बाटला हाउस रिव्यू: खराब स्क्रिप्ट पर जॉन अब्राहम की उम्दा एक्टिंग
बाटला हाउस रिव्यू: खराब स्क्रिप्ट पर जॉन अब्राहम की उम्दा एक्टिंग
बाटला हाउस रिव्यू: खराब स्क्रिप्ट पर जॉन अब्राहम की उम्दा एक्टिंग(फोटो: फिल्म पोस्टर)

बाटला हाउस रिव्यू: खराब स्क्रिप्ट पर जॉन अब्राहम की उम्दा एक्टिंग

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जॉन अब्राहम की फिल्म ‘बाटला हाउस’ बॉक्स ऑफिस पर दस्तक दे चुकी है. इस फिल्म में जॉन अब्राहम की एक्टिंग कमाल की है. हालांकि, फिल्म शुरू होने से पहले बहुत बड़ा डिस्क्लेमर दिया गया है. डिटेल में बताया गया है कि ये फिल्म दिल्ली पुलिस से प्रेरित है. इस फिल्म में जो सीन दिखाए गए हैं वो पहले से ही पब्लिक डोमेन में हैं.

फिल्म के डिस्क्लेमर में ये साफ-साफ कह दिया गया है कि हम घटनाओं का सटीक चित्रण करने का इरादा नहीं रखते हैं. मतलब उन्होंने खुद घटनाओं की जिम्मेदारी लेने मना कर दिया है. तो एक बात बताइए कि इस फिल्म का नाम 'बाटला हाउस' रखने की क्या जरूरत थी. क्योंकि जब 'बाटला हाउस' का नाम लिया जाता है, तो 19 सितंबर 2008 को दिल्ली के बाटला हाउस में हुई मुठभेड़ की याद आ जाती है.

फिल्म में दो अलग-अलग चीजें हैं. कुछ लोग कहते हैं कि मुठभेड़ में मारे गए सारे लोग आतंकवादी थे, उन्हें मारना जरूरी था. वहीं कुछ कहते हैं कि बेचारे बच्चे थे, बेगुनाहों को मार दिया गया. फिल्म में एक ऐसा सीन भी दिखाया गया है जब ये दो अलग-अलग राय रखने वाले लोगों को एक साथ दिखाया जाता है. और वहां लिखा हुआ भी आ जाता है 'हम इन दोनों में से किसी का भी समर्थन नहीं करते हैं.'

यहां ये बात समझ से परे है कि जब दोनों अपॉजिट सीन दिखाई दे रहे हैं, तो ये बात लिखने की क्या जरूरत थी. शायद लिखा इसलिए क्योंकि दिखा नहीं पाए.

संजीव कुमार पर है पूरा फोकस

फिल्म में डीसीपी संजीव कुमार पर पूरा फोकस रखा गया है यानी कि जॉन अब्राहम. संजीव कुमार ऐसे पुलिस ऑफिसर हैं कि जब उनकी पत्नी घर छोड़ देने की धमकी देती है तो उन्हें कोई फर्क ही नहीं पड़ता. एक्ट्रेस मृणाल ठाकुर ने फिल्म में जॉन अब्राहम की पत्नी का रोल निभाया है.

फिल्म में जॉन अब्राहम की एक्टिंग वाकई काबिले तारीफ है. जब वो किसी को मुक्का मारते हैं, तो देखकर लगता है कि सामने वाले को चोट लगी होगी. देखने में सबकुछ रियल लगता है. अब्राहम को एकदम सीरियस मोड में दिखाया गया है. चेहरे पर कोई खुशी नहीं, हर वक्त गुस्सा. ये सब उन्हें इस रोल के लिए एकदम फिट बनाता है.

फिल्म के आखिरी में कोर्ट रूम सीन देखना काफी फनी है. जज कहते हैं ‘बैठ जाइए’. लेकिन किसी को किसी चीज से कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

146 मिनट लंबी इस फिल्म में निर्माता और भी कैरेक्टर्स पर फोकस कर सकते थे. जैसे- रवि किशन, जो जॉन अब्राहम की टीम में ही एक पुलिस ऑफिसर की भूमिका निभा रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ है.

हम इस फिल्म को 5 में 2.5 क्विंट देते हैं.

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