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बिहार जातीय सर्वे भारत की राजनीति में 3 कारणों से गेमचेंजर, लेकिन राह आसान नहीं

बिहार जाति जनगणना के महत्वपूर्ण होने के तीन कारण हैं . क्या यह हिंदुत्व राजनीति का मुकाबला कर सकता है?

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बिहार सरकार ने 2 अक्टूबर को राज्य में जातिगत सर्वे का डाटा (Bihar Caste Census) रिलीज कर दिया. यह सर्वे इसी साल हुआ था. यह निस्संदेह बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार की अहम जीत मानी जाएगी, जिसने इसके लिए कोर्ट में लड़ाई लड़ी.

जातीय सर्वे से बिहार में जाति का श्रेणी-वार विवरण इस तरह से सामने आता है.

  • पिछड़ी जाति: कुल आबादी का 27.13%

  • अति पिछड़ी जाति: 36.01%

  • SC: 19.65%

  • ST: 1.68%

  • अनारक्षित: 15.52%

इस लेख के जरिए हम नीचे के कुछ सवालों के जवाब तलाशेंगे.

  • यह सर्वे क्यों महत्वपूर्ण है?

  • क्या यह भारतीय राजनीति में गेमचेंजर बन सकता है?

यह सर्वे क्यों महत्वपूर्ण है? इसके तीन बड़े कारण हैं.

सामाजिक न्याय की राजनीति में मददगार

"जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी"- यह सामाजिक न्याय की राजनीति का एक अहम सिद्धांत है, जिसे कांशीराम ने दिया था, अब इस सर्वे से इस तरह की दावेदारी को दम मिलता है. इसे इस तरह से समझते हैं...

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अभी कोई भी बड़ी राजनीतिक पार्टी जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ नहीं है.

यहां तक कि अब RSS ने भी आरक्षण पर अपना स्थापित रुख बदलते हुए इस पर पुर्नविचार करने के इशारे दिए हैं. निश्चित तौर पर, RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि "लोगों को 200 साल तक अभी आरक्षण का समर्थन करना होगा क्योंकि जो जातीय भेदभाव ऐतिहासिक तौर पर हुए हैं, उसे इसी तरह दूर किया जा सकता है.

जो भी पार्टी आरक्षण का समर्थन करती है, अब इस बात से इनकार नहीं कर सकती है कि आबादी का जो हिस्सा है, उसका प्रतिनिधित्व आरक्षण में मिलना चाहिए. यह राजनीतिक और तार्किक रूप से भी समझदारी की बात है.

अगर कोई पार्टी इसका विरोध कर रही है, उसका मतलब यह होगा कि वो 15 परसेंट की आबादी वाले सामान्य जाति के लोगों के लिए 50 परसेंट आरक्षण का पक्षधर है.

अब, बिहार सर्वे के सामने आ जाने के बाद विपक्षी पार्टियों के पास राष्ट्रव्यापी जातीय जनगणना की मांग करने का बेहतर मौका होगा.

  • सुप्रीम कोर्ट ने अभी जो शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों 50 परसेंट का अपर कैप लगा रखा है, उसे हटाने की मांग तेज की जा सकेगी.

  • जातिगत सर्वे के आधार पर अब इसका ओवरऑल प्रतिनिधित्व होना चाहिए.. इसका मतलब निश्चित तौर पर यह होगा कि OBC कोटा को बढ़ाना. शायद SC, ST का कोटा बढ़ाने पर भी विचार करना पड़ेगा.

  • OBC आरक्षण को विधायिकाओं में भी बढ़ाना होगा.

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2. कमंडल पर फिर से भारी पड़ेगा मंडल या मंडल की राजनीतिक पकड़ेगी जोर

BJP को मंडल राजनीति का काउंटर करने और अपनी हिंदुत्व और सोशल इंजीनियरिंग का कॉकटेल तैयार करने में 25 साल लग गए.

हिंदू नैरेटिव वाली इस कहानी में BJP ने दूसरे कम दबंग OBC जातियों और छोटी-छोटी SC जातीय समूहों को अपने साथ मिलाया और पारंपरिक तौर पर OBC के झंडाबरदार रहे SP और BSP जैसी पार्टियों के खिलाफ उनको खड़ा किया.

SP, BSP जैसी पार्टियों को कुछ खास OBC जाति के नुमाइंदे की तरह पेश किया गया और साथ ही उन्हें मुस्लिमों का नेता दिखाया गया.

अगर जातीय सर्वे और कोटा में बढ़ोतरी आज की राजनीतिक हकीकत बन जाए तो अभी जो हिंदू वोटों की गुटबंदी '80 vs 20' का जो नैरेटिव है, वो पूरी तरह से उल्टा पड़ सकता है और यह एक बार फिर से कमंडल की राजनीति को पीछे रखकर मंडल को आगे कर सकता है.

इससे इस बात की अति संभावना है कि अलग-अलग जाति के दलित, आदिवासी और OBCs इस 80 परसेंट वाले में आ जाएंगे. हालांकि, यहां सबस बड़ा सवाल है कि क्या यह सच में संभव है ? हम उस पर बाद में बात करेंगे.

3. मुस्लिम समाज में भी जात-पात

जैसे ही जातीय सर्वे का डाटा रिलीज हुआ. हिंदुत्व समर्थक कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने इस मसले को लेकर तरह तरह की गलत सूचनाएं फैलाने लगे. इसमें यह दावे किए जा रहे थे कि जाति सर्वे हिंदू और मुस्लिम (कंसोलिडेशन) को तोड़ने के लिए किया गया.

यह बात सही नहीं है. सर्वे ने धार्मिक और जातीय दोनों ही तरह का डाटा दिया है.

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धार्मिका डाटा के हिसाब से बिहार की आबादी में कुल 82 परसेंट हिंदू है, जबकि मुसलमानों की संख्या 17.7 परसेंट है. हालांकि, जातीय सर्वे में हिंदू और मुस्लिम दोनों ही समाजों की गिनती जाति के आधार पर हुई है.

मोटा-मोटी बिहार के तीन चौथाई मुस्लिम OBC या EBC के अंदर आते हैं, जबकि एक चौथाई सिर्फ सामान्य कैटेगरी में आते हैं.

सर्वे साफ दिखाता है कि मुस्लिम समाज कई स्तरों पर बंटा हुआ है और हिंदुओं की तरह यहां भी कई जातियां हैं.

इस वजह से अब इस बात पर जोर बढ़ सकता है कि कि मुस्लिम समाज के भीतर OBC, EBC का प्रतिनिधित्व ज्यादा बढ़ाई जाए.

निश्चित तौर पर जब यह होगा तो मजहबी नफरत और हेट क्राइम OBC, EBC और सभी कैटेगरी की सामान्य मुस्लिमों के प्रति लगभग खत्म होना शुरू हो जाएगा लेकिन अगर सियासी नुमाइंदगी की बात करें OBC, EBC बैकग्राउंड से आने वालों मुस्लिमों की नुमाइंदगी काफी कम है.

क्या यह राजनीति का गेमचेंजर हो सकता है ?

सैंद्धांतिक तौर पर हां. इसके तीन कारण ऊपर बताए गए हैं लेकिन हकीकत में इसकी राह आसान नहीं रहने वाली है.

इस मुद्दे पर लोगों को एकजुट करने की 'INDIA' ब्लॉक की क्षमता पर बहुत कुछ निर्भर करेगा. यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिस पर केवल भाषणों और घोषणाओं से लामबंदी हो सके. बहुत सारे जमीनी काम की आवश्यकता होगी. यहां एक महत्वपूर्ण फैक्टर लीडरशिप का भी है.

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मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा के बाद वीपी सिंह उत्तर प्रदेश और बिहार में ओबीसी वोटों को एकजुट करने में सफल रहे, क्योंकि उन्हें मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार जैसे मजबूत ओबीसी नेताओं का समर्थन प्राप्त था.

हालांकि, वो उन राज्यों में अपनी जड़ें नहीं जमा सके, जहां ऐसे नेता नहीं थे या सामाजिक न्याय आधारित राजनीति का कोई मजबूत इतिहास नहीं था.

वर्तमान में, इंडिया ब्लॉक में ओबीसी नेताओं में नीतीश कुमार और भूपेश बघेल (कुर्मी), लालू प्रसाद, अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव (अहीर), जयंत चौधरी (जाट), अशोक गहलोत (माली), सिद्धारमैया (कुरुबा) एमके स्टालिन (वेल्लालर) की एक मजबूत कतार है.

फिर इंडिया एलायंस के तीन अहम राजनीतिक दलों का नेतृत्व दलितों के हाथ में है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, सीपीआई महासचिव डी राजा और वीसीके अध्यक्ष थोल थिरुमावलवन और झामुमो के प्रेसिडेंट शिबू सोरेन.

हालांकि, वर्तमान में इस मुद्दे पर 'INDIA' गठबंधन की एकजुटता की क्षमता में राज्य स्तर पर काफी भिन्नताएं हैं.

आइए राज्यवार देखें

बिहार

जाति सर्वे का अग्रणी बिहार 'INDIA' ब्लॉक के पीछे ओबीसी एकजुटता की सबसे मजबूत दावेदार वाले राज्य का प्रतिनिधित्व करता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि गठबंधन को वर्तमान में आरजेडी के कारण सबसे बड़ी प्रभावशाली ओबीसी जाति (यादव), जेडीयू के कारण गैर-प्रमुख ओबीसी के एक बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त है.

बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अपने 15 साल से अधिक समय में, नीतीश कुमार ओबीसी कुर्मी जाति से हैं लेकिन उन्होंने बड़ी मेहनत से गैर-प्रमुख ओबीसी जातियों का आधार तैयार किया है.

जब तक हिंदुत्व या राष्ट्रवादी लहर नहीं होगी, बीजेपी को बिहार में इंडिया ब्लॉक की बढ़त को तोड़ना मुश्किल हो सकता है.

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उत्तर प्रदेश

यहां बीजेपी गैर-प्रमुख ओबीसी को एसपी के खिलाफ करने में कामयाब रही है, जिसे प्रमुख ओबीसी यादव समुदाय और मुसलमानों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी के रूप में देखा जाता है. 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव कुछ हद तक यादव-मुस्लिम आधार से आगे निकलने में कामयाब रहे लेकिन गैर-यादव ओबीसी के बीच वह अभी भी बीजेपी से काफी पीछे हैं.

जाति जनगणना संभावित रूप से अखिलेश यादव को कम से कम अन्य ओबीसी समूहों को भी एकजुट करने में मदद कर सकती है. पार्टी को स्वामी प्रसाद मौर्य और नरेश उत्तम पटेल जैसे गैर-यादव ओबीसी नेताओं को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना होगा.

कर्नाटक

कर्नाटक एक और राज्य है, जहां जाति जनगणना 'INDIA' ब्लॉक को फायदा पहुंचा सकती है. सीएम सिद्धारमैया का राजनीतिक आधार गैर-प्रमुख ओबीसी, दलितों और अल्पसंख्यकों को जोड़ने में निहित है. JDS के साथ गठबंधन करके, बीजेपी ऊंची जातियों और दो प्रमुख किसान जातियों-लिंगायत और वोक्कालिगा को एकजुट करने की कोशिश कर रही है.

हरियाणा

यहां एक दिलचस्प मामला हो सकता है क्योंकि यहां कांग्रेस की राजनीति मुख्य रूप से जाटों और दलितों पर टिकी हुई है. जबकि गुज्जर, अहीर और सैनी जैसी ओबीसी जातियां मजबूती से बीजेपी के साथ हैं. जब तक कांग्रेस को जाट पार्टी के रूप में देखा जाएगा, तब तक इसे तोड़ना आसान नहीं होगा.

महाराष्ट्र

हरियाणा की तरह, यहां भी कांग्रेस और एनसीपी का आधार पारंपरिक रूप से प्रमुख कृषि समुदाय रहा है. इससे बीजेपी को ओबीसी के बीच विस्तार करने का मौका मिला. हालांकि, अब बीजेपी मराठों को लुभाने की कोशिश कर रही है और इस प्रक्रिया में उसने अपने ओबीसी आधार का एक हिस्सा अलग कर लिया है. यह देखना बाकी है कि ऐसे समय में जब मराठा आरक्षण का प्रश्न फोकस में है, जाति सर्वे महाराष्ट्र की सियासत में क्या उथलपुथल मचाता है?

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