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Jersey रिव्यू: क्रिकेट से ज्यादा बाप-बेटे के रिश्ते की कहानी कहती है 'जर्सी'

Jersey रिव्यू: क्रिकेट से ज्यादा बाप-बेटे के रिश्ते की कहानी कहती है 'जर्सी'

'जर्सी' के साथ डायरेक्टर गौतम तिन्ननुरी ने हिंदी में अपना डेब्यू कर लिया है.

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क्रिकेट से ज्यादा बाप-बेटे के रिश्ते की कहानी कहती है 'जर्सी'

डायरेक्टर गौतम तिन्ननुरी की 2019 में आई तेलुगु फिल्म 'जर्सी' का हिंदी रीमेक आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है, और इसी के साथ तिन्ननुरी ने हिंदी में अपना डेब्यू कर लिया है. पहले ही एक साउथ रीमेक में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा चुके शाहिद कपूर ने इस फिल्म में बेहतरीन काम किया है.

'जर्सी' कहानी है एक क्रिकेटर अर्जुन तलवार की, जो नाकामयाब है, लेकिन उसमें टैलेंट कूट-कूट के भरा है. अर्जुन अपने बेटे की ख्वाहिश को पूरा करने के लिए भारतीय क्रिकेट टीम में कमबैक करना चाहता है.

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शाहिद ने फिल्म में अर्जुन तलवार का किरदार निभाया है

(फोटो: इंस्टाग्राम/शाहिद कपूर)

इसे एक स्पोर्ट्स फिल्म कहना सही नहीं होगा, क्योंकि फिल्म एक शख्स के क्रिकेट से प्रेम के बजाय, उसके और उसके बेटे के रिश्ते के बारे में ज्यादा है.

फिल्म में सम्मान पाने के लिए एक अंडरडॉग की लड़ाई, एक सख्त कोच, झकझोर देने वाले ट्रेनिंग सीन और सीट से जकड़ कर रख देने वाली आखिरी बॉल वाली जीत जैसा सबकुछ है, फिर भी, फिल्म की खूबसूरती वहां है जहां ये क्रिकेट से दूर जाती है और इंसानी रिश्तों को परखती है.

क्रिकेट से ज्यादा बाप-बेटे की कहानी है 'जर्सी'

(फोटो: इंस्टाग्राम/शाहिद कपूर)

शाहिद कपूर ने अर्जुन के किरदार को खूबसूरती के साथ प्ले किया है. हालात से हारे एक पिता और पति के हाव-भाव से लेकर बॉडी लैंग्युएज तक, शाहिद ने किरदार पर पूरी पकड़ रखी है. फिल्म में उनके और उनके बेटे किट्टू (रोनित कामरा) के बीच के सीन काफी भावुक हैं.

'जर्सी' में शाहिद कपूर और मृणाल ठाकुर

(फोटो: इंस्टाग्राम/शाहिद कपूर)

उनकी पत्नी के रोल में मृणाल ठाकुर ने भी बेहतरीन काम किया है. हमने उन्हें इस तरह के रोल में पहले भी देखा है, लेकिन यहां वो एकदम फिट बैठती हैं. विद्या (मृणाल ठाकुर का किरदार) सिर्फ अर्जुन की चीयरलीडर नहीं है, उसका अपना दिमाग है, अपनी इच्छाएं हैं. फिल्म में शाहिद के कोच के रूप में उनके रियल लाइफ पिता पंकज कपूर ने एक और दमदार परफॉर्मेंस दी है.

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फिल्म में जहां सभी सितारों की एक्टिंग बढ़िया है, तो वहीं ये अपनी एडिटिंग की वजह से उबाऊ लगने लगती है. फिल्म अगर ठीक से एडिट की जाती तो 20 मिनट और कम हो सकती थी.

'जर्सी' को 5 में से 3 क्विंट!

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