महाराष्ट्र में दलबदल विरोधी कानून दांव पर
महाराष्ट्र में दलबदल विरोधी कानून दांव पर(फोटो: क्विंट हिंदी) 
  • 1. दलबदल रोकने की दिशा में कब उठा पहला कदम ?
  • 2. कब बना दलबदल विरोधी कानून ?
  • 3. दलबदल मामले में स्पीकर की भूमिका पर सवाल
  • 4. 2003 के संशोधन में क्या हुआ?
  • 5. अब क्या हो रहा है?
  • 6.
क्या है दलबदल कानून? जानें, दलबदल रोकने में कितना है कामयाब?

महाराष्ट्र में अजित पवार के समर्थन के बाद देवेंद्र फडणवीस ने सीएम पद की शपथ ले ली. अजित पवार के पास एनसीपी के कितने विधायकों का समर्थन है यह तो पता नहीं लेकिन उनके चाचा और एनसीपी चीफ शरद पवार ने कहा कि बीजेपी का समर्थन करने वाले विधायकों को पता होना चाहिए कि उनके खिलाफ दलबदल विरोधी कानून में कार्रवाई हो सकती है. आइए जानते हैं क्या है दलबदल विरोधी कानून. किन हालातों में यह लाया गया और अब तक यह कानून दलबदल को रोकने में किस हद तक कामयाब रहा है.

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  • 1. दलबदल रोकने की दिशा में कब उठा पहला कदम ?

    दलबदल रोकने के लिए कानून बनाने की पहली पहल 1967 में में हुई थी जब केंद्र में तो कांग्रेस की सरकार बन गई थी लेकिन सात राज्यों में वह हार गई थी. इनमें से अधिकतर में कांग्रेस के विधायक दूसरे दलों में चले गए थे. उस दौरान यह कहा गया था कि विधायकों को मंत्री पद का लालच दिए जाने की वजह इसे बढ़ावा मिल रहा है. इसलिए इसके खिलाफ प्रावधान किए जाएं. दलबदल की समस्या की पड़ताल के लिए वाई बी चह्वाण पैनल बना था. इस पैनल की रिपोर्ट के बाद 1973 में उमाशंकर दीक्षित (इंदिरा सरकार) और फिर 1978 में शांति भूषण (मोरारजी देसाई सरकार) की अगुआई में इस समस्या को खत्म करने के कदम उठाए गए. लेकिन दोनों कोशिश नाकाम रही.

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