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भागवत का बच्चों के पालन पोषण पर हिंदुओं को पाठ: सियासत ज्यादा, असलियत कम

इंटरफेथ शादियों को लेकर डर फैलाया जा रहा है जबकि देश में इसको लेकर कोई डेटा ही मौजूद नहीं है

हिंदुओं में अपनी धार्मिक पहचान, या यूं कहिए धर्म के लिए गर्व की भावना जगाना और पूजा पाठ के लिए श्रद्धा पैदा करना, हिंदुत्व का एक दशक पुराना प्रॉजेक्ट है, लेकिन वह पूरी तरह से कामयाब नहीं हुआ है. हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) ने जो भाषण दिया है, वह इसी बेताबी को दर्शाता है. इसमें भागवत ने इस बात पर बहुत अधिक चिंता जताई थी कि हिंदु लोग अपने धर्म के बाहर शादियां कर रहे हैं.

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स्वयंसेवकों से बातचीत में भागवत की वेदना साफ झलक रही थी, उन्होंने कहा, “धर्म परिवर्तन कैसे होते हैं? हिंदु लड़कियां और लड़के सिर्फ अपने छोटे से स्वार्थ, शादी के लिए कोई दूसरा धर्म कैसे अपना सकते हैं? जो ऐसा कर रहे हैं, वे गलत हैं, लेकिन एक बात और भी है. क्या हम अपने बच्चों का पालन-पोषण नहीं करते? दरअसल हमें उन्हें घर पर ही अपने मूल्य देने चाहिए. हमें उनमें खुद के लिए, अपने धर्म के लिए और पूजा की अपनी परंपरा के प्रति सम्मान पैदा करने की जरूरत है”

‘हम’ और ‘वे’

भागवत ने आरएसएस कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों को उत्तराखंड के हल्द्वानी में भाषण दिया. मीडिया से उसकी जो खबरें मिलीं, उसके हिसाब से वहां भागवत ने पांच मुद्दे उठाए थे: हिंदु युवा अपने धर्म के बाहर शादियां कर रहे हैं और धर्म बदल रहे हैं, बचपन से ही बच्चों को पारिवारिक और धार्मिक मूल्य सिखाने का महत्व, ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को सार्वजनिक स्तर पर सक्रिय किया जाए, एक आम दावा कि मुगल काल में भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत अधिक गिरावट आई थी और जहां तक बच्चों के ओटीटी देखने की आदत का सवाल है, तो उनकी मॉरल पुलिसिंग की जानी चाहिए.


भागवत के भाषण से पता चलता है कि संघ परिवार धर्म के आधार पर भारतीय समाज में मौजूदा खाई को जस का तस तो रखना चाहता ही है, साथ ही यह भी चाहता है कि यह खाई और चौड़ी होती जाए। इससे यह पक्का होगा कि चुनावी समर में हिंदु लोग भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खेमे में जमा हो जाएं.

यह सीधे तौर से समाज को दो वर्गों में बांटता है- ‘हमारा’ और ‘उनका’, भागवत के बयान, जिस पर संघ परिवार सालों से अड़ा हुआ है, को उस अभियान के मद्देनजर देखा जा सकता है, जिसे बहुत शैतानी तरीके से ‘लव जिहाद’ का नाम दिया गया है. बीजेपी की कई राज्य सरकारें ऐसे कानून बना रही हैं, जोकि इंटर-फेथ शादियों पर पाबंदी लगाते हैं और ऐसे संबंधों को हतोत्साहित करते हैं.

बाकी के दकियानूसी समुदायों की ही तरह हिंदुत्व के समर्थकों के दिमाग भी पिता सत्ता से भरे पड़े हैं- असली समस्या यह है कि ‘हमारी’ औरतें ‘उनके’ आदमियों से शादियां कर रही हैं, न कि ‘उनकी’ औरतें ‘हमारे’ आदमियों के साथ घर बसा रही हैं.

दो धर्म वालों के बीच शादियां- डेटा बनाम भागवत का दावा

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कभी नेता लोग आपस में हिलमिलकर रहने और दो समुदायों के बीच शादियों को बढ़ावा देने की बात कहा करते थे. लेकिन यह गुजरे जमाने की बात है. अब लोगों को यह पढ़ाना सिखाना बहुत आम बात है कि बच्चों को अपने बीच ही शादियां करने की शिक्षा दी जाए. हो सकता है कि धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को अलग-थलग करने से आने वाले समय में कोई राजनैतिक इनाम मिल जाए, लेकिन इससे भारतीय समाज की भीतरी परतें अलग-अलग हो जाएंगी, सामाजिक सुरक्षा को खतरा होगा और देश के बाहरी विरोधियों को फायदा पहुंचेगा.


दूसरे धर्मों के लिए डर और नफरत की आग में भागवत और उनके जैसे दूसरे लोग जब-तब घी डालते रहते हैं. लेकिन दिलचस्प है कि भारत के पास इंटरफेथ शादियों का कोई डेटा मौजूद नहीं है जिसके आधार पर कोई यह दावा कर सकता है कि यह एक प्रवृत्ति है और चिंता करने की बात भी

जनगणना या किसी सरकारी सर्वे में इंटरफेथ शादियों पर कोई रिकॉर्ड नहीं है. कुछ स्कॉलर्स ने जरूर यह कहा है कि इंटरफेथ शादियों का व्यापक तौर पर समाज पर बहुत कम असर होता है.

इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेज़ के एकैडमिक्स ने 2005 में एक सर्वे किया था. इसमें कहा गया था कि भारत के 1,503 गांवों और 971 शहरी इलाकों के 41,554 परिवारों में सिर्फ 2.21% शादीशुदा औरतों ने अपने धर्म से बाहर किसी से शादी की है. सबसे अहम बात यह है कि इनमें सबसे ज्यादा ईसाई महिलाएं थीं, फिर सिख, हिंदु और मुसलमान औरतें आती थीं. इन औरतों के पार्टनर्स की धार्मिक पहचान पर कोई जानकारी नहीं दी गई थी.

बहुसंख्यकों के हमलों के बीच मुसलमान

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यह सर्वे संघ परिवार के इस दावे की पुष्टि जरूर करता है कि मुसलमानों की बजाय हिंदु औरतें ज्यादा बड़ी संख्या में अपने धर्म के बाहर शादियां कर रही हैं, लेकिन भारत में धर्म पर प्यू रिसर्च सेंटर का हाल का सर्वे और भी कुछ कहता है। इसमें भी यही बात दोहराई गई है लेकिन यह भी कहा गया है कि धार्मिक आधार पर शादियां और इनकी वजह से धर्म बदलने के मामले, गिने-चुने ही हैं. सर्वे में शामिल ज्यादातर भारतीयों ने यही राय जाहिर की कि अपने समुदाय के लोगों को दूसरे धार्मिक समूहों में शादियों करने से रोकना बहुत जरूरी है,


बजाय इसके कि भागवत एक जिम्मेदार नेता की तरह देश की एकता को बरकरार रखने के लिए सभी समुदायों के साथ हिलमिलकर रहने की बात करते, उन्होंने समाज की उसी सोच को स्वर दिया, और बढ़ावा भी.

वह घबराए हुए हैं, जोकि उनके पूरे राजनैतिक कुनबे की भी घबराहट है. प्यू सर्वे के नतीजों में भी यही घबराहट जाहिर होती है, क्योंकि इससे पता चलता है कि हिंदुओं की बजाय मुसलमान इंटर फेथ शादियों को रोकना ज्यादा जरूरी मानते हैं.

सर्वे में शामिल हिंदुओं में से 67% ने कहा था कि हिंदु औरतों को दूसरे धर्म में शादी करने से रोकना बहुत अहम है, हालांकि 65% ने कहा था कि आदमियों को भी दूसरे धर्म में शादियां नहीं करनी चाहिए.

मुसलमानों में ऐसा कहने वालों की दर क्रमशः 80% और 76% थी, जो बताता है कि वह समुदाय ज्यादा रूढ़िवादी और अंतर्मुखी है। इसीलिए यह कहने की जरूरत नहीं कि बहुसंख्यक समुदाय जिस तरह अल्पसंख्यकों पर हमले कर रहा है और उन्हें लगातार निशाना बना रहा है, उसे देखते हुए अल्पसंख्यकों में विश्व स्तर पर संरक्षणवादी सोच पुख्ता हुई है।

हिंदुओं को ‘शिकार बनाया जा रहा है’

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ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार और 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद भारत में अल्पसंख्यकों की धार्मिक पहचान साफ दिखने लगी। लोगों को ऐसी कॉलोनियों में रहने को मजबूर होना पड़ा जहां ज्यादातर मुसलमान लोग रहते थे, वहां मुसलमानों के लिए खुद को मुसलमान दिखाना बहुत जरूरी हो गया.

जैसा कि प्यू रिसर्च से पता चलता है कि मुसलमानों की ऐसी प्रतिक्रिया और खुद को दूसरों से अलग-थलग करने की प्रवृत्ति को भागवत औऱ दूसरे लोगों ने गलत नजरिये से पेश किया. वीडी सावरकर जैसे लोगों ने जिस अभियान को एक सदी पहले शुरू किया था, उसी को आगे बढ़ाया गया और मुसलमानों को बदनाम किया गया.

भागवत इसीलिए बार-बार उसी थ्योरी को मजबूत करते हैं कि हिंदु औरतों को धर्म के बाहर शादियां करने से रोका जाना चाहिए, चूंकि मुसलमान आदमियों की ‘बुरी नजर’ हिंदू औरतों को अपना ‘शिकार बनाती है’. इस थ्योरी के आधार पर हिंदु बेचारे पीड़ित बताए गए हैं और आरएसएस प्रमुख हल्द्वानी की ही तरह, पहले भी कई बार यह दावा कर चुके हैं कि मुगल काल में भारत आर्थिक रूप से बहुत कमजोर हो गया था, जबकि तथ्य कुछ और कहते हैं.

राजनैतिक सच्चाई भी देखिए

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इतिहास को लेकर आरएसएस परिवार के दावे राजनीति से प्रेरित और संकरे नजरिए पर आधारित हैं। कहा जाता है कि इस्लाम भारत में ‘आक्रमणकारी राजाओं’ के जरिए पहुंचा. लेकिन तथ्य बताते हैं कि तीन रास्तों से भारत में इस्लाम पहुंचा- ईस्वी सदी की पहली सहस्राब्दि में व्यापार मार्ग से, सूफीवाद से और उन मुसलमान सरदारों की जरिए, जिन्होंने मध्य युग में अपने साम्राज्य खड़े किए. सिर्फ एक रास्ते की तरफ इशारा करने का मतलब, राजनैतिक रोटियां सेंकना ही है.

भागवत ने अपने हाल के भाषण में जिन बिंदुओं पर जोर दिया है, वह पुरानी मान्यताओं को पुख्ता करता है और हिंदुओं को वही घिसी-पिटी जिम्मेदारी सौंपता है. बच्चों के लालन-पालन की बात कहकर हिंदुओं को यह संदेश भी दिया जा रहा है कि वे लोग खुद की हिफाजत नहीं कर पा रहे हैं, जबकि ‘दूसरे’ ऐसा कर रहे हैं.

ताकतवर बहुलतावादी यह पैंतरा चलते रहे हैं ताकि बहुसंख्यकों को महसूस हो कि वे पीड़ित हैं और इस तरह उनकी घेराबंदी की जा सकती है. लेकिन बीते कुछ समय की राजनैतिक सच्चाई यह है कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों में असुरक्षा और अलगाव भर चुका है.

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(लेखक दिल्ली स्थित एक लेखक और पत्रकार हैं. उन्होंने ‘द आरएसएस: आइकन्स ऑफ द इंडियन राइट’ और ‘नरेंद्र मोदी: द मैन, द टाइम्स’ जैसी किताबें लिखी हैं. उनका ट्विटर हैंडिल @NilanjanUdwin है. यह एक ओपिनियन पीस है. यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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