बिहार के डिप्टी CM विवादों में, 5 साल में सिर्फ 1 ही साल बढ़ी उम्र

चुनावी हलफनामों में कभी 1 साल तो कभी 3 साल बढ़ती रही उम्र

Published
पॉलिटिक्स
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बिहार के डिप्टी CM विवादों में, 5 साल में सिर्फ 1 ही साल बढ़ी उम्र

बिहार के नए उप मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता तारकिशोर प्रसाद को अपनी ही उम्र का अंदाजा नहीं है. ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि खुद डिप्टी सीएम अपने पिछले चुनावी हलफनामों में कहते आए हैं. आलम ये है कि जब वो पहली बार 2005 में चुनाव जीते थे, तब उन्होंने अपनी उम्र 48 साल बताई थी, लेकिन पांच साल बाद जब दोबारा चुनाव लड़ा तो उनकी उम्र सिर्फ 1 ही साल बढ़ी. यानी 2010 में उन्होंने अपनी उम्र 49 साल बताई.

जब 5 साल में सिर्फ 1 ही साल बढ़ी उम्र

टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार के कटिहार से चार बार विधायक रह चुके तारकिशोर प्रसाद ने हर चुनावी हलफनामे में अपनी उम्र को लेकर अलग-अलग दावे किए हैं.

अब पांच साल में सिर्फ 1 साल उम्र बढ़ने के बाद बिहार के डिप्टी सीएम ने अगले चुनाव यानी 2015 के चुनावों में अपनी उम्र 52 साल बता दी. यानी पूरे पांच साल बीत जाने के बाद एक बार फिर विधायक साहब की उम्र में सिर्फ तीन साल का ही इजाफा हुआ.

अब कुछ पब्लिकेशंस इस पूरे मामले को लेकर चुटकी ले रहे हैं और कर रहे हैं कि ये तभी संभव है जब यहां आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी लगती हो. जिसके मुताबिक, अगर कोई अंतरिक्ष यात्री प्रकाश की गति से ट्रैवल करता है तो उसके लिए समय की रफ्तार काफी धीमी हो जाती है, यानी उस अंतरिक्ष यात्री की उम्र बाकी लोगों के मुकाबले कम होगी.

अब आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं डिप्टी सीएम तारकिशोर प्रसाद के चौथे चुनाव की, यानी साल 2020 का चुनाव. अब इस चुनावी हलफनामे के मुताबिक डिप्टी सीएम साहब की उम्र ने अचानक से रफ्तार पकड़ ली और जहां वो 2015 में सिर्फ 52 साल के थे, वहीं पांच साल बाद 2020 में 64 साल के हो गए. यानी पांच साल में तारकिशोर प्रसाद की उम्र 12 साल बढ़ गई.

डिप्टी सीएम ने लगाए विपक्ष पर आरोप

टेलीग्राफ से बातचीत में बिहार के डिप्टी सीएम ने कहा कि उम्र का कोई मुद्दा नहीं है. उनके 10वीं के प्रमाण पत्र में उनकी जन्मतिथि 5 जनवरी 1956 है और वो इसी को अपनी उम्र मानते हैं. उन्होंने कहा कि अपनी असली उम्र छिपाने के पीछे उनका कोई कारण नहीं है. यहां तक कि तारकिशोर प्रसाद ने आरोप लगाया कि उनके विपक्षी दलों ने उनके चुनावी हलफनामों के साथ छेड़छाड़ की है. हालांकि हर बार उम्मीदवार खुद अपना चुनावी हलफनामा भरकर चुनाव अधिकारियों को देता है.

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