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ऑक्सीजन की कमी क्यों?डिमांड-सप्लाई का हिसाब और किल्लत का क्या इलाज

सरकार यह भी कह रही है कि देश के स्टील प्लांटों के पास ऑक्सीजन का स्टॉक है

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COVID-19 सकंट के बीच ऑक्सीजन की कमी क्यों?
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कोरोना संकट में ऑक्सीजन की कमी नई समस्या बनकर पैदा हुई है. मरीज ऑक्सीजन की कमी का सामना कर रहे हैं. बहुतों की मौत इस वजह से हो चुकी है. ऑक्सीजन सिलेंडरों की कालाबाजारी भी हो रही है.

ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद ऑक्सीजन संकट की समीक्षा की है. तय हुआ है कि ऑक्सीजन के प्लांट बिठाए जाएंगे और इसका आयात भी किया जाएगा. लेकिन, यह समस्या क्यों पैदा हुई? क्या सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी? और, सबसे बड़ा सवाल कि क्या पीएम के फैसले के बाद ऑक्सीजन की समस्या खत्म हो जाएगी?

इसमें संदेह नहीं कि गहराते कोरोना संकट के बीच मरीजों के लिए ऑक्सीजन की जरूरत और मांग बढ़ गई है. गुरुवार को ही केंद्र सरकार ने अस्पतालों को किफायत से ऑक्सीजन का इस्तेमाल करने के निर्देश दिए थे और ऑक्सीजन की बर्बादी रोकने के उपाय करने को कहा था. पीएम की समीक्षा के बाद ताजा फैसले के हिसाब से पीएम केयर्स फंड से देश के 100 नए अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट लगाने और 50 हजार मीट्रिक टन ऑक्सीजन के आयात को अमली जामा पहनाने में कितना वक्त लगेगा? - इस बारे में कुछ भी नहीं बताया गया है.

क्या वाकई देश में ऑक्सीजन की कमी है?

सबसे अहम सवाल यह है कि क्या वास्तव में ऑक्सीजन की कमी है? या फिर यह वितरण की समस्या के कारण पैदा हुई कमी है? इसे ऐसे समझें कि अगर मेडिकल जरूरतों के लिए ऑक्सीजन का उत्पादन हो रहा है लेकिन वह आवश्यकता से कम है तो वाकई ऑक्सीजन की कमी है. लेकिन ऐसा है नहीं. कैसे?-इसे भी समझिए. देश में प्रतिदिन ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता 7127 मीट्रिक टन है. 12 अप्रैल को ऑक्सीजन की खपत 3842 मीट्रिक टन थी. मतलब यह कि उत्पादन क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा था. क्या इसे कमी कहेंगे? अगर अचानक मांग बढ़ गई तो उसकी पूर्ति के लिए हमारी आपूर्ति व्यवस्था तैयार नहीं थी. वास्तव में ऑक्सीजन की कमी इसी वजह से पैदा हुई है.

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सरकार यह भी कह रही है कि देश के स्टील प्लांटों के पास ऑक्सीजन का स्टॉक है. 14 हजार मीट्रिक टन ऑक्सीजन का स्टॉक रहते हुए ऑक्सीजन की कमी कैसे हो गई, जबकि उत्पादन भी पूरी क्षमता के साथ नहीं हुआ?
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बफर स्टॉक न रहने से पैदा हुई किल्लत

असल समस्या ऑक्सीजन सिलेंडर की मांग या जरूरत न होकर उसकी आपूर्ति है. 12 अप्रैल तक ऑक्सीजन सिलेंडर की मांग कम थी लिहाजा क्षमता से आधे का उत्पादन हो रहा था. मगर, मांग के अनुरूप उत्पादन का स्तर बढ़ाने में और ऑक्सीजन सिलिंडर को अस्पताल के बेड तक लाने में वक्त लगता है. इसी वक्त को ध्यान में रखते हुए बफर स्टॉक की जरूरत होती है. लेकिन, ऐसा लगता है कि संकट की स्थिति का अनुमान लगाकर बफर स्टॉक बनाए रखने की जरूरत नहीं समझी गई. बीते साल कोरोना काल में ऑक्सीजन के उत्पादन-आपूर्ति की निगरानी के लिए उच्चस्तरीय कमेटी बनी थी. उस कमेटी ने अगर अपना काम पहले से किया होता तो ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी की मौजूदा स्थिति पैदा नहीं होती.

देश में COVID-19 के एक्टिव केस 1 अप्रैल को 6 लाख थे और 16 अप्रैल को ये 17 लाख के करीब पहुंच गए. अगर कोरोना लहर के पहले दौर को याद करें तो करीब 6 फीसदी मरीजों को ऑक्सीजन चढ़ाने की जरूरत होती थी. इस हिसाब से 1 अप्रैल को ऑक्सीजन सिलेंडर की मांग करने वाले मरीजों की संख्या (कुल मरीजों की 6 फीसदी) 36 हजार रही होगी और 16 अप्रैल तक यह संख्या 1 लाख को पार कर चुकी होगी.

मांग में इसी बढ़ोतरी के हिसाब से तैयारी नहीं की गई. अब जबकि सरकार ने इस ओर ध्यान दिया है तब भी मांग और आपूर्ति में तालमेल बनाने में कम से कम 10 से 12 दिन लगेंगे.

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कोरोना मरीजों को चाहिए 3335 मीट्रिक टन ऑक्सीजन

एक लाख मरीजों के लिए ऑक्सीजन की जरूरत को पूरा करने के लिए जरूरत को भी दो श्रेणियों में बांट लेते हैं. एक श्रेणी आईसीयू के मरीजों की होगी तो दूसरी श्रेणी गैर आईसीयू के मरीजों की. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का एक पैमाना है जिसके अनुसार आईसीयू वाले मरीजों के लिए 40 लीटर और गैर आईसीयू वाले मरीजों के लिए 15 लीटर ऑक्सीजन होनी चाहिए. अगर दोनों ही किस्म के मरीजों की संख्या आधी-आधी मान कर जरूरत का आकलन करें तो एक लाख मरीजों में पहले 50 हजार के लिए ऑक्सीजन की जरूरत (50000X40)= 20 लाख लीटर और दूसरे 50 हजार मरीजों के लिए ऑक्सीजन की जरूरत (50000X15)= 7 लाख 50 हजार लीटर होगी. यानी 27 लाख 50 हजार लीटर ऑक्सीजन चाहिए होगी. दूसरे शब्दों में 3335 मीट्रिक टन की जरूरत हो जाती है. यही वह अतिरिक्त ऑक्सीजन है जिसकी तत्काल जरूरत है.

दो हफ्ते बाद और बढ़ेगी ऑक्सीजन की मांग

एक बार फिर ऑक्सीजन उत्पादन की क्षमता 7127 मीट्रिक टन, 12 अप्रैल को खपत 3842 मीट्रिक टन और 16 अप्रैल तक कोरोना मरीजों के एक्टिव मामलों को देखते हुए पैदा हुई 3335 मीट्रिक टन की मांग पर नजर डालें. यह बात साफ है कि ऑक्सीजन की फिलहाल कमी नहीं हुई है. ऐसा इसलिए कि हमारे पास 14 हजार मीट्रिक टन ऑक्सीजन का स्टॉक भी स्टील कंपनियों के पास है. मगर, एक हफ्ते के भीतर वास्तव में ऑक्सीजन की कमी उत्पादन और वितरण स्तर पर महसूस की जाने वाली है यह भी तय है.

यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने अगले 15 दिन के हालात का आकलन करते हुए ऑक्सीजन की उपलब्धता की समीक्षा की है. उन्होंने आने वाले समय में पूरे दो हफ्ते के दौरान ऑक्सीजन की बढ़ने वाली मांग को ध्यान में रखा है.

सरकार के सामने चुनौती यह है कि वो दो हफ्ते के भीतर ही 50 हजार मीट्रिक टन ऑक्सीजन का आयात भी करे और इसी दौरान नए अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट का निर्माण भी. लेकिन क्या ऐसा कर पाना मुमकिन होगा?
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जरूरतमंद मरीजों को करना होगा हफ्तेभर का इंतजार!

पहली प्राथमिकता अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी को दूर करना है. इसका एकमात्र उपाय मैन्युफैक्चर के पास से अस्पताल तक ऑक्सीजन की पहुंच जल्द से जल्द बनानी है. सरकार के पास देशभर में 1200 से 1500 टैंकर हैं जो ऑक्सीजन आपूर्ति के काम में लगे हैं. इन टैंकरों को जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करना भी बड़ी चुनौती होगी.

प्रधानमंत्री के स्तर पर ऑक्सीजन सिलेंडर के आयात और ऑक्सीजन प्लांट तैयार करने के फैसले से मरीजों की तात्कालिक समस्या का हल होता नहीं दिखता. इस फैसले का असर दो हफ्ते बाद ऑक्सीजन की जरूरत को पूरा करने के ख्याल से अहम है. अभी ऑक्सीजन सिलेंडरों की जो कमी दिख रही है उसे खत्म होने में सप्लाई चेन के ठीक होने का इंतजार करना पड़ेगा. इसमें कम से कम एक हफ्ते का वक्त जरूर लगेगा.

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