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मोदी सरकार के नये IAS नियम विपक्षी सरकारों पर हमला करने के लिए एक और रणनीति है

मोदी जब गुजरात के सीएम थे, तब उन्होंने अपने IAS अधिकारियों को रिलीज करने से मना करने का सर्वकालिक रिकॉर्ड बनाया था.

जवाहर सरकार
नजरिया
Updated:
<div class="paragraphs"><p>IAS राज्यों के कामकाज में अहम हिस्सा होते हैं उनके बीच खौफ फैलाने का इरादा स्पष्ट दिख रहा है</p></div>
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IAS राज्यों के कामकाज में अहम हिस्सा होते हैं उनके बीच खौफ फैलाने का इरादा स्पष्ट दिख रहा है

(फोटो: क्विंट हिंदी)

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जब मैंने यह लेख लिखना शुरु किया, तब तक 9 राज्यों मुख्यमंत्रियों ने प्रधानमंत्री मोदी के उस प्रस्ताव पर विरोध जता चुके थे, जिसमें भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) कैडर रूल्स 1954 के नियम 6 में संशोधन (Indian Administrative Service (IAS) Cadre Rules of 1954) करने की बात कही गई है. इस विरोध प्रदर्शन में अन्य राज्यों के शामिल होने की भी संभवना है, जिससे केंद्र और राज्य के बीच कड़वाहट का नया दौर शुरु हो सकता है.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Chief Minister of West Bengal) ने सबसे पहले केंद्र के इस कदम का जवाब दिया. उन्होंने इसे "कठोर" और "हमारी शानदार व महान संघीय राजनीति के स्तंभों और भारत की संवैधानिक योजना के बुनियादी ढांचे के खिलाफ" बताया.

तो, वास्तव में ऐसा कौन सा मुद्दा है, जिसने केंद्र के दो हानिरहित सुझावों के विरोध में इतने राज्यों को एक साथ ला दिया है, जो भारी नौकरशाही में निहित है? यह सब तब शुरु होता है जब केंद्र सरकार के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने 20 दिसंबर 2021 को सभी राज्यों को एक पत्र भेजा, जिसमें राज्यों से केंद्र में IAS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को नियंत्रित करने के लिए एक संशोधन की सिफारिश की गई थी. संशोधित नियम के तहत, अब सभी राज्य केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए IAS अधिकारियों की विस्तृत सूची प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होंगे.

हालांकि, यह एक तथ्य है कि 'केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व' के लिए राज्यों ने आमतौर पर अपने IAS अधिकारियों की कुल संख्या के 40 फीसदी तक नाम नहीं भेजे हैं. इसके साथ ही ये भी सच है कि IAS अधिकारियों की संख्या हमेशा जरूरत से कम ही रही है.

राज्यों द्वारा इस बात पर जोर और तर्क दिया जा रहा है कि अगर और अधिकारियों को रिलीज किया जाएगा, तो उनके अपने (राज्यों) के प्रशासन का पतन हो जाएगा. इससे राज्यों में प्रशासनिक व्यवस्थाएं ढह सकती हैं.

क्या अकबर की मनसबदारी व्यवस्था जैसा है ये?

केंद्र नामों की इस सूची से अधिकारियों को चुनता है, लेकिन अब वह राज्यों से एक बड़ी सूची या और ज्यादा नामों की मांग कर रहा है. नियम में संशोधन होने से केंद्र न केवल उस संख्या को निर्धारित करने में सक्षम होगा, जो उसे प्रदान की जानी चाहिए, बल्कि जिस तारीख तक इसे भेजा जाना चाहिए, उसे भी निर्धारित करने में सक्षम होगा.

यह कुछ हद तक अकबर की मनसबदारी प्रणाली के जैसा है, जिसमें यह मांग की जाती थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन शासक के पास निश्चित संख्या में सैनिक और घुड़सवार भेजे जाएं.

हालांकि, केंद्र ने इस स्तर पर पहले कभी दबाव नहीं बनाया था. ऐसा इसलिए था, क्योंकि IAS की 'अधिकृत कैडर संख्या' में भयंकर कमी भी केंद्र द्वारा अपर्याप्त भर्ती के कारण है.

एक यह सच भी है कि कई अधिकारी केंद्र स्तर पर एक वरिष्ठ पद पर सेवा करने का अवसर गंवा देते हैं और यहां तक कि जो दिल्ली या आसपास के क्षेत्र से संबंधित हैं, वे भी राज्य छोड़ने में असमर्थ हैं. कुछ अन्य मामले ऐसे भी होते हैं जो अपने बच्चों की पढ़ाई या बीमार माता-पिता की वजह से इस पर विचार नहीं कर पाते. वहीं, कुछ राज्य केंद्र में अधिकारियों को भेजने के मामले में काफी रिर्जव रहते हैं. इसके साथ ही कम महत्वपूर्ण व्यवहार के मामले भी होते जो हर जगह देखने को मिलते हैं.

हालांकि, अगर अब IAS नियम में संशोधन किया जाता है, तो यह लचीलापन और स्वैच्छिक तत्व (voluntary element) खतरे में आ जाएंगे और केंद्र जितने अधिकारियों की मांग करेगा, राज्यों को उतने अधिकारियों को भेजने के लिए मजबूर होना पड़ेगा. किसी भी संघीय व्यवस्था या देश में इस तरह के बल का प्रयोग का शायद ही कभी किया गया हो, क्योंकि इससे राज्यों के कामकाज को नुकसान पहुंचता है. आखिरकार, एक संघीय व्यवस्था को उसी तरह कार्य करना चाहिए जैसा कि विवाह में समान भागीदार यानी पार्टनर करते हैं. हालांकि, कुछ शासक अपनी पत्नियों को कम महत्व देते हैं.

केंद्र और राज्यों दोनों के पास अधिकारियों की अपनी-अपनी बटालियन हैं, जो अपनी सरकारों को रिपोर्ट करते हैं, अंग्रेजों ने दोनों के बीच एक कड़ी के रूप में काम करने के लिए एक तीसरी श्रेणी, अखिल भारतीय सेवाओं (AIS) का निर्माण किया था. इस विशाल और विविध उपमहाद्वीप को एक साथ रखने के लिए, उन्हें दो मुख्य AIS, ICS और इंपीरियल पुलिस (Imperial Police) की जरूरत थी. राज्य प्रशासन के सबसे निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक, वास्तविक व्यावहारिक प्रशासन में उनका लंबा अनुभव एक विशेषज्ञता थी, जिसे संघीय सरकार महत्व देती थी. इसने उन्हें क्षेत्रीय विविधताओं की अधिक समझ प्रदान की और इन चिंताओं को केंद्रीय प्राथमिकताओं के साथ संतुलित करने में उनकी सहायता की.

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सरदार पटेल के विचारों खिलाफ जाते हैं मोदी

स्वतंत्रता के बाद, ब्रिटिश शासन के दौरान इन सेवाओं से पीड़ित लोगों ने बार-बार यह मांग की थी कि इन दोनों सेवाओं को भंग कर दिया जाए, लेकिन इससे निडर सरदार पटेल ने विरोधियों पर विजय प्राप्त की थी. वे आलोनाओं व आलोचकों पर बिना डरे हावी थे. सरदार पटेल ने 1949 में आलोचकों को चेतावनी भरे लहजे में कहा था कि, "अगर आपके पास एक अच्छी अखिल भारतीय सेवा नहीं है, जिसमें... सुरक्षा की भावना हो. तब आपके पास यूनाइटेड इंडिया यानी संयुक्त भारत नहीं रहेगा और ऐसे में यूनियन यानी संघ भी नहीं रहेगा."

इस प्रकार, स्वतंत्र भारत में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के रूप में उन सेवाओं को एक नया जीवन मिला. इसने राष्ट्रीय एकीकरण में सहायता की, क्योंकि एक राज्य में तैनात दो सेवाओं में आधी संख्या 'बाहरी' लोगों की होती है. संकट के दौरान जब-जब प्रदर्शनकारियों ने हिंसक आंदोलनों और केंद्र के खिलाफ विद्रोह और यहां तक ​​​​कि भारतीय संघ को खत्म करने का आह्वान किया था, तब-तब दोनों सेवाएं ने परीक्षा दी है.

अफसोस की बात यह है कि पटेल ने जिस "सुरक्षा की भावना" की बात की थी, वह अब उस शख्स की वजह से खतरे में है, जो दिखाने में उनकी पूजा करते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो दूसरा संशोधन करना चाहते हैं, उसे कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग के 12 जनवरी, 2022 के पत्र में उल्लेखित किया गया है. जो राज्यों को IAS कैडर नियमों के नियम 6 में एक अतिरिक्त संशोधन के लिए सहमत होने के लिए कहता है. अगर यह संशोधन लागू किया जाता है तो केंद्रीय पोस्टिंग के लिए 'चयन' करने वाले अधिकारियों की मौजूदा प्रणाली, अगर राज्य उन्हें रिहा कर सकता है, वह अप्रचलित हो जाएगी. इससे केंद्र यह तय करेगा कि कितने IAS अधिकारियों को केंद्रीय पोस्टिंग के लिए भेजा जाना है. सही मायने में राज्यों काे उन अधिकारियों को रिलीज करने के लिए मजबूर किया जाएगा, फिर चाहे भले ही वे बुरी तरह पीड़ित ही क्यों न हों.

सेंट्रल पोस्टिंग में जरूरी नहीं है कि नियुक्ति दिल्ली के मंत्रालयों ही हो, यह देश के किसी भी हिस्से में हो सकती है. यह नियुक्ति गैर-सरकारी संगठनों सहित केंद्र द्वारा चुने गए किसी भी पद के लिए हो सकती है.

संघीय संतुलन बनाए रखने वाली मूल अवधारणा यह है कि IAS अधिकारियों को राज्य के अधीन सेवा करते समय राज्य सरकारों के प्रति वफादार होना चाहिए, लेकिन अवधारणा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी, क्योंकि केंद्र किसी भी समय IAS अधिकारियों को मजबूर कर सकता है या डरा सकता है.

स्पष्ट है कि सरकार का इरादा उन IAS अधिकारियों में डर पैदा करना है जो राज्यों के कामकाज के लिए महत्वपूर्ण हैं. इससे निस्संदेह विपक्ष की नेतृत्व वाली सरकारों को निशाना बनाया जाएगा. एक राज्य में किसी को पद से हटाए जाने और भारत के दूर-दराज के हिस्से में, जैसे लद्दाख या किसी अस्पष्ट अर्ध-सरकारी संगठन में ट्रांसफर करने का डर अधिकांश के लिए पर्याप्त होगा.

'कमी' की हकीकत

प्रतिनियुक्ति पर पर्याप्त संख्या न मिलने का केंद्र का तर्क इस तथ्य की अनदेखी करता है कि वास्तव में IAS अधिकारियों की कमी है. यह ठीक उसी स्थिति जैसा है जब आपकी चादर या कंबल छोटी हो. उस स्थिति में जब आप पैर ढंकने का प्रयास करेंगे तो सिर खुला रह जाएगा, वहीं अगर सिर को ढंकने के लिए चादर खींचेंगे तो पैर खुले रह जाएंगे. यहां पर एक-दूसरे के उलट होता रहता है. कभी सिर तो कभी पैर खुला रह ही जाएगा.

एक केंद्रीय सचिव, जो इस विषय पर बहुत कम बोलते हैं, क्योंकि DoPT उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है, ने मीडिया को बताया कि केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर IAS अधिकारियों की संख्या दस सालों में 309 से घटकर 223 हो गई है. वह और उनके बॉस यह समझ नहीं पा रहे हैं कि ज्यादातर IAS अधिकारी राज्यों में कम आकर्षक पदों पर काम करना पसंद करेंगे, बजाय केंद्र में जहां उन्हें किसी के द्वारा धमकाए जाने का डर है.

बतौर CM मोदी ने कैसे अधिकारियों को रिलीज करने से मना कर दिया था

प्रधानमंत्री को IAS में इस कमी के बारे में 2001 में पता था, जब वे मुख्यमंत्री बने थे. यह भी एक संयोग ही है कि गुजरात से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए अपने IAS अधिकारियों को रिलीज करने से मना करने का उनका एक सर्वकालिक रिकॉर्ड है. अगर वे थोड़े-बहुत भी ईमानदार होते, तो अपने लंबे कार्यकाल में IAS की सीधी भर्ती की संख्या बढ़ा सकते थे और राज्य सेवाओं से 'प्रमोशन कोटा' भर सकते थे. दुर्भाग्य से, यह केवल आधिपत्य ही है जो उन्हें प्रेरित करता है. ये वही मुख्यमंत्री थे, जिसने केंद्र के 'बॉसिज्म' (जो उस समय काफी कम था) के बारे में 14 साल तक बिना रुके सबसे ज्यादा शिकायत की थी. वे अब संघीय संबंधों को नई गहराई पर ले जाना चाहते हैं.

अगर इस प्रस्ताव पर जोर दिया जाता है, तो राज्यों के पास अडिग रहने और कोर्ट में प्रस्तावित नियमों का विरोध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. उन्हें सामूहिक रूप से किसी ऐसे व्यक्ति के सामने आत्मसमर्पण करने से इंकार करना चाहिए, जो हमारे संविधान का भार सहने वाले स्तंभों: लोकतंत्र (democracy), बहुलवाद (pluralism), मानवाधिकार (human rights) और अब संघवाद (federalism) को लगातार पंगु बना रहा है.

(जवाहर सरकार, रिटायर्ड आईएएस अधिकारी हैं. अन्य पदों के अलावा, वे प्रसार भारती के सीईओ और भारत सरकार के संस्कृति सचिव रह चुके हैं. वे @jawharsircar से ट्वीट करते हैं. इस लेख में व्यक्ति विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का इससे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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Published: 28 Jan 2022,04:03 PM IST

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