उर्दूनामा पॉडकास्ट: ‘रश्क-ए-कमर’, जब महबूब से चांद भी जलने लगता है
पॉडकास्ट में द क्विंट की फबेहा सय्यद बात कर रही हैं शायर अज़हर इक़बाल से, जो चांदनी बिखेरती हुई अपनी चंद पंक्तियां पढ़ रहे हैं.
पॉडकास्ट में द क्विंट की फबेहा सय्यद बात कर रही हैं शायर अज़हर इक़बाल से, जो चांदनी बिखेरती हुई अपनी चंद पंक्तियां पढ़ रहे हैं.Photo: The Quint

उर्दूनामा पॉडकास्ट: ‘रश्क-ए-कमर’, जब महबूब से चांद भी जलने लगता है

रश्क का मतलब है जलन ईर्ष्या, क़मर यानी चांद। और बीच में '-ए-' का साउंड दो शब्दों को मिलाकर बोलने के काम आता है.

तो रश्क-ए - क़मर को जोड़कर बोला जाएगा तो इसका मतलब होता है 'चांद की जलन' यानी कोई ऐसा शख्स जिसमें चांद जैसी खूबियां हों, या फिर चांद जैसी खूबसूरती हो और जिससे चांद को जलन हो रही है.

उर्दू में चांद को क़मर, मह, और महताब भी कहते हैं. उर्दूनामा के इस एपिसोड में, जानिए 'चांद' के हवाले से मेहबूब की खूबसूरती का ज़िक्र उर्दू शायरी में कैसे होता आ रहा है. पॉडकास्ट में द क्विंट की फबेहा सय्यद बात कर रही हैं शायर अज़हर इक़बाल से, जो चांदनी बिखेरती हुई अपनी चंद पंक्तियां पढ़ रहे हैं.

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