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सोनू सूद का केजरीवाल के करीब आना, क्या पंजाब में दिख रही AAP की संभावना?

Punjab में आम आदमी पार्टी के लिए क्या काम कर रहा है और क्या हैं चुनौतियां?

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सोनू सूद का केजरीवाल के करीब आना, क्या पंजाब में दिख रही AAP की संभावना?
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अभिनेता और कोरोना पीड़ितों की मदद के लिए काफी नाम कमा चुके साेनू सूद (Sonu Sood) ने 27 अगस्त को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) से मुलाकात की. कार्यक्रम दिल्ली सरकार का था जहां सरकार ने साेनू सूद को अपने चाइल्ड मेन्टॉरशिप प्रोग्राम का ब्रांड एम्बेसडर नियुक्त किया. यह सबकुछ दिल्ली में हुआ, लेकिन पंजाब चुनाव को ध्यान रखकर देखें तो यह एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम हो सकता है. सूद मूलत: पंजाब के मोगा से संबंध रखते हैं.

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पिछले साल कोविड (Covid-19) लॉकडाउन के दौरान प्रवासियों की मदद करने के बाद साेनू सूद की लोकप्रियता काफी बढ़ी है. उन्होंने परोपकारी के तौर पर देश ही दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनाई है. लिहाजा हर कोई उनको अपनी ओर करना चाहता है. आम आदमी पार्टी (AAP) पहली ऐसी पार्टी नहीं है जो सोनू को अपनी तरफ कराना चाहती है. पंजाब की मौजूदा कांग्रेस सरकार ने भी साेनू सूद को राज्य के कोविड टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा बनाकर अपने साथ जोड़ने का काम किया है.

चुनावी माहौल देखें तो लगता है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह की मौजूदा सरकार के साथ-साथ शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ प्रदेश के वोटर्स में नाराजगी है. जिसका फायदा AAP को मिलता दिख रहा है. आम आदमी पार्टी इसका फायदा उठाकर उभरती हुई दिख रही है.

इस सप्ताह एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला था. जब शिअद के पूर्व नेता सेवा सिंह सेखवां ने 26 अगस्त, गुरुवार को आप का दामन थाम लिया था.

मूलत: गुरुदासपुर से संबंध रखने वाले सेखवां के आने से माझा क्षेत्र में आम आदमी पार्टी की मजबूती बढ़ने की संभावना है. गुरप्रीत सिंह 'घुग्गी' और सुच्चा सिंह छोटेपुर जैसे पूर्व शीर्ष नेताओं के बाहर निकलने के बाद पार्टी पहले यहां तुलनात्मक तौर पर कमजोर दिख रही थी.

यह आर्टिकल तीन सवालों के जवाब देने का प्रयास करेगा

  1. आम आदमी पार्टी के लिए क्या कुछ काम कर रहा है या पक्ष में क्या है?

  2. यह किन कमियों या कमजोरियों का सामना कर रही है?

  3. AAP के लिए आगे क्या?

1. आम आदमी पार्टी के लिए क्या कुछ काम कर रहा है या पक्ष में क्या है?

रिपोर्टर ने पिछले एक महीने में पंजाब के तीनों क्षेत्रों के छह जिलों का दौरा किया और उसने पाया कि कांग्रेस, अकाली दल और भाजपा के खिलाफ वहां असंतोष का माहौल है.

वहीं के लोगों के बीच से एक वोटर ने कहा कि "बादल और कप्तान दोनों ने कुछ नहीं किया है, झाडू (AAP का चुनाव चिह्न) को एक मौका देना चाहिए."

मालवा क्षेत्र में खासतौर पर किसानों के बीच AAP के पक्ष में जबदस्त महौल है. यहां AAP सबसे मजबूत दिख रही है. पंजाब में जब से आम आदमी पार्टी की इंट्री हुई है. तब से पार्टी के प्रभाव का यह मुख्य क्षेत्र रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में जीती गई सभी चार सीटें इसी क्षेत्र से थीं और 2017 के विधानसभा चुनाव में जीती गई 90 प्रतिशत सीटें भी मालवा से ही मिली थीं.

वहीं 2019 लोकसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन आश्चर्यजनक तौर पर देखने मिला. पार्टी का आधार ही डगमगा सा गया था. 2019 चुनाव में पार्टी ने महज एक सीट जीती और निकाय चुनावों में पार्टी तीसरे स्थान पर रही.

यह महत्वपूर्ण है कि अमृसर जैसे शहर में भी आम आदमी पार्टी मजबूत दिख रही है. कुछ जगह पर पार्टी को बढ़त मिलती हुई दिख रही है. यहां एक विकल्प के रूप में AAP के उभरने की प्रमुख वजह कांग्रेस और शिअद के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर और अकालियों की पार्टी से नाता तोड़ने के बाद बीजेपी का कमजोर होना है.

'बिजली गारंटी' और विशेष रूप से उच्च बिजली दरों के खिलाफ AAP के अभियान को मतदाताओं के बीच अच्छा खासा रिस्पांस मिल रहा है.

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2. AAP के सामने कौन सी बाधाएं हैं?

माझा और दोआबा

माझा क्षेत्र में आने वाले अमृतसर शहर के कुछ हिस्सों में आम आदमी पार्टी ने भले ही अपनी पैठ जमा ली है. लेकिन माझा और दोआबा क्षेत्र पार्टी के लिए समस्या बने हुए हैं.

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस क्षेत्र में पॉलिटिकल वैक्यूम यानी राजनीतिक शून्यता है. कैडर स्ट्रेंथ और संसाधनों के मामले में आम आदमी पार्टी कांग्रेस और शिअद से कमजोर है. मालवा के कुछ हिस्सों जैसे फिरोजपुर और फाजिल्का में भी यही स्थिति है.

हालांकि सेवा सिंह सेखां के आने से पार्टी माझा क्षेत्र में सुधार की उम्मीद कर रही है.

हिंदू चेहरा

अतीत में झांककर देखने हम हम पाते हैं कि पंजाब के ज्यादातर हिंदू वोटर्स ने कांग्रेस या बीजेपी को वोट देना पसंद किया है. पंजाब चुनावों में इस वर्ग का वोट अक्सर निर्णायक साबित हुआ है.

2017 में खालिस्तान समर्थकों का साथ मिलने की अफवाहों के कारण आम आदमी पार्टी के प्रति लोगों के विश्वास में कमी आई थी. इस समस्या का सामना भी पार्टी को करना पड़ा था.

इन अफवाहों का कोई आधार नहीं था. लेकिन मौर मंडी में विस्फोट के बाद हिंदू वोटर्स के वोट में बड़े पैमाने पर आया बदलाव कांग्रेस की बड़ी जीत की ओर इशारा करता है. इसी तरह 2019 चुनाव में इस वर्ग के वोटों में आए बदलाव की वजह से गुरुदासपुर और होशियारपुर में बीजेपी ने जीत हासिल की थी.

आम आदमी पार्टी इस नुकसान की भरपाई में लगी है, लेकिन एक मजबूत स्थानीय हिंदू चेहरे के अभाव में उसे इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है.

आम आदमी पार्टी ने पूर्व आईजी कुंवर विजय प्रताप सिंह को प्रमुखता दी है. एक महत्वपूर्ण हिंदू बहुल सीट अमृतसर उत्तर से उनके चुनाव लड़ने की संभावना है. हालांकि कुंवर विजय प्रताप सिंह मूलत: बिहार से आते हैं और पूरे पंजाब में उन्हें एक हिंदू नेता के रूप में नहीं देखा जाता है.

कुंवर विजय प्रताप सिंह को बढ़ावा देने की वजह अमृतसर उत्तर से बीजेपी के पूर्व विधायक और शहर के एक प्रमुख हिंदू नेता अनिल जोशी भी हैं जो शिअद की ओर हो गए हैं. जोशी और कुंवर प्रताप का विवाद तब से है जब सिंह अमृतसर में तैनात थे. अब एक बार फिर चुनाव में दोनों का आमना-सामना होने की संभावना है.

इनमें से कांग्रेस के पास मजबूत हिंदू प्रतिनिधित्व दिख रहा है. कांग्रेस के पास ब्रह्म मोहिंद्रा, भारत भूषण आशु, विजय इंदर सिंगला, अरुणा चौधरी, ओपी सोनी, एसएस अरोड़ा, पूर्व पीसीसी प्रमुख सुनील जाखड़ और मनीष तिवारी जैसे सांसद प्रमुख हिंदू चेहरों के तौर पर मौजूद हैं.

AAP के पास सुनाम विधायक अमन अरोड़ा जैसे कुछ नेता हैं, लेकिन इन्हें अभी भी पंजाब में एक बड़े पैमाने पर जाट सिख बहुल पार्टी के रूप में देखा जाता है.

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दलित प्रतिनिधित्व

पंजाब की मुख्य पार्टियों में दलित प्रतिनिधित्व का बड़ा संकट दिखाई देता है. शिअद बहुजन पार्टी (बसपा) के साथ गठबंधन कर इसकी भरपाई करने की कोशिश कर रही है. AAP अपने सबसे प्रमुख दलित चेहरे, विपक्ष के नेता हरपाल सिंह चीमा को पेश करके इस वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रही है.

हालांकि पंजाब में दलितों- रविदासी, बाल्मीकि और महजबी अभी तक किसी भी प्रमुख दलों के बारे में आश्वत नहीं हैं. इस वजह से आम आदमी पार्टी को इस वर्ग को अपनी ओर करने के लिए काफी मशक्कत करनी होगी.

मुख्यमंत्री चेहरा

आम आदमी पार्टी ने अभी तक पंजाब में मुख्यमंत्री के चेहरे की घोषणा नहीं की है. पार्टी कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग यह मांग कर रहा है कि संगरूर के सांसद और AAP के प्रदेश अध्यक्ष भगवंत मान को पहले ही मुख्यमंत्री के रूप में पेश किया जाए.

मान के पास मजबूत पक्ष यह है कि वे पार्टी के प्रति वफादार रहे हैं. यहां तक ​​कि गुरप्रीत घुग्गी, एचएस फूलका, सुखपाल खैरा जैसे अन्य शीर्ष नेताओं ने साथ छोड़ दिया.

भगवंत मान 2019 लोकसभा चुनाव में संगरूर से जीतकर पार्टी के एकमात्र सफल उम्मीदवार बने थे. एक जाट सिख होने के नाते, वह हरपाल चीमा जैसे किसी की भी तुलना में पार्टी के प्राइमरी सपोर्ट बेस यानी प्राथमिक आधार की श्रेणी में भी आते हैं.

हालांकि आम आदमी पार्टी खुले तौर पर मान को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने में थोड़ी चुप्पी बरत रही है.

शायद पार्टी को डर है कि कहीं चुनाव मान, नवजोत सिद्धू/कप्तान अमरिंदर सिंह और सुखबीर बादल के बीच व्यक्तित्व प्रतिस्पर्धा में न सिमट जाए. आम आदमी पार्टी सत्ता विरोधी लहर यानी एंटी इंकम्बेसी का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाना चाहती है.

पहले से मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं करना एक स्मार्ट रणनीति नहीं है और यह आम आदमी पार्टी की संभावनाओं के साथ-साथ कांग्रेस और शिअद से मुकाबला करने की उसकी गंभीरता पर भी सवाल उठा सकता है.

3. आगे क्या?

'भावना' को 'जीतने की क्षमता' में बदलने की सबसे बड़ी चुनौती AAP के सामने रही है. 2017 के चुनावों में भी इलेक्शन से छह महीने पहले किए गए सर्वे ने AAP की जीत की भविष्यवाणी की थी, लेकिन कई सीटों पर वह अपने पक्ष में भावनाओं को भुनाने में नाकाम रही.

इस चुनाव में एक प्रमुख एक्स फैक्टर कांग्रेस के भीतर चल रही अंदरुनी खींचतान का है.

अगर कांग्रेस नवजोत सिद्धू को अपना सीएम कैंडिडेट बनाती है, तो यह बात राजनीतिक समीकरण बदल सकती है.

सिद्धू की अपील, आम आदमी पार्टी की तरह ही है कि वे बादल और कैप्टन जैसे राजनेताओं से "अलग" हैं, जो पंजाब की राजनीति पर हावी हैं.

यदि सिद्धू मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं बनते हैं और AAP समय पर मुख्यमंत्री चेहरा पेश नहीं करती है, तो यह पार्टी के बाद के उठाव को बाधित कर सकता है.

हालांकि, AAP की तरह सिद्धू को भी हिंदू मतदाताओं की कुछ बेरुखी का सामना करना पड़ रहा है. कैप्टन ने 2017 में इस वर्ग की जिस तरह से विश्वसनीयता हासिल की थी, वैसी पंसद सिद्धू को नहीं मिल रही है.

नेतृत्व के मुद्दे पर किसी भी मामले में कांग्रेस का फैसला राज्य की राजनीति में मंथन को मजबूर कर सकता है.

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