटो: द क्विंट)

मोदी से बड़ी जंग से पहले राहुल को जीतनी होंगी कुछ छोटी लड़ाइयां

स्वपन दासगुप्ता असली दक्षिणपंथी हैं. जब लेफ्ट और लिबरल होने का फैशन था, तब उन्होंने ‘राइट टर्न’ लिया और कट्टरपंथी हिंदुत्व का बचाव करने लगे. नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की मांग करने वाले शुरुआती दक्षिणपंथियों में भी वह शामिल रहे हैं और उसके बाद से वह लगातार उनका बचाव करते आए हैं.

इसलिए एक राष्ट्रीय अखबार में उनका एक लेख पढ़कर मैं हैरान रह गया, जिसकी हेडलाइन थी- If Modi Loses in 2019, We Are Back to Old, Unsettled Politics यानी अगर मोदी 2019 में हारते हैं तो हमें फिर से पुरानी, अस्थिर राजनीति की तरफ लौटना होगा.

राजनीति में कुछ भी बेवजह कहा या किया नहीं जाता. इसलिए लेख पढ़कर मेरे मन में सवाल उठा कि उन्होंने ऐसा क्यों लिखा? क्या यह किसी एक शख्स के मन की बात है या एक बड़े वर्ग की सोच का प्रतिबिंब? क्या यह खीझ में लिखा गया है या इसका जमीनी हकीकत से कोई लेना-देना है? क्या मोदी का जनाधार सचमुच कम हो रहा है या यह उनके आलोचकों की खामख्याली है?

कम हो रही है मोदी की लोकप्रियता

इसमें शक नहीं है कि मोदी की लोकप्रियता घट रही है. उनमें वह आत्मविश्वास नहीं दिखता, जो उनकी पहचान हुआ करता था. राहुल गांधी की बॉडी लैंग्वेज भी बदल गई है. लगता है कि जैसे उन्हें पर लग गए हैं. राहुल अब कमजोर या कन्फ्यूज्ड नहीं दिखते. वह अपने एग्रेसिव अवतार को एंजॉय कर रहे हैं. कुछ महीने पहले जो लोग राहुल को तिरस्कार की भावना से देखते थे, अचानक उन्हें उनमें नया लीडर नजर आने लगा है.

मोदी और राहुल में जो बदलाव आया है, वह संयोग नहीं हो सकता. यह एक दूसरे से जुड़ा हुआ मामला है. एक समय था, जब मोदी अजेय दिखते थे. पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति मोदी से शुरू होकर उन्हीं पर खत्म होती थी. अब लग रहा है कि राहुल ने इसमें अपनी जगह बना ली है और उनका दायरा बढ़ रहा है. सवाल यह है कि क्या राहुल का कद इतना बड़ा हो गया है कि वह मोदी को सत्ता से हटा सकें और जिसकी तरफ स्वपन इशारा कर रहे हैं?

मोदी सरकार से मोहभंग

इस सच को तो मानना होगा कि पहले जो मुकाबला एकतरफा लग रहा था, अब वैसा नहीं दिख रहा है. यह भी सच है कि देश का वैचारिक झुकाव ‘राइट से सेंटर’ की तरफ शिफ्ट हो रहा है. हालांकि, पलड़ा अभी भी राइट का ही भारी है. 2014 में जिस मध्य वर्ग और कॉरपोरेट सेक्टर ने मोदी का समर्थन किया था, उसका इस सरकार से मोहभंग हुआ है.

नए रोजगार के मौके नहीं बनने और जॉब ऑपर्च्युनिटी कम होने से मध्य वर्ग की सरकार से नाराजगी बढ़ रही है. सैलरी में मामूली बढ़ोतरी हो रही है. कॉरपोरेट्स इसलिए नाराज हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था की हालत खराब है. महंगाई सिर उठा रही है, जिससे जल्द राहत की कोई सूरत नहीं दिख रही है.

राहुल गांधी पर पूरे देश का ध्यान पहली बार तब एक साथ गया, जब उन्होंने मोदी सरकार को ‘सूट बूट की सरकार’ कहा था. मैसेज यह था कि मोदी सरकार सिर्फ अमीरों के लिए काम कर रही है. अंबानी और अडानी से कथित संबंध की वजह से उनकी यह इमेज बनी थी. मोदी स्मार्ट नेता हैं. उन्हें अपनी गलती समझ आ गई और इसके बाद उन्होंने ट्रैक बदल लिया. उन्होंने अपनी नई इमेज गढ़ने की कोशिश की. मोदी ने खुद को ऐसे नेता के तौर पर पेश करने का प्रयास किया, जिसका दिल सिर्फ गरीबों के लिए धड़कता है. हालांकि, 10 लाख रुपये का सूट जिसमें हर जगह उनका नाम लिखा था, लोग उसे अभी तक भूले नहीं हैं.

मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन

नोटबंदी की वजह से जब लोगों को अपना पैसा निकालने के लिए लंबी लाइनों में लगना पड़ा और उस दौरान 100 से अधिक लोगों की जान जाने के बाद भी गरीबों ने मोदी से वफा निभाई. उसके बाद हुए यूपी और उत्तराखंड चुनाव में बीजेपी की प्रचंड जीत ने उनके आलोचकों का मुंह बंद कर दिया. हालांकि, जीएसटी को गलत ढंग से लागू करने, बाबा राम रहीम स्कैंडल के मिस-मैनेजमेंट और जीडीपी में आई बड़ी गिरावट के बाद मोदी का कद कुछ छोटा हो गया है.

आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकट में है. लोग रोजगार के नए मौकों के लिए तरस रहे हैं. देश भर में अलग-अलग वर्ग आंदोलन कर रहे हैं. महाराष्ट्र में मराठा, गुजरात में पाटीदार, हरियाणा में जाट, आंध्र में कापु और देश भर में दलित आंदोलन हो रहे हैं.

मुस्लिम विरोधी भावनाओं को भड़काने के साथ उदार हिंदुओं को निशाना बनाए जाने से भी लोगों के अंदर गुस्सा है. बीजेपी के दो भरोसेमंद सहयोगी शिवसेना और टीडीपी के साथ टकराव की स्थिति बन गई है. बिहार में एक और सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा और यूपी में ओम प्रकाश राजभर के साथ भी बीजेपी की तकरार बढ़ रही है. कुछ महीने पहले तक बीजेपी के सहयोगी दल बहुत संभलकर बोल रहे थे, लेकिन अब वे अपनी नाराजगी का खुलकर इजहार कर रहे हैं.

गुजरात में राहुल ने दी कड़ी टक्कर

पप्पू’ वाली इमेज के बावजूद गुजरात में बीजेपी को कड़ी टक्कर देने के लिए राहुल गांधी की वाहवाही हुई. बीजेपी वहां बड़ी मुश्किल से सरकार बचा पाई. गुजरात के तजुर्बे से राहुल को लगा कि मुकाबला भले ही कठिन है, लेकिन जीत नामुमकिन नहीं. वहीं, राजस्थान उपचुनाव में मिली जीत से शायद उनके अंदर यह भरोसा जगा है कि मोदी को हराया जा सकता है. संसद में भी राहुल ने बीजेपी की दुखती रग पर हाथ रखा. उन्होंने मोदी सरकार पर करप्ट होने का आरोप लगाया.

रफाल डील में उन्हें बोफोर्स नजर आ रहा है. इस रक्षा सौदे में सरकार ने एक बड़ी गलती की. उसने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं की वजह से सरकार सौदे की कीमत की जानकारी नहीं दे सकती. जस्टिस लोया के मामले में राहुल 12 विपक्षी दलों का डेलिगेशन लेकर राष्ट्रपति के पास पहुंचे और एसआईटी बनाने की मांग की.

राहुल को कई युद्ध जीतने होंगे

राहुल, मोदी को चुनौती दे सकते हैं. 2014 की तरह अगला चुनाव एकतरफा नहीं होगा. लेकिन यह सोचना कि मोदी अब लोकप्रिय नहीं रहे, भारी भूल होगी. अगर राहुल अगले लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों का नेतृत्व करना चाहते हैं तो उन्हें 2018 में कुछ राज्यों के चुनाव जीतने पड़ेंगे. उन्हें नए भारत के लिए नया सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक फ्रेमवर्क पेश करना होगा और अपने विचार जन-जन तक पहुंचाने के लिए एक संगठन खड़ा करना होगा.

मोदी और बीजेपी-आरएसएस की संगठन क्षमता काफी मज़बूत है. 2019 की महासमर से पहले राहुल को कई युद्ध जीतने पड़ेंगे. स्वपन दासगुप्ता का लेख सिर्फ चेतावनी है, अंतिम विश्लेषण नहीं. दिल्ली अभी काफी दूर है.

(लेखक आम आदमी पार्टी के प्रवक्‍ता हैं. इस आर्टिकल में छपे विचार उनके अपने हैं. इसमें क्‍व‍िंट की सहमति होना जरूरी नहीं है.)

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