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भ्रष्टाचार की पिच से सॉफ्ट हिंदुत्व के प्रयोग तक, 10 साल में कितने बदले केजरीवाल

दिल्ली में भ्रष्टाचार और शिक्षा-स्वास्थ्य मुद्दा, पंजाब में दिल्ली का मॉडल, गुजरात में सॉफ्ट हिंदुत्व का सहारा

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“आज आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय पार्टी बन गई है. गुजरात के लोगों ने आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी बना दिया है. आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और देशवासियों के बहुत-बहुत मुबारकबाद.”

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के संयोजक अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) का ये बयान गुजरात चुनाव (Gujarat Election) में हार और हिमाचल चुनाव (Himachal Election) में करारी हार के बाद आया था. वो खुश हैं, उनकी पार्टी खुश है. इतनी खुश कि AAP के हेडक्वार्टर पर राष्ट्रीय पार्टी से जुड़ा पोस्टर भी लगा दिया गया है. सवाल है कि दो चुनाव में मिली बुरी हार के बाद भी अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी इस कदर खुश क्यों है. क्या उसके पीछे सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी हो जाना वजह है. ये कहना अरविंद केजरीवाल और उनकी राजनीति का बड़े ही ऊपर से विश्लेषण होगा. तो केजरीवाल की खुशी का कारण क्या है और अब अरविंद केजरीवाल भारत की राजनीति में कहां पहुंच गए हैं. वो नीचे आपको समझाएंगे लेकिन पहले जानिए कि इन तीन चुनावों से अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने क्या हासिल किया.

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तीन चुनावों में केजरीवाल का रिपोर्ट कार्ड

गुजरात विधानसभा चुनाव 2022

गुजरात में आम आदमी पार्टी ने 5 सीटें जीती हैं और उसे 12.92 फीसदी वोट मिले हैं. हालांकि उनके सीएम कैंडिडेट समेत कई बड़े नेता चुनाव हार गए हैं और राज्य की 182 सीटों में से 128 पर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई है.

हिमाचल विधानसभा चुनाव 2022

हाल ही में पंजाब में चुनाव जीतने वाली आम आदमी पार्टी उससे लगते हिमाचल बुरी तरह हार गई है. यहां उन्हें एक भी सीट नहीं मिली है और मात्र 1.10 प्रतिशत वोट हासिल हुए हैं.

MCD चुनाव 2022

15 साल से एमसीडी में अंगद के पांव की तरह बैठी बीजेपी को आम आदमी पार्टी ने उखाड़ फेंका है और 134 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया है.

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एमसीडी चुनाव जीतने के बाद अरविंद केजरीवाल, साथ में मनीष सिसोदिया और भगवंत मान

फोटो- AAP Twitter

भारतीय राजनीति में अरविंद केजरीवाल का कद

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने दावा किया कि उनकी पार्टी अरविंद केजरवाल के नेतृत्व में 10 साल में सबसे तेजी से बढ़ने वाला सियासी दल बन गई है. इस बात में कितना दम है उसका विश्लेषण हो अतीत में झांककर हो सकता है लेकिन अभी जो नजर आ रहा है वो ये है कि भारत की राजनीति में मौजूदा चंद नेता जिनके नाम पर उनकी पार्टी चुनाव में जाती है और जीतती भी है, उनमें अरविंद केजरीवाल का नाम भी शामिल है.

इसके अरविंद केजरीवाल ने 10 साल में अपनी राजनीति को कई मोड़ दिए हैं. याद कीजिए जब वो शुरुआत में राजनीति करने उतरे तो उन्होंने भ्रष्टाचार को अपना हथियार बनाया. और दिल्ली में सरकार बना ली. पांच साल बाद जब फिर से दिल्ली में चुनाव आये तो उन्होंने अपना हथियार बदल दिया और इस बार, फ्री बिजली-पानी और अस्पताल-स्कूल को केजरीवाल ने टूल बनाया. नतीजा ये हुआ कि बंपर जीत हुई और केजरीवाल फिर से दिल्ली के सीएम बन गए.

यहां से अरविंद केजरीवाल को लगा कि अब राष्ट्रीय राजनीति में जाने की जरूरत है तो वो गोवा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव लड़ने चले गए. यहां उनका राजनीतिक हथियार बना दिल्ली मॉडल. जिसने उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश में तो कोई असर नहीं किया लेकिन गोवा में आम आदमी पार्टी को दो सीटें दिलवा दी और 6 प्रतिशत से ज्यादा वोट.

साथ ही अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी ने पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. यहीं से उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को पंख लगे. लेकिन अभी भी एक चीज थी जो अरविंद केजरीवाल के प्रवक्ताओं को सुननी पड़ती थी कि उन्होंने हर जगह कांग्रेस को ही सत्ता से बेदखल किया है. जहां बीजेपी सत्ता में होती है वहां केजरीवाल जीत नहीं पाते हैं. एमसीडी चुनाव जीतकर आम आदमी पार्टी ने बीजेपी प्रवक्ताओं से ये तंज भी छीन लिया.

यहां तक आते-आते अरविंद केजरीवाल तीन राज्यों में 6 प्रतिशत से ज्यादा वोट पा चुके थे और राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए उन्हें किसी एक और राज्य के विधानसभा चुनाव में 6 प्रतिशत से ज्यादा वोटों की जरूरत थी. अरविंद केजरीवाल हिमाचल चुनाव और गुजरात विधानसभा चुनाव में भी कूद गए. हिमाचल में जब उन्हें जमीन ढीली पड़ती दिखी तो सारा फोकस गुजरात पर लगा दिया.

यहां चुनाव लड़ने के लिए अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीति में फिर बदलाव किया और नोटों पर लक्ष्मी-गणेश की फोटो लगाने की बात कह दी. बिलकिस बानो जैसे मुद्दों पर उन्होंने चुप्पी साध ली. फिर ऐसा लगा कि सीएए आंदोलन से दूरी और दिल्ली दंगों में निष्क्रियता के जो आरोप उन पर लगे वो किसी रणनीति का हिस्सा हो सकते हैं. इसका उन्हें एमसीडी चुनाव में नुकसान भी उठाना पड़ा और सीएए विरोध प्रदर्शन और दिल्ली दंगो से प्रभावित इलाकों में उनकी पार्टी हार गई लेकिन एमसीडी चुनाव वो फिर भी जीत गए और गुजरात में 12 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करके राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा ठोक दिया.

लेकिन ये संभव कैसे हुआ, इसमें अरविंद केजरीवाल का बड़ा हाथ है. वो अपने समर्थकों में पॉपुलर हैं, उनके चाहने वाले उन्हें ईमानदार कहते हैं और पार्टी के नेता कट्टर ईमानदार. यही छवि उन्हें कई नेताओं से अलग बनाती है. इसके अलावा उनके रहने का तरीका, वो नेताओं की तरह कुर्ता पजामा नहीं पहनते, बल्कि पहले की ही तरह आम सी दिखने वाली पैंट शर्ट और मफलर अभी भी उनकी पहचान है. कुल मिलाकर आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल ही सर्वे सर्वा नजर आते हैं. इसके अपने फायदे हैं लेकिन नुकसान भी हैं.

ये राष्ट्रीय राजनीति के लिए शायद उतना मुफीद ना हो, कई जगह इसका नुकसान भी उन्हें उठाना पड़ता है. जैसे- सिर्फ नरेंद्र मोदी पर आश्रित रहने पर कई जगह बीजेपी को नुकसान होता है. इसलिए अब अरविंद केजरीवाल को हर राज्य में लीडरशिप और काडर बनाने पर फोकस करना होगा.

कुल मिलाकर फिलहाल अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के पास खुश होने के तीन कारण हैं, पहला वो राष्ट्रीय पार्टी बनने वाले हैं, दूसरा एमसीडी में बीजेपी को हरा दिया है और तीसरा अरविंद केजरीवाल का कद बढ़ गया है जैसा आम आदमी पार्टी दावा कर रही है.

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दो राज्य हारकर भी क्यों खुश है AAP?

1. राष्ट्रीय पार्टीः अरविंद केजरीवाल ने दावा किया है कि उनकी पार्टी अब राष्ट्रीय पार्टी हो गई है हालांकि चुनाव आयोग से दर्जा मिलना अभी बाकी है. लेकिन राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए जो क्राइटेरिया चुनाव आयोग ने तय किया है उसे आम आदमी पार्टी अब पूरा करती है.

2. एमसीडी चुनाव में जीतः आम आदमी पार्टी ने अब तक किसी भी चुनाव में बीजेपी शासित राज्य में जीत हासिल नहीं की थी. इसको लेकर बीजेपी प्रवक्ता आम आदमी पार्टी को काफी चिढाते थे. और कहते थे कि दिल्ली में विधानसभा चुनाव भले ही आप जीते हों लेकिन लोकसभा और एमसीडी हम ही जीतते हैं. इसे भी आम आदमी पार्टी ने तोड़ा और एमसीडी में पूर्ण बहुमत से आ गई.

3. देश में अरविंद केजरीवाल की पहचानः आम आदमी पार्टी दावा कर रही है कि अरविंद केजरीवाल अब ऐसे नेता हो गए हैं जिनके नाम पर पूरे देश में वो चुनाव लड़ रहे हैं और कई जगह जीते भी हैं. इसी को लेकर संजय सिंह ने कहा कि, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में गुजरात की जनता ने आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय दल बनाने का काम किया है. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में अब हम राष्ट्रीय दल हो गए हैं.

कोई पार्टी राष्ट्रीय कैसे बनती है?

राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए चुनाव आयोग की तीन शर्तों में से कोई एक पूरा करनी होती है. जो इस प्रकार हैं-

  • पहली शर्तः पार्टी तीन राज्यों के लोकसभा चुनाव में 2 फीसदी सीटें जीते.

  • दूसरी शर्तः चार लोकसभा सीटों के अलावा पार्टी लोकसभा में 6 फीसदी वोट हासिल करे.

  • तीसरी शर्तः चार राज्यों या उससे ज्यादा में पार्टी 6 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करे.

यही जो तीसरी शर्त है वो आम आदमी पार्टी ने पूरी कर ली है. दिल्ली और पंजाब में उनकी सरकार है, इसके अलावा गोवा और गुजरात में उन्होंने 6 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किया है. इसीलिए अरविंद केजरीवाल ने खुद को राष्ट्रीय पार्टी होने का दावा किया है.

राष्ट्रीय पार्टी होने का क्या फायदा है?

राष्ट्रीय पार्टी होने के कई फायदे हैं. पहला तो पूरे देश में आपका चुनाव चिन्ह आरक्षित हो जाता है. दूसरा लोकसभा चुनाव में उनके उम्मीदवारों को आकाशवाणी और दूरदर्शन पर स्लॉट मिल जाता है. इसके अलावा राष्ट्रीय पार्टी लोकसभा चुनाव में अधिकतम 40 स्टार प्रचारक रख सकती है, जिनका पैसा उम्मीदवारों के खर्च में नहीं जुड़ता है. इसके अलावा राष्ट्रीय पार्टियों के राष्ट्रीय अध्यक्षों को सब्सिडी पर सरकारी बंगला भी मिलता है और राजधानी में मुख्यालय बनाने के लिए जगह भी.

अभी देश में कितनी राष्ट्रीय पार्टियां हैं?

अगर नई राष्ट्रीय पार्टी बनी केसीआर की बीआरएस को भी इसमें जोड़ा जाये तो अब कुल 8 राष्ट्रीय पार्टियां देश में हो गई हैं और अगर आम आदमी पार्टी को भी मान्यता मिल जाती है तो राष्ट्रीय पार्टियों की संख्या 9 हो जाएगी.

ये हैं देश की राष्ट्रीय पार्टियां-

  1. बीजेपी

  2. कांग्रेस

  3. बहुजन समाज पार्टी

  4. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI)

  5. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (MCP)

  6. नेशलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP)

  7. तृणमूल कांग्रेस (TMC)

  8. बीआरएस

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