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हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक चेतना में अनियंत्रित कामना के साथ-साथ हिंसा का आवेग भी इतना प्रबल हो चुका है कि हमारा देश ‘बलात्कार की राजधानी’ के नाम से भी जाना जा रहा है. यह हम सभी के लिए भारी शर्मिंदगी की बात है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, 2021 में देश में रेप के 31,677 मामले दर्ज किए गए. इसका मतलब है औसतन 86 मामले रोज. सबसे अधिक मामले राजस्थान और उसक बाद मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए. 2020 की तुलना में, बलात्कार के मामलों में 19.34% वृद्धि हुई है. गौरतलब है कि ये सिर्फ वे मामले हैं, जिनकी रिपोर्ट दर्ज हुई है.
अक्सर लोग महिला के आचरण, उसकी पोशाक, उसके तौर-तरीकों को जिम्मेदार मानने लगते हैं. लेखक ऐसा महसूस करता है कि बलात्कार के लिए उस शहर, जिले, राज्य के प्रत्येक अधिकारी, विधायक, सांसद, मंत्री, शिक्षक के साथ वहां का हर पुरुष भी जिम्मेदार होता है.
बलात्कार को समाजशास्त्रियों और अपराध विशेषज्ञों ने बहुत ही जटिल किस्म का अपराध माना है. बलात्कार की घटनाओं की जितनी खबरें आप पढ़ते-सुनते हैं, उनसे कई गुना अधिक वारदातें तो छिपा ली जाती हैं, क्योंकि इस अपराध के सर्वाइवर के साथ पूरी जिंदगी एक ‘कलंक’ जुड़ जाता है और बलात्कार के बाद उसका व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन सामान्य रह ही नहीं पाता. ऐसे में घर परिवार के लोग बदनामी के डर से ऐसी घटनाओं को छिपा लेते हैं.
पुलिस का व्यवहार और पूछताछ के तरीके भी अक्सर पीड़ितों को शिकायत करने से रोकते हैं. कोर्ट में वकीलों का सामना करना, उनके उलजलूल सवालों का जवाब देना, सर्वाइवर के लिए काफी मुश्किल होता है. देखते-देखते बलात्कारी छूट जाता है और मुस्कुराते हुए जेल से बाहर निकल जाता है. बलात्कार की शिकार अधिकांश 18 से 30 वर्ष की महिलाएं होती हैं.
‘जहां स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता बसते हैं’ — ऐसा मंत्र जपने वाले इस देश में हर बीस मिनट में एक महिला का बलात्कार होता है. ज्यादातर मामलों (94%) में अपराधी जान-पहचान का निकलता है. आंकड़े यह भी बताते हैं कि बलात्कार के ज्यादातर मामले पुलिस की फाइलों तक नहीं पहुंचते. करीब 70 फीसदी बलात्कार ऐसे होते हैं, जिनकी खबर पुलिस को नहीं दी जाती, क्योंकि यह पीड़ित के अलावा पूरे परिवार की ‘इज्जत’ का प्रश्न माना जाता है.
बलात्कार सिर्फ एक महिला के खिलाफ अपराध नहीं, समूची मानवता के खिलाफ एक जघन्य, घिनौना, अक्षम्य अपराध है.
सेक्स की कामना, विपरीत सेक्स वाले किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षण एक स्वाभाविक मानसिक गति है, लेकिन इसमें अनुमति की जगह अगर जोर-जबरदस्ती और हिंसा है, तो वही सबसे घिनौने और क्रूर कृत्य में बदल जाता है.
भय से त्रस्त होकर और अवसर की कमी से कई लोग नैतिक बने बैठे हैं. नैतिकता किसी भी तरह से अनैतिकता का विलोम नहीं. ठोस, खरी नैतिकता अपने विपरीत के गलियारों से बाहर मुक्त विचरती है. भय के दबाव से अनैतिकता कभी नैतिकता में बदल नहीं पाती. वह एक नयी तरह की प्रच्छन्न, अवगुंठित, भ्रामक नैतिकता को बस जन्म दे देती है.
एक पुरुष प्रधान समाज में स्त्री को कमजोर दिखाकर उसका इस्तेमाल करना और उसे 'नष्ट' कर देना? इसके साथ 'इज्जत' की एक बहुत ही गहरी धारणा इससे जुड़ी है.
क्या किसी स्त्री की तथाकथित इज्जत उसके शरीर से संबंधित है? किसी स्त्री की 'इज्जत जाने' का सवाल और उसके साथ जुड़ा एक सामाजिक कलंक? जिस स्त्री का बलात्कार हुआ, उसका क्या दोष, और उसकी इज्जत कहां चली गई? किसने ले ली उसकी इज्जत, और अगर ऐसी कोई चीज है भी, जो चली गई है, तो उसमें क्या मैं और आप दोषी नहीं? जिस समाज में एक स्त्री की ‘इज्जत’ गई, क्या उसके हर पुरुष की भी इज्जत नहीं चली गई? उस इलाके के पुलिसवालों, डीएम और उस राज्य के मुख्यमंत्री की इज्जत अभी बची है?
कोई विवाहित पुरुष अगर अपनी पत्नी के साथ बगैर उसकी सहमति के अपनी सेक्स की इच्छा को पूरा करता है, तो वह भी बलात्कारी है. और अगर कोई स्त्री ऐसा करती है, तो वह भी.
ऐसे में कोई क्या करे? “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” — इसे रटे और रटाएं? स्त्रियों की पूजा का आदर्श बनाकर? बच्चों को सिखाएं कि वह सभी स्त्रियों को मां और बहन मानें, उनके चरण छूएं तो इस समस्या से मुक्ति मिलेगी?
आदर्श तो हमारे बहुत बड़े दुश्मन हैं. दमन से मुक्ति नहीं मिलती. यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है. बच्चों के सामने मीडिया है, इंटरनेट है, शारीरिक रूप से वयस्क होने से पहले उनकी यौन भावनाएं जाग जाती हैं, पॉर्न का असर उनके मन पर बहुत गहरा होता है, और फिर जिस समाज में वे रहते हैं, वहां स्थिति बिल्कुल अलग होती है. उस काल्पनिक, अवास्तविक, आभासी दुनिया का असर और वास्तविक समाज के हालात के बीच जो दूरी होती है, वह भी तरह-तरह की विकृतियों को जन्म देती है, कुंठा और हिंसा को जन्म देती है.
तो बलात्कारी के मन को कैसे बदलें? अवश्य ही प्रशासन की अपनी भूमिका है, उसे सख्त कदम उठाने चाहिए और देखना चाहिए कि ऐसा हो ही न. न्यायपालिका की बड़ी भूमिका है, कि वह सुनिश्चित करे कि अपराधियों को जल्द से जल्द और सख्त से सख्त सजा मिले, लेकिन वह भी अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रही.
तो समस्या कैसे दूर हो? संवेदनशीलता कैसे जन्मे, कैसे संवर्द्धित हो? कविताएं पढ़ा कर? कीट्स और शैली, कालिदास और केदारनाथ सिंह को पढ़कर? बच्चों को फूल, पत्तियां और तितलियां दिखा कर? अपने घरों में और समाज में इंटरनेट और पॉर्न पर रोक लगाकर? लड़कियों को जीन्स की जगह सलवार-कुर्ता, या बुर्का पहनाकर? मीडिया को ज्यादा जिम्मेदारी देकर? नेताओं की जुबान पर लगाम लगाकर? ज्यादा सख्त पुलिस और प्रशासन की मदद लेकर?
जब तक ये सवाल सिर्फ बलात्कार के पीड़ितों से जुड़े लोगों और उनके परिवारों के सवाल भर नहीं रह जायेंगे, और समाज का हर समझदार व्यक्ति इनके बारे में सोचेगा, अपने विचार साझा करेगा, अपने इर्द-गिर्द छिपे बैठे संभावित बलात्कारियों पर नजर रखेगा, शायद तभी इन प्रश्नों का सही जवाब मिल पाएगा. हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षकों की इसमें बड़ी भूमिका है कि वे लड़कों को संवेदनशील बनाएं, लड़कियों को अपनी सुरक्षा के उपाय करना सिखाएं. रेपिस्ट को सजा देने के साथ-साथ उस बलात्कारी मन को भी गहराई से समझना चाहिए. इसके लिए जरूरी है कि रेपिस्ट की कैद के समय मनोचिकित्सक भी उससे लगातार मिलें और उसके अतीत, उसके बचपन के अनुभव, पारिवारिक पृष्ठभूमि को खंगालें. इस समस्या का एक समग्र, चौतरफा समाधान जरूरी है.
फिर भी ये जवाब बड़े सीमित हैं. शाखाओं की काट-छांट करने जैसे हैं. कहां है इनका सही जवाब? मैं लगातार पूछ रहा हूं, खुद से भी और आप सभी से. हाथ जोड़कर, आंखें झुकाकर. सभी पुरुषों की ओर से समस्त स्त्री जाति से क्षमा मांगते हुए शर्मिंदा हूं अपने, पुरुष होने पर.
(ये आर्टिकल द क्विंट के एक मेंबर ने लिखा है. हमारा मेंबरशिप प्रोग्राम उन लोगों को मौका देता है, जो फुल-टाइम जर्नलिस्ट या हमारे नियमित कॉन्ट्रिब्यूटर नहीं हैं. उनकी राय द क्विंट के खास 'Member’s Opinion’ सेक्शन में पब्लिश हो सकते हैं. हमारी मेंबरशिप द क्विंट के किसी भी पाठक के लिए उपलब्ध है. आज ही Q-Insider बनें और हमें अपने लेख Membership@thequint.com पर भेजें.)
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