इस बार कुंभ का आयोजन संगम नगरी प्रयागराज में हो रहा है.
इस बार कुंभ का आयोजन संगम नगरी प्रयागराज में हो रहा है.(फोटो: kumbh.gov.in)
  • 1. क्या है कुंभ? कैसे हुई इसकी शुरुआत?
  • 2. कितने तरह के कुंभ, कहां-कहां होता है आयोजन?
  • 3. कुंभ में अखाड़ों का क्‍या है महत्व
  • 4. क्या होता है शाही स्नान?
  • 5. कुंभ 2019 की अहम तारीखें
कितने बरस पर लगता है कुंभ मेला, क्या है अहमियत? विस्तार से जानिए

दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक मेले ‘कुंभ’ में लाखों-करोड़ों लोग पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लगाने दूर-दूर से पहुंचते हैं. इस बार कुंभ का आयोजन संगम नगरी यानी प्रयागराज में शुरू हो गया है. 15 जनवरी से लेकर 4 मार्च, 2019 तक देश की तीन पावन नदियों- गंगा, यमुना और अब लुप्‍त हो चुकी सरस्वती के संगम पर लोग अपने पापों का प्रायश्चित करने और मोक्ष पाने की लालसा में पहुंच रहे हैं. प्रयागराज कुंभ का पहला शाही स्नान 15 जनवरी को हुआ था.

  • 1. क्या है कुंभ? कैसे हुई इसकी शुरुआत?

    इस बार कुंभ का आयोजन संगम नगरी प्रयागराज में हो रहा है.
    (फोटो: kumbh.gov.in)

    कुंभ मेले का हिंदू धर्म में काफी महत्व है. प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, कुंभ मेले की कहानी समुद्र मंथन से शुरू होती है, जब देवताओं और असुरों में अमृत को लेकर युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई थी.

    जब मंदार पर्वत और वासुकि नाग की सहायता से देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन शुरू हुआ, तो उसमें से कुल 14 रत्न निकले. इनमें से 13 रत्न तो देवताओं और असुरों में बांट लिए गए, लेकिन जब कलश से अमृत उत्पन्न हुआ, तो उसकी प्राप्ति के लिए दोनों पक्षों में युद्ध की स्थिति पैदा हो गई. असुर अमृत का सेवन कर हमेशा के लिए अमर होना चाहते थे, वहीं देवता इसकी एक बूंद भी राक्षसों के साथ बांटने को तैयार नहीं थे.

    ऐसी स्‍थ‍िति में भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण कर अमृत कलश को अपने पास ले लिया. उन्होंने ये कलश इंद्र के पुत्र जयंत को दिया. जयंत जब अमृत कलश को दानवों से बचाकर भाग रहे थे, तब कलश से अमृत की कुछ बूंदे धरती पर गिर गईं. ये बूंदें जिन चार स्थानों पर गिरीं- हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन, वहीं हर 12 साल बाद कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है.

    हर 12 साल बाद इस मेले के आयोजन के पीछे भी एक पौराणिक कथा है. इंद्र पुत्र जयंत को अमृत कलश लेकर स्वर्ग पहुंचने में 12 दिन का समय लगा था. देवताओं का 1 दिन धरती पर 1 वर्ष के बराबर माना जाता रहा है. इसलिए हर 12 वर्ष बाद कुंभ पर्व मनाया जाता है.

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