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रामनाथ कोविंद का कार्यकाल: आंदोलन और अशांति के दौर में 'अडिग चुप्पी'

President Ramnath Kovind के कार्यकाल राष्ट्रपति भवन सरकार की हर बात से सहमत दिखा

शुमा राहा
नजरिया
Published:
<div class="paragraphs"><p>राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद / प्रतीकात्मक तस्वीर</p></div>
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राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद / प्रतीकात्मक तस्वीर

फोटो : अर्निका काला / क्विंट

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अनुसूचित जनजाति से भारत के पहले राष्ट्रपति के तौर पर द्रौपदी मुर्मू की नियुक्ति को देश के समावेशिता और समान अवसर के मौलिक सिद्धांतों की प्रचंड जीत के रूप में देखा जा रहा है. राम नाथ कोविंद ने 25 जुलाई 2017 को जब भारत के 14वें राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ली थी तब इसी तरह उनकी दलित पहचान का ढिंढोरा पीटा गया था. खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार द्वारा इसे पिछड़ी जातियों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के उदाहरण के तौर पर खूब प्रचारित-प्रसारित किया था.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व वकील, राज्यसभा सदस्य, बिहार के राज्यपाल और इसके अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वफादार कोविंद की राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर की गई नियुक्ति को सत्ताधारी पार्टी की ओर से एक राजनीतिक मास्टरस्ट्रोक के रूप देखा गया था. इस नियुक्ति को एक ऐसे कदम के तौर भी देखा गया था कि जो बीजेपी की दलित विरोधी छवि को कम करने में अहम भूमिका निभाएगा. 2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या पर जो हंगामा हुआ था उससे इस छवि (दलित विरोधी) को और मजबूती मिली थी. इसी वर्ष (2016 में) गुजरात के ऊना में "गोरक्षा" की आड़ में दलित परिवार के कई सदस्यों को कोड़े मारे गए थे.

  • चूंकि भारत को एक नया राष्ट्रपति मिल चुका है. ऐसे में यह राम नाथ कोविंद के कार्यकाल पर पीछे मुड़कर देखने का समय है. इसके साथ ही इस पर भी आकलन करना होगा कि इस मृदु-भाषी, सौम्य-व्यवहार वाले राष्ट्राध्यक्ष को किसलिए याद किया जाएगा.

  • भारत को विगत पांच वर्षों में उतार-चढ़ाव वाली कई घटनाओं को सामना करना पड़ा. इसमें सीएए से लेकर अनुच्छेद 370 को हटाने और किसानाें का संघर्ष तक शामिल है. इनमें से हर मामले में कोविंद ने सरकार का अडिग समर्थन किया.

  • यहां तक कि जब एक दलित व्यक्ति के खिलाफ विशेष रूप से जघन्य या घिनौना अपराध सामने आया, तब भी कोविंद का चुप रहने का इतिहास रहा है. यह बात चौंकाने वाली रही, क्योंकि उन्हें उनकी जाति का संदर्भ देते हुए काफी जोरदार तरीके से यहां पर बैठाया गया था.

  • चाहे विषय कोई भी हो कोविंद के शब्दों ने कभी भी सरकार की उत्साहपूर्ण मैसेजिंग के खिलाफ जरा भी तर्क या मतभेद नहीं दिखाया. हमेशा सुर में सुर मिलाया.

  • क्या द्रौपदी मुर्मू कोविंद की विरासत को जारी रखेगी या अपनी खुद की आवाज को ढूंढ पाएंगी और एक अलग और सशक्त रास्ता तराशेंगी?

आज, जब राष्ट्रपति कोविंद अपने योग्य उत्तराधिकारी द्रौपदी मुर्मू के लिए रास्ता बनाने के लिए राष्ट्रपति भवन छोड़ने के लिए तैयारी कर रहे हैं, ऐसे में यह राम नाथ कोविंद के कार्यकाल पर पीछे मुड़कर देखने और आकलन करने का समय है कि इस मृदु-भाषी, सौम्य-व्यवहार वाले राष्ट्राध्यक्ष को किस लिए याद किया जाएगा.

सरकार के प्रति उदार समर्थन

राष्ट्रपति कोविंद के कार्यकाल के पांच वर्षों के दौरान भारत कई उतार-चढ़ाव वाली घटनाओं से गुजरा. केंद्र की बीजेपी सरकार ने अगस्त 2019 में संविधान के अनुच्छेद 370 (जिसने जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था) को निरस्त करने का विवादास्पद निर्णय लिया. जल्द ही इसके बाद देश में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगे. मार्च 2020 में COVID-19 महामारी ने देश में आमद की, जिसकी वजह से हजारों लोगों की जान और आजीविका बर्बाद हो गई. इसके अलावा महामारी फैलने के बावजूद 2020 के अंत में सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ बड़े पैमाने पर किसानों के विरोध प्रदर्शन हुए.

राष्ट्रपति इनमें से हर मामले में सरकार के पीछे खड़े थे और उसके (सरकार के) फैसलों का समर्थन किया था. आर्टिकल 370 को निरस्त करने पर उन्होंने अपनी स्वीकृति की मुहर लगाई थी और इसके बाद अपने कई भाषणों में इसे एक ऐतिहासिक कदम ( ऐसा कदम जिससे भारत के लोगों को खुशी हुई) के तौर संदर्भित किया था.

31 जनवरी 2020 को संसद में अपने संबोधन के दौरान उन्होंने CAA को "एक ऐतिहासिक कानून" करार दिया था जबकि उस समय देश में CAA पर विवाद और विरोध हो रहा था. उसी भाषण में उन्होंने कहा था कि "इस दशक को भारत का दशक बनाने के लिए मेरी सरकार मजबूत कदम उठा रही है." इसके अलावा कोविंद ने महामारी से निपटने और आबादी के बड़े हिस्से का टीकाकरण करने में सरकार के प्रयासों की अक्सर सराहना की है.

संक्षेप में कहें तो चाहे विषय कोई भी हो कोविंद के शब्दों ने कभी भी सरकार की उत्साहपूर्ण मैसेजिंग के खिलाफ जरा भी तर्क या मतभेद नहीं दिखाया. हमेशा सुर में सुर मिलाया.
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निश्चित तौर पर यह सच है कि भारत के राष्ट्रपति का संवैधानिक पद काफी हद तक औपचारिक होता है और राष्ट्रपति से यह उम्मीद की जाती है कि मंत्रिपरिषद के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार के निर्देश पर कार्य वह करेंगे/करेंगी.

फिर भी माना जाता है कि इन सबसे ऊपर उठकर राष्ट्रपति का ओहदा या कर्तव्य संविधान के प्रति अपनी निष्ठा रखने वाला होता है. उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, कोविंद से पहले के अन्य राष्ट्रपति कभी-कभी सरकार और उसके कार्यों या चूक के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त करने के लिए जाने जाते हैं.

स्पष्टवादिता और मुखरता जरूरी है 

कोविंद के पूर्ववर्ती दिवंगत प्रणब मुखर्जी उल्लेखनीय रूप से मुखर थे. कानून बनाने के लिए ताबड़तोड़ अध्यादेश लाने की वजह से एनडीए सरकार की खिंचाई करने से लेकर 2015 में दादरी लिंचिंग की वजह से भारत में पैदा हुए असहिष्णुता के माहौल पर निराशा व्यक्त करने और संसदीय कार्यवाही को बाधित करने के लिए विपक्ष की आलोचना करने तक कई मौकों पर मुखर्जी ने अपने मन की बात कही. इसके साथ ही असहिष्णुता और भीड़ के उन्माद के खिलाफ देश के संवैधानिक मूल्यों की समावेशिता और विविधता की रक्षा करने की जरूरत पर बार-बार जोर दिया.

दिवंगत राष्ट्रपति ने कहा था कि "तर्कवादी भारतीय के लिए हमेशा जगह होनी चाहिए, लेकिन असहिष्णु भारतीय के लिए कभी नहीं."

ऐसे राजनेता जैसे शब्द हमने राष्ट्रपति कोविंद की तरफ से नहीं सुने हैं. हो सकता है कि उन्होंने कभी भी चेतावनी देने की जरूरत ही महसूस नहीं की, क्योंकि जिस तरह से सरकार देश चला रही थी, उससे वह हमेशा संतुष्ट थे.

'दलित राष्ट्रपति' से दलितों का क्या हुआ?

लेकिन दलितों के खिलाफ बढ़ते अपराधों का क्या? क्या राष्ट्रपति कोविंद को उस पर विचार करना चाहिए था? हालांकि किसी व्यक्ति की उपलब्धियों को उसकी जातिगत पहचान के चश्मे से देखना संदेहास्पद है. चूंकि कोविंद (केआर नारायणन के बाद भारत के दूसरे दलित राष्ट्रपति) को उनकी जाति के संदर्भ में इतने जोर-शोर से नियुक्त किया गया था इसलिए दलितों के हितों की रक्षा में उनके योगदान की जांच करना शायद अनुचित नहीं है.

यह एक सर्वविदित सत्य है कि पूरे भारत में दलितों के साथ मारपीट, बलात्कार और हत्या की घटनाएं लगभग हर दिन होती हैं. इस साल मार्च में केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने संसद को बताया था कि 2018 और 2020 के बीच दलितों के खिलाफ हुए अपराधों के 1 लाख 38 हजार 825 मामले दर्ज किए गए. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार 2020 में अनुसूचित जाति (SC) समुदायों के खिलाफ अपराधों में पिछले वर्ष की तुलना में 9.4% की वृद्धि हुई, जबकि इसी अवधि के दौरान अनुसूचित जनजातियों (ST) के खिलाफ अपराधों में 9.3 फीसदी की वृद्धि हुई.

ये आंकड़े चिंताजनक हैं. हालांकि, यहां तक कि जब दलित व्यक्ति के खिलाफ एक विशेष रूप से जघन्य या घिनौना अपराध सामने आया तब भी राष्ट्रपति कोविंद उस पर कुछ नहीं बोलने के लिए जाने जाते हैं. इसकी वजह से उनकी व्यक्तिगत दलित पहचान और इस धारणा को धक्का लगा कि राष्ट्रपति के तौर पर वह अपने समुदाय के समर्थन में एक सशक्त आवाज होंगे.

क्या मुर्मू खोज पाएंगी अपनी खुद की आवाज?

भले ही विगत पांच वर्षों में भारत आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांप्रदायिक तनावों साथ ही बड़े पैमाने पर आंदोलन और अशांति से जूझता रहा हो, लेकिन कोविंद की प्रेसीडेंसी शांत पानी की तरह थी, उसमें कोई हलचल नहीं थी. कोविंद का कार्यकाल सौम्यतापूर्वक रहा, जो नरमी भरे भाषणों और सरकार के प्रति उदार समर्थन द्वारा चिन्हित है.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या द्रौपदी मुर्मू कोविंद की विरासत को जारी रखेंगी या अपनी खुद की आवाज को ढूंढ पाएंगी और एक अलग और सशक्त रास्ता तराशेंगी?

(शुमा राहा, एक पत्रकार और लेखक हैं. वह @ShumaRaha पर ट्वीट करती हैं. यह एक ओपनियन पीस है. यहां व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं. क्विंट का उनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

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