क्या चाचा-भतीजे के चक्रव्यूह में फंसी बीजेपी?

क्या चाचा-भतीजे के चक्रव्यूह में फंसी बीजेपी?

भारत

जिस पार्टी के पास कहते हैं कि चाणक्य हैं, जिस पार्टी के पास सबसे ज्यादा संसाधन हैं, और जो पार्टी कहती है कि मोदी है तो सबकुछ मुमकिन है, उसके साथ ये नामुमकिन कैसे हुआ? महाराष्ट्र में फ्लोर टेस्ट से पहले बीजेपी को सरेंडर क्यों करना पड़ा? बीजेपी ने खुद हिट विकेट कर लिया है या ये पवार का बाउंसर है? सबसे बड़ा सवाल कहीं चाचा-भतीजे के चक्रव्यूह में तो नहीं फंस गई बीजेपी?

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चाचा-भतीजा के समीकरण में फंसी बीजेपी

शक की सूई चचा-भतीजे की जुगलबंदी पर इसलिए जाती है क्योंकि ये बात हैरान करने वाली थी कि शरद पवार ने अजित पवार पर जालसाजी तक के आरोप लगाए लेकिन उन्हें पार्टी से नहीं निकाला.

आखिर क्यों?

दूसरी बात उधर अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया और इधर कहा जा रहा है कि शरद पवार उन्हें पार्टी और परिवार में वापस ले लेंगे. कोई ताज्जुब नहीं कि वो शिवसेना-कांग्रेस-एनसीपी की सरकार में मंत्री भी बन जाएं.

ये भी चौंकाने वाली बात है कि अजित पवार 54 के 54 विधायकों के उनके साथ होने का दावा कर रहे थे तो फिर कैसे शरद पवार ने एक झटके में लगभग सबको अपने साथ मिला लिया. आखिर अजित पवार भी महाराष्ट्र में कद्दावर नेता हैं, फिर कैसे चंद विधायक भी उनके वफादार नहीं निकले.

कॉन्फिडेंस के पीछे सीक्रेट क्या था

अब जरा शरद पवार का भरोसा देखिए. होटल ग्रैंड हयात में जब उन्होंने शिवसेना-कांग्रेस के साथ 162 विधायकों की परेड कराई तो पूरे कॉन्फिडेंस से कहा कि एक विधायक बीजेपी के साथ नहीं जाएगा-ये मेरी जिम्मेदारी है. उन्होंने ये भी कहा कि ये कर्नाटक और मिजोरम नहीं है कि बीजेपी की चल जाए. इस आत्मविश्वास के पीछे क्या सीक्रेट था?

एक सवाल बीजेपी पर भी उठता है. शरद पवार की पकड़ NCP में अल्टीमेट मानी जाती है, तो बीजेपी ने कैसे भरोसा कर लिया कि अजित पवार के साथ सारे के सारे विधायक आ जाएंगे. ये बीजेपी की गलती थी या सीनियर और जूनियर पवार ने ऐसा गेम खेला कि बीजेपी उनके जाल में फंस गई? क्या पीएम से शरद पवार की मुलाकात भी जेस्चर दिखाने की रणनीति थी?

बीजेपी ने कैसे किया अजित पवार पर भरोसा?

अजित पवार अपने अस्थिर बर्ताव के लिए भी जाने जाते हैं, फिर बीजेपी ने कैसे उनपर भरोसा किया? याद कीजिए सिंचाई घोटाले में आरोप लगने के बाद अजित पवार ने 2012 में उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था फिर कुछ दिनों बाद ही फिर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी.

28 सितंबर 2019 को महाराष्ट्र स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले में ED ने FIR दर्ज किया तो अजीत पवार ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया. और बाद में NCP की तरफ से बारामती से चुनाव लड़ने उतर पड़े.

बीजेपी ने सेल्फ गोल कर लिया?

इस पूरे सियासी ड्रामे में बीजेपी ने लगता है सेल्फ गोल कर लिया तो शरद पवार ने एक तीर से कई निशाने साधे. NCP की विरासत किसे मिले, इसको लेकर अजित पवार और शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले के बीच हमेशा से प्रतियोगिता मानी गई. अजित पवार अपने खेमे में अब वापस आ भी जाएं तो भी उनकी स्थिति कमजोर जरूर हुई है. सुप्रिया सुले के रास्ते से कांटा निकल चुका है.

खुद शरद पवार का कद सिर्फ राज्य में नहीं बढ़ा बल्कि तीन अलग विचारधारा वाली पार्टियों को साथ लाकर वो नेशनल लेवल पर भी चेहरा चमकाने में कामयाब होंगे. नेशनल नेवल पर वो विपक्ष का धुरी बन जाएं तो चौंकाने वाली बात नहीं होगी.

महाराष्ट्र के 'चाणक्य' अजित पवार

कुल मिलाकर आज बीजेपी कह रही होगी क्या से क्या हो गया अजित पवार तेरे प्यार में. बीजेपी की सरकार ही नहीं गिरी, उसकी साख पर भी बट्टा लगा है और इसकी गूंज महाराष्ट्र की सरहदों से पार भी जाएगी. फडणवीस के लिए तो ये सेटबैक है ही, बीजेपी के नेशनल लीडर्स के लिए मात है. इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली में बैठे चाणक्य, महाराष्ट्र के चाणक्य यानी शरद पवार के हाथों शिकस्त खा गए. जो लोग शरद पवार के बारे में कहते थे एक था टाइगर, और जो चुनाव नतीजों के आने के बाद कह रहे थे कि टाइगर जिंदा है, वो अब कह रहे होंगे टाइगर दहाड़ रहा है

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