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बिहार: महिलाएं शराब के खिलाफ जीतीं मगर ड्रग्स ने मुश्किलें बढ़ाई

कैसे शराबबंदी ने महिलाओं के जीवन को बदल दिया - कुछ के जीवन को बेहतर बनाया लेकिन दूसरों के लिए नई समस्याएं पैदा कीं

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बिहार में 1 अप्रैल 2016 को नीतीश कुमार ने शराबबंदी लागू करवाया. लेकिन इस बैन के नतीजे नई मुसीबत बनकर उभरे. महिलाओं ने शराब के खिलाफ लड़ाई जीती मगर कच्ची शराब और ड्रग्स ने उनकी मुश्किलें बढ़ाईं.

इसकी वजह ये रही कि नशे के लिए बिहार 'उड़ता पंजाब' की राह पर चल पड़ा. नशे की तलाश में लोग नए विकल्प तलाशने लगे. भारी मात्रा में चरस, गांजा, हेरोइन की बरामदगी होने लगी.

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पहली अप्रैल 2016 को राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुजरात, मिजोरम, नागालैंड और लक्षद्वीप की तर्ज पर बिहार में शराबबंदी की घोषणा कर दी. पहली बार इसका उल्लंघन करने वाले को 5 साल की जेल की का प्रावधान था जिसे 2018 में संशोधित कर पहली बार उल्लंघन करने वालों के लिए जुर्माने का प्रावधान कर दिया गया. इस घोषणा के चार साल हो चुके हैं और राज्य में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं.  

इंडियास्पेंड की एक विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि कैसे शराबबंदी ने राज्य की महिलाओं के जीवन को बदल दिया - कुछ के जीवन को बेहतर बनाया लेकिन दूसरों के लिए नई समस्याएं पैदा कीं.

घरेलू हिंसा में कमी

बिहार में, भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत घरेलू हिंसा के मामले (पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता) शराबबंदी के बाद से 37% कम हो गए, जबकि अपराध दर - प्रति 100,000 महिलाओं पर- 45% गिर गई. देश भर में इस दरमियान, मामलों में 12% और अपराध दर में 3% की वृद्धि हुई.
 कैसे शराबबंदी ने महिलाओं के जीवन को बदल दिया - कुछ के जीवन को बेहतर बनाया लेकिन दूसरों के लिए नई समस्याएं पैदा कीं

बिहार की राज्य सरकार ने शराबबंदी पर एक रिपोर्ट कार्ड जारी कर इसकी सफलता का दावा किया है. इसमें शराबबंदी के बाद भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर औसत साप्ताहिक खर्च में 32%, 68% और 31% की वृद्धि बताई गई है.

 कैसे शराबबंदी ने महिलाओं के जीवन को बदल दिया - कुछ के जीवन को बेहतर बनाया लेकिन दूसरों के लिए नई समस्याएं पैदा कीं

रिपोर्ट कार्ड में आगे कहा गया है कि महिलाओं के साथ भावनात्मक और शारीरिक हिंसा के मामले कम हुए हैं. शराबबंदी से पहले हुए सर्वे में शामिल महिलाओं में से 79% ने भावनात्मक हिंसा की बात कही थी जो अब घटकर 11% रह गई है. शारीरिक और यौन हिंसा के मामले, 54% और 15% से घटकर क्रमशः 5% और 4% रह गए हैं.

हालांकि, शराबबंदी ने अलग-अलग तरीकों से परिवारों को प्रभावित किया है, पटना के कोशिश चैरिटेबल ट्रस्ट के रूपेश कुमार ने कहा-

जब आप बिहार जैसे राज्य के लिए एक नीति लागू करते हैं, तो आपके पास स्पष्ट परिणाम नहीं हो सकते हैं,” उन्होंने कहा. “ये थोड़ा जटिल है. कुछ पुरुषों ने ज्यादा महंगे होने की वजह से शराब छोड़ दी है. कुछ लोग सस्ती कच्ची शराब पीने लगे हैं, जो गांवों में बनाई जाती है क्योंकि इस पर रोक लगाना मुश्किल है
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कच्ची शराब से होने वाली मौतें

इंडियास्पेंड की पड़ताल बताती है कि राज्य के आंतरिक क्षेत्रों में अवैध शराब की तस्करी जारी है. कच्ची शराब सामान्य व्हिस्की की तुलना में कहीं अधिक नशीली है, जो अब काला बाजारी में ज्यादा कीमत पर बेची जाती है. NCRB के आंकड़ों के अनुसार, 2016 में हुई शराबबंदी के बाद, बिहार में 12 पुरुष और तीन महिलाओं की मौत कच्ची शराब के पीने से हो चुकी है.

ड्रग्स का बढ़ता इस्तेमाल

पटना के एक डी-एडिक्शन केंद्र, दिशा की सीईओ राखी शर्मा, बताती हैं कि अचानक हुई शराबबंदी के बाद उन्होंने पिछले तीन साल में ड्रग्स के मामलों में भारी उछाल देखा है.

शराबबंदी से एक साल पहले, 2015-16 में, दिशा के दो मुख्य केंद्रों पर, जहां पूरे बिहार से नशे की लत वाले लोग आते हैं, 9,745 नशे की लत वाले लोग पंजीकृत किए गए थे. ज्यादातर ऐसे परिवार से थे जो 20,000 रुपये महीना से भी कम कमाते हैं, और 18 से 35 साल की उम्र के हैं. पंजीकृत 3,126 यानी 32% लोग शराब की वजह से आए थे, जबकि 1,509 या 15.5% चरस और भांग के लिए आए थे.

शराबबंदी के एक साल बाद, 2016-17 में दोनों केंद्रों पर 6,634 लोगों का पंजीकरण हुआ. उस साल शराब के आदी लोगों की संख्या 2,673 पर आ गई, जो अभी भी केंद्र में पंजीकृत लोगों का 40% है. हालांकि,आदी लोगों की संख्या चरस और भांग वगैरह की लत वाले लोगों की संख्या 1,921 यानी 29% तक पहुंच गई, जो एक साल पहले के प्रतिशत का दोगुना है.
 कैसे शराबबंदी ने महिलाओं के जीवन को बदल दिया - कुछ के जीवन को बेहतर बनाया लेकिन दूसरों के लिए नई समस्याएं पैदा कीं

2017-18 और 2018-19 के बीच, दोनों केंद्रों में 9,628 पंजीकरण हुए थे - उनमें से 3,444 यानी 36% शराब और 4,427 यानी 46% गांजा, चरस और भांग की वगह से आए थे. ये आंकड़ा शराबबंदी से एक साल पहले पहले के 14.5% से रिकॉर्ड तीन गुना अधिक था.

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शराबबंदी की कीमत

साल 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी का वादा किया था. उनका ये वादा एक तरह से उनके पिछले फैसलों के उलट था: 2006 में, मुख्यमंत्री के तौर पर अपने पहले कार्यकाल के दौरान उन्होंने राज्य की शराब नीति को उदार बनाया था, इस दौरान उन्होंने हर पंचायत में एक शराब की दुकान खोलने की नीति अपनाई थी. वित्त वर्ष 2005-06 में राज्य को देश में निर्मित विदेशी शराब से 87.18 करोड़ रुपए का राजस्व मिला, जो 2014-15 में बढ़कर 1,777 करोड़ रुपये हो गया- 1938% की बढ़ोत्तरी.

2015 में, नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) ने लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन में भारी बहुमत से चुनाव जीत लिया और नीतीश कुमार लगातार तीसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने. शराबबंदी के उनके लोकप्रिय फैसले की वजह से राज्य की महिलाओं ने उनकी जीत में योगदान दिया.

लेकिन राज्य को इस बदलाव की एक कीमत चुकानी पड़ी. आर्थिक सर्वेक्षण-2016 के मुताबिक, वित्त वर्ष 2014-15 में, बिहार शराब बिक्री से मिलने वाली एक्साइज ड्यूटी से 3,100 करोड़ रुपये कमाए. वित्त वर्ष 2015-16 के बजट अनुमान 4,000 करोड़ के थे.

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