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इकनॉमी और कामगार को होगा जितना नुकसान, शेयर बाजार उतना चढ़ेगा!

अर्थव्यवस्था नीचे जाती है तो शेयर बाजार ऊपर क्यों जाता है?

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भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी तीन साल पहले की स्थिति में नहीं पहुंची है. ऐसे में सेंसेक्स के लिए नई ऊंचाई पर पहुंचना कैसे संभव है? मेनस्ट्रीम अर्थशास्त्री आपको बताएंगे कि यह एक संकेत है कि शेयर बाजार वास्तविक अर्थव्यवस्था से अलग हो गए हैं. वे कहेंगे कि सिस्टम में एक खतरनाक 'बबल' बन रहा है जो जल्द ही फटने वाला है.

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यह विचार कि बाजार एक 'तर्कहीन उत्साह' प्रदर्शित कर रहा हैं, न केवल शेयर बाजार कैसे काम करता है, बल्कि यह भी कि वे पूरी तरीके से अर्थव्यवस्था से कैसे संबंधित हैं, की गलत समझ पर आधारित है.

इसे समझने के लिए हमें मेनस्ट्रीम के अर्थशास्त्र की दुनिया को छोड़कर राजनीतिक अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में प्रवेश करना होगा.

आधुनिक पूंजीवादी अर्थव्यवस्थाएं (सरलता के लिए हम भारत को मानेंगे) मुख्य रूप से लोगों के तीन समूहों से बनी हैं. पहले वे हैं जिनके पास उत्पादक संसाधन जैसे भूमि, कारखाने, मशीनें और कार्यालय हैं. दूसरा, बहुत बड़ा समूह उन लोगों से बनता है जो पहले समूह के लिए काम करते हैं. और तीसरे वे हैं जो इस पूरे प्रणाली को आसान बनाते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि यह सुचारू रूप से चले. इनमें न केवल सुपरवाइजर और मैनेजर शामिल हैं जो पूंजी के मालिकों की ओर से बिजनेस चलाते हैं, बल्कि नेता, बाबु, न्यायिक अधिकारी, पुलिस, वकील, शिक्षक और हर कोई जो रूल ऑफ कैपिटल के चक्र में शामिल हैं.

मार्केट मुनाफे के पीछे भागता है

कोई भी व्यक्ति किसी कंपनी के शेयर को खरीदकर उस कंपनी के पूंजी का मालिक हो सकता है, भले ही वह बहुत छोटे हिस्से का हकदार ही क्यों न हो. ऐसा इसलिए क्योंकि किसी कंपनी के शेयर में शेयरधारकों का उसके मुनाफे पर अधिकार होता है. तो, एक अर्थव्यवस्था में उत्पन्न कुल आय में मुनाफे के हिस्से के आधार पर शेयर बाजार ऊपर या नीचे जाता है. अगर वह शेयर बढ़ता है, तो बाजार ऊपर जाता है. यदि यह गिरता है, तो बाजार या तो गिर जाता है या ज्यादातर समय 'साइडवेज' में चला जाता है.

आइए इसे समझने के लिए एक काल्पनिक उदाहरण लेते हैं. कल्पना कीजिए कि एक अर्थव्यवस्था में उत्पन्न कुल आय पहले वर्ष में ₹100 है. इसमें से ₹50 उन लोगों के पास जाते हैं जिनके पास मुनाफे के रूप में पूंजी होती है, और शेष ₹50 उनके लिए जो काम करते हैं, मजदूरी और वेतन के रूप में दिया जाता है. दूसरे वर्ष में, अर्थव्यवस्था ₹110 तक फैल जाती है. इस बार, हालांकि, मुनाफे का हिस्सा घटकर ₹45 रह गया और मजदूरी का हिस्सा बढ़कर ₹65 हो गया. देश की जीडीपी में 10 फीसदी की बढ़ोतरी के बावजूद शेयर बाजार में गिरावट आएगी.

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अब, कल्पना कीजिए कि तीसरे वर्ष में मंदी है और अर्थव्यवस्था का आकार सिकुड़ कर ₹95 हो गया है। इस बार, मजदूरी तेजी से घटकर ₹40 हो गई, लेकिन मुनाफा ₹55 तक बढ़ गया. भले ही देश की जीडीपी में 13.6 फीसदी की गिरावट आई हो, लेकिन मुनाफे में 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. प्रॉफिट में हुई ग्रोथ को दर्शाने के लिए अब शेयर बाजार में तेजी आएगी. दूसरे शब्दों में, पूंजीपतियों और उनके कर्मचारियों के बीच जितनी अधिक असमानता होगी, शेयर बाजार उतना ही बढ़ेगा.

क्या होगा यदि चौथे वर्ष में, सकल घरेलू उत्पाद वापस ₹115 पर उछलता है, लाभ ₹58 तक बढ़ जाता है और मजदूरी ₹57 तक बढ़ जाती है? सामान्य तौर पर, बाजारों में वृद्धि होनी चाहिए क्योंकि मुनाफा बढ़ा है और चूंकि मजदूरी दर में हुई वृद्धि से मार्केट में कमोडिटी की डिमांड बढ़ेगी और इसलिए भविष्य में कंपनी का मुनाफा और बढ़ना चाहिए. फिर भी, संभावना है कि बाजार सिकुड़ जाएगा, या धीरे-धीरे बढ़ेगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि पूंजीवाद प्रोडक्टिव संसाधनों के जमा होने पर दांव लगाता है. इस मामले में, भले ही मुनाफे में वृद्धि हुई हो, लेकिन मजदूरी दर की तुलना में कंपनी के प्रॉफिट में गिरावट आई है. यह एक सिस्टम के रूप में पूंजीवाद के कामकाज और रिप्रोडक्शन के लिए एक समस्या है.

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संक्षेप में, बाजार मुनाफे का पीछा करता है. अगर मुनाफे का हिस्सा बढ़ता है, तो चाहे अर्थव्यवस्था बढ़ रही हो या सिकुड़ रही हो, शेयर बाजार बढ़ता है.

पूंजीपतियों का नेट प्रॉफिट बढ़ा

भारत में इस समय ठीक यही हो रहा है. हमारे पास तिमाही सकल घरेलू उत्पाद (GDP) और जून 2021 को समाप्त हुए तिमाही के कॉर्पोरेट रिजल्ट है. चूंकि तिमाही रिजल्ट की संख्या में बहुत अधिक उतार-चढ़ाव होता है और इसपर सीजन का भी असर पड़ता है. इसलिए एक साथ चार तिमाहियों की साथ तुलना करेंगे. आइये देखते हैं जुलाई से जून के बीच 12 महीने की अवधि को. मैं जुलाई 2019 से जून 2020 के लिए जीडीपी और बीएसई 100 की कमाई (Earnings) की तुलना जुलाई 2020 से जून 2021 के आंकड़ों से करूंगा. और चूंकि कमाई के आंकड़े उस समय बाजार कीमतों पर रिपोर्ट किए जाते हैं, इसलिए मैं उनकी तुलना मौजूदा बाजार भाव पर 'नॉमिनल' जीडीपी से करूंगा.

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इन दो अवधियों के बीच, जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया है, भारत की नॉमिनल जीडीपी में 9% की वृद्धि हुई. साथ ही, BSE 100 कंपनियों की नेट सेल्स में 6% की वृद्धि हुई, जोकि मोटे तौर पर GDP वृद्धि दर के करीब थी.

इसी अवधि में, वेतन और मजदूरी भत्ते में केवल 3% की वृद्धि हुई, जो रिटेल महंगाई दर में 6% की वृद्धि से काफी कम है. इन बीएसई 100 कंपनियों के नेट प्रॉफिट का क्या हुआ? वे बड़े पैमाने पर 85% ऊपर चले गए.

मार्च 2020 को समाप्त होने वाली प्री कोविड​​​​-19 तिमाही के आंकड़ों की तुलना 2021 की जून तिमाही से करें तो मुनाफे में वृद्धि और भी चौंकाने वाली है.

इस अवधि में जहां नॉमिनल जीडीपी में 2% की कमी आई, वहीं बीएसई 100 कंपनियों के नेट प्रॉफिट में 159% की बढ़ोतरी हुई. इसी अवधि में वेतन और मजदूरी में सिर्फ 5% की वृद्धि हुई.

इसकी तुलना 31 मार्च 2020 और 30 जून 2021 के बीच बीएसई 100 इंडेक्स में 91% की वृद्धि से करें, और आप देखेंगे कि कॉर्पोरेट मुनाफा बाजार में तेजी को सही ठहराने में बिल्कुल तर्कसंगत रहा है.

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इससे पता चलता है कि अभी शेयर मार्केट में कोई तर्कहीन' उत्साह' नहीं है. शेयर बाजार पूंजीपति के मुनाफे में वृद्धि को सटीक रूप से दर्शा रहे हैं. और चूंकि बाजार आगे की ओर देख रहा है, वे पूंजी संचय की तेज गति पर दांव लगा रहे हैं.

आखिर कौन मारेगा बाजी?

बेशक, शेयर बाजार पर नजर रखने वालों के लिए कई चिंताजनक संकेत हैं. ऐसा ही एक पैमाना मार्केट-कैप-टू-जीडीपी अनुपात वर्तमान में 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट से ठीक पहले 2007-08 की अवधि से भी ऊपर, लाइफटाइम हाई लेवल पर है. और ये संकेत देते हैं कि अगले कुछ महीनों में 'करेक्शन' हो सकता है. लेकिन जब तक भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था पूंजी के मालिकों को उच्च रिटर्न की सुविधा देती है और जब तक अंतरराष्ट्रीय वित्त पूंजी की छाया में आर्थिक नीति का फैसला किया जाता है, तब तक भारत के शेयर बाजार के निवेशक हमेशा मुनाफा बनाते रहेंगे.

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