सरकार! बजाज से क्यों हो रहे ‘नाराज’, आलोचना देश के खिलाफ नहीं

सरकार! बजाज से क्यों हो रहे ‘नाराज’, आलोचना देश के खिलाफ नहीं

भारत

वीडियो एडिटर: अभिषेक शर्मा

निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय. कबीर दास ने कहा था कि आलोचकों को करीब रखिए ताकि वो आपकी कमियां बताएं और आप ठीक कर सकें लेकिन अपनी सरकार को शायद ये फॉर्मूला कुछ खास पसंद नहीं आता है. तभी तो जैसे ही निंदा वाली यानी आलोचना वाली कोई बात कहीं से आती है...सरकार के लोग आलोचना करने वाले की ही आलोचना करने लग जाते हैं, बात हो रही है- 'हमारा बजाज वाले दिग्गज कारोबारी राहुल बजाज की.

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राहुल बजाज को लगता है, देश में लोगों के बीच डर का माहौल है...

दिग्गज कारोबारी राहुल बजाज को लगता है कि देश में लोगों के बीच डर का माहौल है. ऐसे में लोग सरकार की आलोचना करने से भी डरते हैं. बजाज का कहना है कि लोगों में ये भरोसा नहीं है कि उनकी आलोचना को सरकार में किस तरह लिया जाएगा. ये बयान उन्होंने गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में दिया है. बजाज के 'डर वाले बयान' के अभी कुछ ही घंटे हुए थे कि केंद्रीय मंत्रियों की फौज उतर आई जो शायद इस बयान को सच ही साबित करती है. देश की अर्थव्यवस्था की जिम्मेदारी जिन कंधों पर है, मने अपनी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को भी ये बयान चुभ गया. उन्होंने कहा कि ऐसी निजी धारणा को बढ़ावा मिलने से राष्ट्रीय हितों को नुकसान हो सकता है....वित्त मंत्री ने अपने ट्वीट में लिखा-

राहुल बजाज ने जो मुद्दे उठाए, उन पर किस तरह ध्यान दिया गया, गृह मंत्री अमित शाह ने इसका जवाब दिया. सवालों/आलोचनाओं को सुना जाता है और उन पर जवाब/ध्यान दिया जाता है. अपनी उस निजी धारणा, जिसे बढ़ावा मिलने से राष्ट्रीय हितों को नुकसान हो सकता है, उसे फैलाने की बजाए उस पर जवाब मांगना बेहतर तरीका होता है.

बजाज ने ऐसा बोला तो क्यों बोला?

ये तो हो गई बयानबाजी वाली बात. अब आप और हमें सोचना चाहिए कि आखिर जो राहुल बजाज ने कहा है कि वो सही है तो क्यों सही है, गलत है तो क्यों गलत है. एक उदाहरण से समझाता हूं.

पिछले कई महीने से पूरा देश ये कह रहा है कि भईया जब आर्थिक मंदी है तो सरकार बताती क्यों नहींय़ जब तमाम जानकार ये कह रहे थे कि उद्योग जगत कम कर्ज ले रहा है, बेरोजगारी बढ़ रही है, ऑटो सेक्टर मंदी के बोझ से दबा पड़ा है..लेकिन सरकार कहती रही कि मंदी नहीं है. उल्टा सरकार में बैठे लोग मंदी नहीं के पक्ष में अजीबोगरीब तर्क देने लगे.

वित्त मंत्री ने कहा कि ऑटो सेक्टर में जो मंदी आई है उसकी जिम्मेदार ओला-उबर जैसी कंपनियां हैं. उन्होंने कहा था कि मिलेनियल आजकल गाड़ी खरीदने की जगह ओला-उबर को तवज्जो दे रहे हैं.

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद कहने लगे-अरे कहां है मंदी, जब ‘तीन फिल्मों ने एक दिन में 120 करोड़ रुपये की कमाई की है तो मंदी कैसे हो सकती है है.

एक कदम आगे बढ़कर रेल राज्यमंत्री सुरेश अंगड़ी ने कहा कि लोग शादी कर रहे हैं, ट्रेन में बुकिंग फुल है, तो कहां है मंदी.

लेकिन अब जीडीपी के ताजा आंकड़ें सबके सामने हैं- जीडीपी का अब जो डेटा आया है उसके दूसरी तिमाही में जीडीपी गिरकर 4.5 फीसदी पर आ गई है. अब ये कितना कम है, इसे समझने के लिए बस इतना समझ लीजिए कि पिछले साल दूसरी तिमाही में ही जीडीपी ग्रोथ रेट 7% थी. कोर सेक्टर यानी जहां रोजगार के सबसे ज्यादा मौके पैदा होते हैं जैसे-स्टील, कच्चा तेल, सीमेंट, बिजली, कोयला, नेचुरल गैस के उत्पादन में भारी गिरावट है. अब तो ये सरकारी आंकड़ें भी दिखा रहे हैं कि मंदी तो है.

अगर सरकार आलोचकों की सुन लेती और ईमानदारी से एक्शन लेती तो शायद ये नौबत नहीं आती.

अब आप अगर सोच रहे हैं कि मंदी से आपका क्या लेना देना, जीडीपी घटती है तो आपको क्या घाटा है तो मैं आपको बता दूं कि 1% ग्रोथ बढ़ने या गिरने का मतलब होता है सीधे 30 लाख नई नौकरियों का बनना या खत्म होना.

गुड़गांव के बगल में मानेसर है. वहां ऑटो सेक्टर की फैक्ट्रियां हैं...चूंकि डिमांड है नहीं तो वाहन बिक नहीं रहे. हजारों की तादाद में मजदूर और कामगार निकाले गए हैं.

झारखंड चुनाव के सिलसिले में क्विंट की टीम जमशेदपुर के पास आदित्यपुर इंडस्ट्रियल एरिया में पहुंचा. यहां हजारों की तादाद में एंसीलियरी कंपनियां है. ये कंपनियां टेल्को, टाटा स्टील जैसी बड़ी कंपनियों के क ल पुर्जे बनाती हैं. हमें वहां कामगारों ने बताया है कि मंदी के कारण 80 हजार लोगों की नौकरी चली गई.

एक शख्स जिसकी नौकरी चली गई, उसने हमें जो बात बताई वो पूरी पिक्चर साफ करती है. उसने कहा- ‘मेरे पास नौकरी नहीं, पर शायद चुप रहना ही देशभक्ति’..राहुल बजाज के बयान की आलोचना को आप इस मजदूर के बयान से जोड़कर देखिए, सब साफ हो जाएगा.

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