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कितने बरस पर लगता है कुंभ मेला, क्या है अहमियत? विस्तार से जानिए

आस्था और विश्वास के सबसे बड़े पर्व कुंभ के बारे में जानिए सबकुछ

Updated
कुंजी
5 min read
इस बार कुंभ का आयोजन संगम नगरी प्रयागराज में हो रहा है.
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दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक मेले ‘कुंभ’ में लाखों-करोड़ों लोग पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लगाने दूर-दूर से पहुंचते हैं. इस बार कुंभ का आयोजन संगम नगरी यानी प्रयागराज में शुरू हो गया है. 15 जनवरी से लेकर 4 मार्च, 2019 तक देश की तीन पावन नदियों- गंगा, यमुना और अब लुप्‍त हो चुकी सरस्वती के संगम पर लोग अपने पापों का प्रायश्चित करने और मोक्ष पाने की लालसा में पहुंच रहे हैं. प्रयागराज कुंभ का पहला शाही स्नान 15 जनवरी को हुआ था.

क्या है कुंभ? कैसे हुई इसकी शुरुआत?

कितने बरस पर लगता है कुंभ मेला, क्या है अहमियत? विस्तार से जानिए
(फोटो: kumbh.gov.in)

कुंभ मेले का हिंदू धर्म में काफी महत्व है. प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, कुंभ मेले की कहानी समुद्र मंथन से शुरू होती है, जब देवताओं और असुरों में अमृत को लेकर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी.

जब मंदार पर्वत और वासुकि नाग की सहायता से देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन शुरू हुआ, तो उसमें से कुल 14 रत्न निकले. इनमें से 13 रत्न तो देवताओं और असुरों में बांट लिए गए, लेकिन जब कलश से अमृत उत्पन्न हुआ, तो उसकी प्राप्ति के लिए दोनों पक्षों में युद्ध की स्थिति पैदा हो गई. असुर अमृत का सेवन कर हमेशा के लिए अमर होना चाहते थे, वहीं देवता इसकी एक बूंद भी राक्षसों के साथ बांटने को तैयार नहीं थे.

ऐसी स्‍थ‍िति में भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अमृत कलश को अपने पास ले लिया. उन्होंने ये कलश इंद्र के पुत्र जयंत को दिया. जयंत जब अमृत कलश को दानवों से बचाकर भाग रहे थे, तब कलश से अमृत की कुछ बूंदे धरती पर गिर गईं. ये बूंदें जिन चार स्थानों पर गिरीं- हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन, वहीं हर 12 साल बाद कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है.

हर 12 साल बाद इस मेले के आयोजन के पीछे भी एक पौराणिक कथा है. इंद्र पुत्र जयंत को अमृत कलश लेकर स्वर्ग पहुंचने में 12 दिन का समय लगा था. देवताओं का 1 दिन धरती पर 1 वर्ष के बराबर माना जाता रहा है. इसलिए हर 12 वर्ष बाद कुंभ पर्व मनाया जाता है.

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कितने तरह के कुंभ, कहां-कहां होता है आयोजन?

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(फोटो: Reuters)

कुंभ मेले का आयोजन हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में किया जाता है. इनमें प्रत्येक स्थान पर हर 12 वर्ष के अंतराल पर कुंभ मेला लगता है.

हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर, प्रयागराज में गंगा-यमुना और सरस्वती के संगम पर, उज्‍जैन में शिप्रा नदी और नासिक में गोदावरी नदी के तट पर लोग कुंभ में डुबकी लगाते हैं.

कुंभ दो प्रकार का होता है- अर्धकुंभ और पूर्ण कुंभ या महाकुंभ. अर्धकुंभ जहां हर 6 साल पर मनाया जाता है, वहीं पूर्ण कुंभ का आयोजन प्रति 12 वर्ष पर किया जाता है. अर्धकुंभ केवल हरिद्वार और प्रयागराज में लगता है. उज्जैन और नासिक में लगने वाले पूर्ण कुंभ को 'सिंहस्थ' कहा जाता है.

हालांकि उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2019 प्रयागराज कुंभ का नाम अर्द्धकुंभ की बजाय 'कुंभ' रख दिया है. सीएम योगी का कहना है कि हिंदू धर्म में कुछ भी अधूरा नहीं होता. उन्होंने अर्द्धकुंभ का नामकरण 'कुंभ' और पूर्ण कुंभ का 'महाकुंभ' कर दिया है.

कुंभ मेला किस समय, किस स्थान पर लगेगा, इसका ताल्लुक राशियों से है. अमृत मंथन के बाद सूर्य, चंद्रमा, शनि और बृहस्पति ने कलश की रक्षा की थी. उस समय ये कुम्भ, मेष और सिंह राशि में थे. ऐसे में इन ग्रहों और राशियों के विशेष संयोग पर कुंभ मेला किस स्थान पर लगेगा, ये तय किया जाता है.

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कुंभ में अखाड़ों का क्‍या है महत्व

कितने बरस पर लगता है कुंभ मेला, क्या है अहमियत? विस्तार से जानिए
(फोटो: IANS) 

शास्त्रों की विद्या रखने वाले साधुओं के अखाड़े का कुंभ मेले में काफी महत्व है. अखाड़ों की स्थापना आदि शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को बचाने के लिए की थी. अखाड़ों के सदस्य शस्त्र और शास्त्र, दोनों में निपुण कहे जाते हैं. नागा साधु भी इन्हीं अखाड़ों का हिस्सा होते हैं.

अखाड़ों को उनके इष्ट-देव के आधार पर विभाजित किया जाता है, जिसमें तीन श्रेणिया हैं- शैव अखाड़े, वैष्णव अखाड़े और उदासीन अखाड़े. इनमें कुल 13 अखाड़ों को मान्यता मिली है.

सबसे बड़ा जूना अखाड़ा, फिर निरंजनी अखाज़ा, महानिर्वाण अखाड़ा, अटल अखाड़ा, आवाहन अखाड़ा, आनंद अखाड़ा, पंचाग्नि अखाड़ा, नागपंथी गोरखनाथ अखाड़ा, वैष्णव अखाड़ा, उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा, उदासीन नया अखाड़ा, निर्मल पंचायती अखाड़ा और निर्मोही अखाड़ा.

शुरुआत में प्रमुख अखाड़ों की संख्या केवल 4 थी, लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते बंटवारा होकर ये संख्या 13 पहुंच गई है. इन अखाड़ों के अपने प्रमुख और अपने नियम-कानून होते हैं.

कुंभ मेले में अखाड़ों की शान-बान देखने ही लायक होती है. ये अखाड़े केवल शाही स्नान के दिन ही कुंभ में भाग लेते हैं और जुलूस निकालकर नदी तट पर पहुंचते हैं. अखाड़ों के महामंडलेश्‍वर और श्री महंत रथों पर साधुओं और नागा बाबाओं के पूरे जुलूस के पीछे-पीछे शाही स्नान के लिए निकलते हैं.

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क्या होता है शाही स्नान?

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(फोटो: IANS) 

कुंभ मेले में शाही स्नान का आयोजन अखाड़ों के लिए ही किया जाता है. मेले में स्नान करने की पहली प्राथमिकता आम श्रद्धालुओं की बजाय अखाड़ों के साधुओं को दी जाती है. शाही स्नान के दिन अखाड़ों के स्नान का एक तय वक्त होता है, जिसके बाद आम जनता को स्नान की अनुमति दी जाती है.

कहा जाता है कि जब सनातम धर्म की रक्षा के लिए अखाड़ों की स्थापना हुई, तो उसके बाद एक वक्त ऐसा आया जब साधुओं का व्यवहार अक्रामक हो गया. वो धर्म को राष्ट्र से ऊपर मानने लगे. तब शासकों और अखाड़ों में बैठक हुई और दोनों के बीच कर्म का बंटवारा किया गया.

अखाड़ों को खास महसूस कराने के लिए कुंभ मेले में इस शाही स्नान को शुरू किया गया. हालांकि शाही स्नान का इतिहास कोई शांतिपूर्ण नहीं रहा है. अक्सर अखाड़ों के बीच शाही स्नान को लेकर मतभेद रहे हैं.

प्रचलित कथाओं के अनुसार, रामानंद वैष्णव अखाड़े और महानिर्वाणी अखाड़े के बीच शाही स्नान को लेकर खूनी संघर्ष हुआ था. इसके बाद भी अखाड़ों के बीच तनातनी के कई किस्से मौजूद हैं.

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कुंभ 2019 की अहम तारीखें

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(फोटो: kumbh.gov.in)

हर कुंभ मेले के दौरान पड़ने वाले त्योहार या किसी खास दिन पर स्‍नान का अपना महत्व है. प्रयागराज कुंभ मेले में भी स्‍नान की कुछ अहम तारीखें हैं, जो इस प्रकार हैं:

  • शाही स्नान- 15 जनवरी, 4 फरवरी, 10 फरवरी
  • मकर संक्रांति स्नान 14/15 जनवरी
  • पौष पूर्णिमा स्नान- 21 जनवरी
  • पट्लिका एकादशी स्नान- 31 जनवरी
  • मौनी अमावस्या- 4 फरवरी
  • बसंत पंचमी- 10 फरवरी
  • माघी पूर्णिमा- 19 फरवरी
  • जया एकादशी- 16 फरवरी

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