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Budget 2023: आर्थिक किल्लत में कैसे बढ़ाएं पूंजीगत खर्च? निर्मला के पास हैं उपाय

Finance Minister Nirmala Sitaraman के लिए चुनावी साल में लोकलुभावन बजट पेश करना बड़ी चुनौती होगी

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Budget 2023: आर्थिक किल्लत में कैसे बढ़ाएं पूंजीगत खर्च? निर्मला के पास हैं उपाय
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(Union Budget 2023 से जुड़े सवाल? 3 फरवरी को राघव बहल के साथ हमारी विशेष चर्चा में मिलेंगे सवालों के जवाब. शामिल होने के लिए द क्विंट मेंबर बनें)

भारत को हाई ग्रोथ के रास्ते पर होने की जरूरत है और काम इस तरह से होना चाहिए कि कैपेक्स (Capital Expenditure) भी बढ़े और और बजट पर ज्यादा दबाव भी ना बने. अगर कोई सेल्फ हेल्प वाली किताब हो जिसका नाम ‘हाउ टू ईट केक एंड हैव इट टू’  हो तो शायद आप इसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) को देना चाहेंगे, जो इससे कुछ टिप्स और ट्रिक्स ले सकें और बजट (Budget 2023) में उसका इस्तेमाल कर पाएं.  इस साल जो बजट (Union budget for 2023-24) वो पेश करने जा रही हैं, वो काफी अहम है और उन्हें ऐसा बजट देना है जो हर मोर्चे पर काम करता हुआ नजर आए.

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अब जरा किसी वन डे मैच की बल्लेबाज की तरह एक काल्पनिक तस्वीर का खाका खींचें. मैच में 6 विकेट गिर चुके हैं और पांच ओवर गेम खत्म होने में बाकी है और 80 रन जीत के लिए चाहिए. अगले साल 2024 में होने वाले आम चुनावों के साथ, 1 फरवरी का उनका बजट प्रभावी रूप से उनका चुनावी बजट होने वाला है, लेकिन इसके लिए ना तो फिस्कल रिसोर्स है और ना ही ग्लोबल इकोनॉमी ऐसा मौका दे रही है कि वो कोई लोकलुभावन खर्च कर सकें.  क्योंकि इसके लिए न तो राजकोषीय संसाधन और न ही ग्लोबल इकोनॉमी की स्थिति सही है. उनकी पार्टी बीजेपी भी इस तरह की चीजें पसंद नहीं करती. 

महंगाई काबू में नहीं है. भारतीय रिजर्व बैंक अभी एक बार और ब्याज दरें बढ़ा सकता है. यूरोप और अमेरिका दोनों डबल डिजिट महंगाई से अब पीछे हट रहे हैं. पूरे साल 2022 में ग्लोबल इन्वेस्टर्स को यूक्रेन पर रूसी आक्रमण की वजह से परेशान रखा. इस वजह से ईंधन की कीमतों में उछाल आया.  

कैपिटल एक्सपेंडिचर (कैपेक्स ) क्यों इस बजट में काफी अहम है

देश में घरेलू डेमोग्राफिक ट्रांजिशन (हर महीने 10 लाख लोग काम के लिए तैयार हैं) को देखते हुए भारत को हाई ग्रोथ के रास्ते और ज्यादा नौकरी के मौके पैदा करने की जरूरत है और इसके लिए बजट पर दबाव बनाए बिना कैपेक्स को बढ़ाना सबसे ज्यादा जरूरी है. 

यहीं पर मोदी सरकार को लीक से हटकर सोचना होगा या क्रिकेट की तरह देखें तो स्लिप और विकेट के बीच के गैप को तलाशना होगा.  कैपिटल एक्सपेंडिचर जो नए उपकरणों और कारखानों से लेकर इमारतें, हेल्थकेयर, शिक्षा पर खर्च सबकुछ शामिल हो सकता है , वो इंडस्ट्रियल ग्रोथ और इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए बुनियादी तौर पर बहुत जरूरी है. 

सौभाग्य से टीम इंडिया के लिए, कुछ गैप और कुछ अंतर्निहित ताकतें हैं, जो सरकार को यह मानने में मदद कर सकती हैं कि वो कुछ स्मार्ट काम कर सकती है. उनमें से सबसे बड़ी तथा कथित ‘इंडिया ग्रोथ स्टोरी’है जो बरकरार है, हालांकि इस पर सरकारी आशावाद अक्सर जमीनी हकीकत से काफी ऊपर है. 
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लाखों-करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं और जरूरतों को समान रूप से आगे बढ़ाने के साथ, लंबी अवधि के निवेशकों को ऐसे प्रोत्साहनों का लालच दिया जा सकता है, जिनमें वास्तविक सरकारी खर्च शामिल नहीं है. मार्केटिंग रोड शो की मंजूरी देकर सरकार इस तरह के कैंपेन को और ज्यादा तेज कर सकती है.  

चुनावी बजट का मूड और सरकार का फिस्कल डेफिसिट प्लान

लेकिन अगर सरकार अपनी बात पर चलना चाहती है, तो वो विचार कर सकती है, जिसे मैं निबोट टैक्स कहना चाहूंगा या नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री के नाम पर टोबिन टैक्स ..जिन्होंने सट्टेबाजी के प्रवाह को रोकने के लिए विदेशी पूंजी का सुझाव दिया था. लेकिन भारत टोबिन के विचार को इस तरह से बदल भी सकता है कि वो सिर्फ पहले आने वाले फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट (FDI) के लिए टैक्स कटौती की पेशकश करे जो असली इन्वेस्टमेंट के परे निवेश करे. यह उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में मौजूदा मनोदशा के लिए काउंटर के तौर पर काम कर सकता है. 

ग्लोबल एनालिस्ट इस तथ्य से सहमत हैं कि चुनावी साल में बजट फिस्कल कॉन्सिलिडेशन को कुछ वक्त के लिए और टाल दे और यह एक मौके में भी बदल सकता है. वॉल स्ट्रीट पावर हाउस गोल्डमैन सैक्स ने पिछले महीने कहा था कि केंद्र सरकार सब्सिडी में कुछ कमी कर सकती है. इसके जरिए फिस्कल डेफिसिट को मार्च 2024 के अनुमानित 6.4 %  से घटाकर 5.9% तकलाया जा सकता है. फिस्कल कॉन्सोलिडेशन व्यापक इकनॉमिक स्टेबिलिटी, कम सरकारी उधारी सुनिश्चित करेगा और निजी निवेशों की सहायता के लिए ब्याज दरों को नियंत्रण में रखेगा.

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हालांकि, चीजें अनुमान से ज्यादा आसान हो सकती हैं. रेटिंग एजेंसी ICRA ने इसी महीने कहा था कि डायरेक्ट टैक्स और GST कलेक्शन में चालू वित्त वर्ष में बजट से अधिक रेवेन्यू की ओर ले जा सकता है. लगभग 100,000 करोड़ रुपये की व्यय बचत के साथ यह सरकार को थोड़ा और खर्च करने में मदद कर सकता है. 

कई विश्लेषकों को यह उम्मीद है कि सरकार को 6.4% के फिस्कल डेफिसिट के टारगेट को पूरा करने में अनुमान से ज्यादा GDP (मौजूदा अनुमान 7% पर) मददगार हो सकता है. यदि एक हल्के चुनावी साल में फिस्कल डेफिसिट पर फोकस को थोड़ा रोक लिया जाए और अगर सरकार सावधानी से कदम उठाए तो उसके पास वास्तव में 2023-24 में खर्च करने के लिए अतिरिक्त गुंजाइश हो सकती है.

ऐसा करने का एक तरीका यह होगा कि महंगाई के जिन्न को बोतल से बाहर निकाले बिना खर्च को थोड़ा रोका जाए. इसमें पहली बात ये होगी कि उम्मीद रखा जाना चाहिए कि प्राइवेट सेक्टर की स्पेंडिंग बढ़े और फिर वित्त वर्ष के दूसरे हिस्से में जो सरकारी खर्च है उसे वापस ले लिया जाए. यह निजी पूंजीगत व्यय को धीरे-धीरे "क्राउड इन" करने में मदद कर सकता है ताकि संकट के समय पब्लिक स्पेंडिंग के साथ तालमेल बैठाया जा सके.  
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जलवायु संकट से निपटने के लिए ग्रीन एनर्जी में निवेश

FDI में मजबूत कैपेक्स की संभावना बनी हुई है, खासकर लंबी अवधि के निवेशकों को शॉर्ट टर्म परेशानियों की चिंता नहीं है. क्लाइमेट चेंज पर बढते फोकस की वजह से पहले से ही संभावित इन्वेस्टरों ने ग्रीन हाइड्रोजन, सोलर एनर्जी की तरफ ले जा रहा है.  सिर्फ 2022 में ही सोलर एनर्जी प्रोजेक्ट के लिए पूंजीपतियों ने दुनिया भर में 7 बिलियन अमेरिकी डालर का अनुमानित निवेश किया.

ग्रीन बिजनेस की तरफ झुकाव वाले भारतीय स्टार्ट-अप और प्राइवेट इक्विटी- सस्ती दरों पर बैंक कर्ज की उम्मीद कर सकते हैं और उन्हें ज्यादा पूंजी मिल सकती है.  कंसल्टिंग फर्म अर्न्स्ट एंड यंग ने स्पेन, जापान और डेनमार्क सहित कई विकसित देशों से आगे भारत को न्यू एनर्जी के डेस्टिनेशन कंट्री के तौर पर जगह दिया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस महीने की शुरुआत में कहा था कि भारत 2030 तक लगभग 125GW न्यू एनर्जी सोर्स को विकसित करने का इरादा रखता है, जिसमें ग्रीन हाइड्रोजन का एक्सपोर्ट भी शामिल है. अडानी और अंबानी समूह ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट में सबसे आगे हैं, जिनको सरकार का साथ भी है. सॉवरेन वेल्थ फंड्स के साथ स्मार्ट बातचीत भारत को ग्रीन ट्रेड और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं दोनों में मदद कर सकती है.

यदि बड़े, विश्वसनीय भारतीय समूह अंतरराष्ट्रीय बाजारों में 'मसाला बांड' (रुपया डिनोमिटेड बॉन्ड जिनमें कोई विदेशी मुद्रा का रिस्क नहीं है) जुटाते हैं, तो यह सरकारी बजट को नुकसान पहुंचाए बिना प्राइवेट स्पेंडिंग में मदद कर सकता है.  
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भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक असर

इस बीच, भारतीय बैंक एक संभावित नए क्रेडिट चक्र पर बैठे हैं, जिसमें वे उधार देने के इच्छुक होंगे क्योंकि उन्होंने पिछले कर्ज चक्र की जो परेशानी थी उससे वो लगभग निकल चुके हैं.  NPA को दूर करने में काफी हद तक वो कामयाब रहे हैं और अब नया दिवालिया कोड और ‘बैड बैंक’ने उधारदेने वालों के लिए अतिरिक्त सुरक्षा बढा दिया है.  

पिछले सितंबर में, कुल मिलाकर भारत के वाणिज्यिक बैंकों का नेट नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NNPA) अनुपात दस साल के निचले स्तर पर था. इसका मतलब यह है कि बैंकों को खराब ऋणों को कम करने की अभी चिंता नहीं है और उधारी देने के लिए उनके पास ज्यादा संसाधन हैं. बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि वित्तमंत्री एक निवेश और उधार व्यवस्था के लिए किस तरह की बातचीत और प्रोत्साहन के साथ चलते हैं, जो सिस्टम में गैप को देखते हुए प्राइवेट एक्सपेंडिचर को बढ़ावा देगा.

इस सब में बिगाड़ने वाली बात चीनी अर्थव्यवस्था को उसके कोविड पाबंदियों के बाद फिर से खोलना हो सकता है. कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि बेंचमार्क कच्चे तेल की कीमतें साल के अंत तक मौजूदा यूएसडी 84 से चढ़कर 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाएंगी.

फिलहाल यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस से सस्ता तेल खरीदने के मौके का फायदा भारत उठा रहा है जो स्मार्ट फाइनेंस है लेकिन आखिर में युद्ध खत्म होने पर महंगाई काबू में आएगी. चीन के फिर से खुलने का मतलब ग्लोबल इकोनॉमी के लिए बूस्ट हो सकता है लेकिन यह भारत के लिए अच्छी बात नहीं होगी. 

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के लिए मौके तो हैं, लेकिन वित्तीय बाधाओं और वैश्विक बाधाओं के कारण दायरा और वक्त बहुत सीमित है. 

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