पूर्वोत्तर के हिंदू बहुल इलाकों में सिटिजन बिल से नाराजगी क्यों?
(फोटोः PTI)
  • 1. नागरिकता संशोधन विधेयक- 2016 है क्या?
  • 2. विवाद की वजह क्या है?
  • 3. केंद्र सरकार की दलील क्या है?
  • 4. सरकार को ये विचार आया कहां से?
  • 5. NRC और नागरिकता संशोधन विधेयक में विरोधाभास
  • 6. एनआरसी क्या है?
  • 7. असम समझौता क्या है?
पूर्वोत्तर के हिंदू बहुल इलाकों में सिटिजन बिल से नाराजगी क्यों?

मोदी सरकार का नागरिकता संशोधन बिल उसके गले ही हड्डी बन गया है. लोकसभा में बिल के मंजूर होते ही पूरा का पूरा पूर्वोत्तर उबल पड़ा है. असम में बीजेपी के सहयोगी एजीपी ने सरकार से हाथ खींच लिया. मेघायल और नगालैंड में बीजेपी के समर्थन से चल रही सरकारों के मुख्यमंत्री भी इस बिल को वापस लेने की मांग कर रहे हैं.

दूसरे देशों से आई हिंदू, जैन, सिख, पारसी और ईसाई आबादी को कवच देने के लिए लाए गए इस बिल का विरोध हिंदू बहुल इलाकों  में क्यों हो रहा है. इससे समझने के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 विस्तार से जानना होगा.

  • 1. नागरिकता संशोधन विधेयक- 2016 है क्या?

    नागरिकता संशोधन विधेयक-2016 का उद्देश्य उन धार्मिक अल्पसंख्यक लोगों को नागरिकता देने में सहूलियत देना है, जिन्हें भारत के पड़ोसी मुस्लिम बहुल देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक उत्पीड़न या उत्पीड़न के डर से भारत में शरण लेने को मजबूर होना पड़ा है.

    हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों के लिए 1955 के नागरिकता अधिनियम के प्रावधानों में यह एक बड़ा बदलाव है. पहले के कानून में अवैध प्रवासी उसे माना जाता था, जो बिना वैध दस्तावेजों के भारत में दाखिल होता था या दस्तावेजों में दी गई तारीख को आगे नहीं बढ़ाया जाता था.

    नागरिकता विधेयक में बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए हिंदू, जैन, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी समुदाय के लोगों को भारत में छह साल निवास करने के बाद किसी दस्तावेज बिना भी नागिरकता दिये जाने का प्रावधान है. फिलहाल, ऐसे लोगों को 12 साल भारत में निवास करने के बाद नागरिकता दिये जाने का प्रावधान है.

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