हादसों का शहर: ‘मेरा भाई बच जाता अगर उसे वक्त पर अस्पताल पहुंचाते’

हादसों का शहर: ‘मेरा भाई बच जाता अगर उसे वक्त पर अस्पताल पहुंचाते’

My रिपोर्ट

वीडियो एडिटर: राहुल सांपुई

मैंने देखा कि पुलिसवालों ने मेरे भाई की बॉडी को उठाकर साइड में सर्विस सेंटर के पास रख दिया. उन्होंने कहा कि इसमें अभी जान बाकी है. अगर तुम्हारे पास कार है तो इसे अस्पताल ले जाओ. फिर हमने भाई को चेक किया और उसे गाड़ी में डाल कर कल्याण के पास आयुष अस्पताल में ले गए. फिर उन्होंने चेक-अप किया और बताया कि अब वो जिंदा नहीं है.
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13 जुलाई 2018 को याद करना बहुत भयावह है. मेरा भाई कल्पेश जाधव की मुंबई के सड़कों के गड्ढों के कारण जान चली गई. वो सिर्फ 26 साल का था, रात को करीब 2:30 बजे घर लौट रहा था.

उसकी बाइक एक गड्ढे में गई और उसका बैलेंस बिगड़ गया, जिसकी वजह से वो गिर गया, उसके बाद पीछे से आते ट्रक ने उसे कुचल दिया. पुलिस ने हमें एक्सीडेंट के बाद कुछ उम्मीद दी थी कि हम उसे अस्पताल ले जाए तो शायद वो बच जाए, हम सीधे कल्पेश को लेकर अस्पताल पहुंचे.

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बदकिस्मती से उसकी सेहत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. हम बता नहीं सकते थे कि वो जिंदा है या नहीं. लेकिन हमें उम्मीद थी क्योंकि पुलिस ने हमें बताया था कि वो जिंदा है. ECG ने थोड़ी ही देर में एक बुरी खबर दी.

कल्पेश की शादी एक्सीडेंट के 8 महीने पहले ही हुई थी, उसने लव मैरिज की थी, वो करीब 8-9 साल से रिलेशनशिप में था, वो बहुत प्यारा लड़का था, कई लोगों की मदद करता था, जब से वो गया है, हमारी जिंदगी में काफी अंधेरा हो गया है. हमारे पास उसकी बस तस्वीरें ही है.

हम कहीं नहीं गए. हम बस घर पर ही रहते हैं. मुझे डॉक्टर के पास जाना होता है या घर का सामान लाना होता है, तब ही बाहर जाते हैं.
कुंडा चंद्रमणि जाधव, कल्पेश की मां

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अब एक आंकड़ा बनकर रह गए हैं कल्पेश

2018 में सिर्फ कल्याण में गड्ढों की वजह से हुई दुर्घटना में 5 लोगों की जान गई है. मेरा भाई उसमें से एक है. सरकार को कुछ पता होना चाहिए. उन्हें भी उस रास्ते से गुजरना पड़ता है. जिस रास्ते का टोल वसूल नहीं होता है उस रास्ते पर वो ध्यान नहीं देते हैं. जिन रास्तों का टोल वसूल होता है और जब तक होता है उतने साल तक रोड सही रहता है. जैसे ही वसूली का कॉन्ट्रैक्ट खत्म होता है वैसे ही वो रोड खराब हो जाता है.

सड़कों को टिकाऊ होना चाहिए. एक ही बारिश में पूरी सड़क गड्ढों से भर जाती है. अब किसे क्या बोले? सरकार को बोले या कॉन्ट्रैक्टर को बोले, किसे बोले ये सब?

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