इकनॉमिक गवर्नेंस पर मोदी की गलतियां और मनमर्जियां कितनी जायज?
मोदी ने श्रम और भूमि सुधार की पहल की, जिसमें करोड़ों वोट गंवाने का जोखिम था.
मोदी ने श्रम और भूमि सुधार की पहल की, जिसमें करोड़ों वोट गंवाने का जोखिम था. (फोटो: PTI)

इकनॉमिक गवर्नेंस पर मोदी की गलतियां और मनमर्जियां कितनी जायज?

बजट जल्द भुला दिए जाते हैं. अमूमन हफ्ते भर के अंदर. इस पर सरकार की याददाश्त भी जल्द गुम हो जाती है. असल में उसके पास इतना पैसा नहीं होता है कि वह मीडियम टर्म में भी बजट को याद रख सके. फिर, लॉन्ग टर्म मेमोरी की बात तो जाने ही दीजिए. लोगों को बस आर्थिक गवर्नेंस का अंदाज याद रह जाता है.

1971 से 1991 के बीच अर्थव्यवस्था का रीढ़ टूट चुकी थी. सरकार का ध्यान उसे सक्षम बनाने पर नहीं था. वह गरीबों का हितैषी होने का दिखावा कर रही थी, क्योंकि वह सबसे बड़ा वोट बैंक था. सत्ताधारी पार्टी की इस आर्थिक सोच ने देश के औद्योगिकरण को 50 साल पीछे धकेल दिया. इससे देश में प्रोडक्शन के लिए जरूरी तीनों चीजें- जमीन, श्रम और पूंजी की लागत दुनिया में सबसे ज्यादा हो गई. मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ पहल इसी वजह से असफल हो गई है. इसीलिए नया निवेश नहीं हो रहा है. कई कंपनियां चीन से भारत नहीं आईं बल्कि बांग्लादेश, वियतनाम और फिलीपींस चली गईं. भारत में मैन्यूफैक्चरिंग की ऊंची लागत भला वे क्यों बर्दाश्त करतीं.

मोदी ने इस समस्या को दूर करने की कोशिश की. उन्होंने श्रम और भूमि सुधार की पहल की, जिसमें करोड़ों वोट गंवाने का जोखिम था. इसके बावजूद उन्होंने भूमि विधेयक पास कराने और श्रम सुधारों की कोशिश की. भारी राजनीतिक विरोध के चलते वह इसमें असफल हो गए. मोदी दोबारा प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं. इसलिए शुरुआती कोशिशों के फेल होने के बाद उन्होंने इन सुधारों का जोखिम नहीं उठाया.

सूट-बूट का ताना

इसका एक कारण मोदी सरकार के 2014 के पहले बजट सत्र में राहुल गांधी का एक ताना भी था. तब राहुल ने मोदी सरकार पर ‘सूट-बूट की सरकार’ का फिकरा कसा था. मोदी मानते हैं कि 2004 में ‘इंडिया शाइनिंग’ कैंपेन के कारण बीजेपी चुनाव हार गई थी. इसलिए श्रम और भूमि सुधार पर उन्होंने कदम वापस खींच लिए. उसके बाद मोदी ने गरीबों के लिए सरकारी योजनाओं की घोषणा करने और उन्हें बेहतर बनाने पर ध्यान दिया. मेसेज यह दिया गया कि यह सूट-बूट की सरकार नहीं है.

मोदी यह भी मानते हैं कि 2017 में यूपी विधानसभा में बीजेपी को ऐतिहासिक जीत गरीबों के लिए ‘गैस सिलिंडर’ योजना से मिली. इनसे मोदी सरकार की लोकलुभावन नीतियों वाली छवि बनी.

मोदी सरकार ने एक के बाद एक सभी क्षेत्रों में ऐसे बदलाव किए, जिससे पूंजी का बेहतर इस्तेमाल हो. एक बार ऐसा होने लगा तो कंपनियों की लागत घटेगी. दिवालिया कानून ऐसी ही पहल है. बजट में नई इंटरेस्ट रेट सबवेंशन पॉलिसी की घोषणा इसकी शुरुआत है. भारत के लिए यह बड़ी बात है, जहां अब तक निहित स्वार्थी तत्व जनता के पैसे (बैंक लोन या टैक्स फंड से) से निजी मिल्कियत खड़ी करते आए हैं. मोदी ने इस पर पूरी तरह से ब्रेक नहीं लगाया है क्योंकि जमाने से चली आ रही समस्याओं को खत्म होने में लंबा वक्त लगता है. इसके बावजूद उन्होंने इसकी नींव तैयार कर दी है.

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मोदी की मनमर्जियां

आर्थिक मोर्चे पर मोदी से कुछ गलतियां भी हुई हैं. 8 नवंबर 2016 को देश की 86 पर्सेंट करेंसी को अमान्य घोषित करना उनकी सबसे बड़ी गलती थी. मोदी काले धन पर लगाम लगाना चाहते थे. नोटबंदी का मकसद कुछ लाख करोड़ के काले धन को खत्म करना था, लेकिन बैंकिंग सिस्टम में सारी करेंसी आने से मकसद पूरा नहीं हो पाया. यह आर्थिक के साथ राजनीतिक भूल भी थी. नोटबंदी के सिर्फ राजनीतिक दुष्परिणाम होते तो शायद यह बड़ी बात न होती. इससे अर्थव्यवस्था धीमी पड़ गई और रोजगार में गिरावट आई.

आज तक यह पता नहीं चला है कि जानकारों के मना करने के बावजूद मोदी ने नोटबंदी क्यों की. शायद वह काले धन के दुष्चक्र को अच्छी तरह नहीं समझ पाए. उन्हें लगा कि नोटबंदी के एक झटके में इस समस्या से छुटकारा मिल जाएगा. मोदी ने सिर्फ नोटबंदी में ही अपने मन की नहीं की, उन्होंने गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) को लागू करने में भी जल्दबाजी दिखाई. वह भी तकनीकी और प्रशासनिक ढांचा तैयार होने से पहले.

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जीएसटी में एक और भारी गलती हुई. 62 पर्सेंट प्रॉडक्ट्स को टैक्स फ्री कर दिया गया. इससे दूसरे सामानों पर टैक्स कहीं ज्यादा बढ़ गया और आर्थिक विकास धीमा पड़ गया.

मोदी की कई गलतियां

सात महीने में नोटबंदी और जीएसटी जैसी दो गलतियां हुईं. इससे लगा कि मोदी आर्थिक नीतियों पर अपने मन की कर रहे हैं और उनसे देश को नुकसान हो रहा है. अगर उन्होंने जानकारों की सुनी होती तो यह गलती नहीं होती. किसानों को लेकर उनकी अप्रोच से भी यही लगा. उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की तरह अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य में लंबे समय तक बढ़ोतरी नहीं की. किसान वाजपेयी के खिलाफ हो गए थे. अब लगता है कि वे मोदी के भी खिलाफ हो गए हैं. शायद सभी किसान मोदी का विरोध नहीं कर रहे हैं, लेकिन जो विरोध में हैं, वो चुनावी नतीजों पर असर डालने में सक्षम हैं.

उसके बाद गोवध पर पाबंदी का फैसला. बेशक संविधान में यह बात कही गई है. यह देश के करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के मुताबिक है. यह भी सच है कि इसका राजनीतिक एंगल भी है, लेकिन अर्थव्यवस्था को इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी, मोदी सरकार ने इस पर गौर नहीं किया. गाय जब दूध देना बंद कर देती है तो किसानों के लिए उसका खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है. गोकशी पर पाबंदी के चलते वे पुरानी गाय बेच नहीं पा रहे हैं और आवारा गाय सबके लिए समस्या बन रही है.

पिछले दिसंबर में एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनाव में इसका राजनीतिक असर दिखा, जहां बीजेपी सत्ता से बाहर हो गई. गोवध पर पाबंदी अकेली वजह नहीं थी, लेकिन इससे बीजेपी को लेकर लोगों के मन में नकारात्मक छवि बनी. खासतौर पर जब कथित गोरक्षकों ने वसूली और मुसलमानों की हत्या करनी शुरू कर दी.

राजनीतिक अप्रोच

मोदी के आर्थिक गवर्नेंस में नीयत भले ही ठीक रही हो, लेकिन वह बेहद राजनीतिक (लोकलुभावन नहीं) भी है. प्रधानमंत्री ने कई मामलों में मनमानी की. आरबीआई के साथ सरकार के टकराव से यह सोच और मजबूत हुई है. टैक्स वसूली भी प्रताड़ना की सीमा तक पहुंच गई है. शायद इनके लिए सीधे मोदी कसूरवार नहीं हैं, लेकिन जवाबदेही तो उनकी ही होगी. उनके बचाव में इतना कहा जा सकता है कि वह सरकारी योजनाओं के लिए टैक्स बढ़ाकर पैसों का इंतजाम कर रहे हैं, जो अर्थवय्वस्था के लिए कम हानिकारक है.

(लेखक आर्थिक-राजनीतिक मुद्दों पर लिखने वाले वरिष्ठ स्तंभकार हैं. इस आर्टिकल में छपे विचार उनके अपने हैं. इसमें क्‍व‍िंट की सहमति होना जरूरी नहीं है.)

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