महाराष्ट्र की MVA सरकार में कांग्रेस को गुस्सा क्यों आता है?

शिवसेना क्यों दे रही कांग्रेस को मुफ्त की नसीहत?

शिवसेना और कांग्रेस में कहां गड़बड़ है?
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महाराष्ट्र में सरकार गिरने के कई अटकलों के बीच महाविकास आघाड़ी ने एक साल पूरा कर लिया है. बीजेपी द्वारा तीन पहिए की ऑटो रिक्शा सरकार कहलाने के बावजूद अब तक का सफर ठीक ठाक रहा है. लेकिन पिछले कुछ महीनों से कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को शिवसेना से दी जा रही मुफ्त की नसीहत और एनसीपी की विस्तारवादी नीति कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रास नही आ रही. जिसके चलते अब जमीनी स्तर पर कांग्रेस में असंतोष देखने को मिल रहा है.

इसका ताजा उदाहरण है कांग्रेस के एक अहम पदाधिकारी द्वारा पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखी हुई चिट्ठी. मुंबई कांग्रेस महासचिव विश्वबंधु राय ने पार्टी की हालत बयान करते हुए चिट्ठी लिखी है. वे कड़े शब्दों में लिखते हैं,

“MVA सरकार में कांग्रेस महज एक सहयोगी दल बनकर रह गयी है. शिवसेना और एनसीपी कांग्रेस को दीमक की तरह कमजोर कर रही है. साथ ही मंत्रीपद पर बैठे कांग्रेस नेताओं का भी पार्टी को मजबूत बनाने में कोई योगदान नहीं है. यहां कांग्रेस अपने चुनावी वादे पूरे नहीं कर पा रही है. तो वहीं विपक्ष के साथ सहयोगी दल भी हमारी वोट बैंक में सेंध लगाकर पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं.”

इन बातों का संज्ञान लेकर दोनों पार्टियों को हिदायत देने की बात भी चिट्ठी में कही गई है.

हालांकि ये पहली बार नहीं है कि कांग्रेस ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई हो. कुछ दिनों पहले खुद कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी ने सीएम उद्धव ठाकरे को खत लिखकर कॉमन मिनिमम एजेंडे की याद दिलाई थी. एससी-एसटी समाज की योजनाओं के लिए कांग्रेस के मंत्रियों को पर्याप्त फंड देने की मांग की थी. जिसके बाद तुरंत ठाकरे सरकार हरकत में आते दिखी और आदिवासी विभाग के लिए निधि मंजूर किया गया.

शिवसेना क्यों दे रही कांग्रेस को मुफ्त की नसीहत?

2019 के विधानसभा चुनावों में 105 का बहुमत मिलने के बावजूद बीजेपी सत्ता से दूर रही. ये इसीलिए हो पाया क्योंकि शिवसेना और एनसीपी को कांग्रेस पार्टी का समर्थन मिला. सबसे कम सीटे होते हुए भी कांग्रेस को सत्ता में बराबरी का हिस्सा मिला. शायद इसी बात का एहसास शिवसेना कांग्रेस को हर पल दिलाना चाहती है.

कांग्रेस के बलबूते पर सत्ता टिकी होने के बाद भी शिवसेना कांग्रेस को उकसाने से नहीं चूक रही. जून में आए सामना के संपादकीय में कांग्रेस की तुलना एक किरकिराने वाली खटिया से करके खिल्ली उड़ाई गई. तो वहीं शारद पवार के जन्मदिन के मौके पर उन्हें यूपीए का नेतृत्व करने की चर्चा को संजय राउत ने हवा दे दी. जिस बात को खुद पवार और उनकी पार्टी के नेताओं ने नकारा. हाल ही में फिर एक बार सामना के जरिये कांग्रेस को कमजोर बताते हुए देश में बीजेपी को टक्कर देने के लिए सक्षम विपक्ष की कमी होने का कटाक्ष भी किया.

इन सभी निशानों के बाद कांग्रेस के राज्य स्तर के नेताओं ने भी आक्रामक रूप अख्तियार कर लिया. कांग्रेस की स्थापना दिवस के कार्यक्रम में कांग्रेस नेताओं ने शीर्ष नेतृत्व पर कोई बयानबाजी नहीं सही जाएगी ये साफ कर दिया. साथ ही वक्त पड़ने पर सत्ता को भी लताड़नी की चेतावनी मंत्री असलम शेख ने दी.

हालांकि आगामी मुंबई महानगर निगम के चुनावों पर नजर गड़ाए बैठी बीजेपी और एमएनएस इसी अनैसर्गिक गठबंधन के मुद्दे पर शिवसेना को निशाने पर लेने की लिए तैयार है. ऐसे में राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिवसेना का तेवर अपने जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना और हिंदुत्व वोट बैंक को बहलाने की कोशिश है.

क्या कांग्रेस कर रही है मसल फ्लेक्सिंग ?

बता दे कि MVA सरकार में मुख्यमंत्री पद शिवसेना के पास और ज्यादातर मलाईदार खाते एनसीपी के कोटे में बट चुकें है. प्रदेशाध्यक्ष बालासाहेब थोरात के पास राजस्व और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को पीडब्ल्यूडी मिलने के अलावा कांग्रेस के पलड़े में खास कोई पोर्टफोलियो नहीं आया. ऐसे में जमीनी कार्यकर्ताओं को सत्ता का लाभ दिलाना कांग्रेस नेताओं के लिए सिर दर्द बना हुआ है. इतना ही नहीं बल्कि एक साल होने के बाद भी कई कमिटी और महामंडल पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं. इसलिए सत्ता में होने के बावजूद पार्टी को फायदा ना होने की भावना कार्यकर्ताओं में है.

इसीलिए कुछ ही दिन पहले भिवंडी के कांग्रेस के पार्षदों ने एनसीपी में प्रवेश किया. तो दूसरी ओर एनसीपी की एक अंदरूनी मीटिंग में डिप्टी सीएम अजित पवार ने शिवसेना के साथ लंबे समय तक गठबंधन में रहना है, तो मिल जुलकर रहने की सूचना अपने पार्टी पदाधिकारियों को दी. सूत्रों की माने तो आने वाले निकाय चुनावों से महानगरपालिका के चुनावों में साथ लड़ने की तैयारी भी शिवसेना और एनसीपी ने कर ली है. इससे स्पष्ट हो रहा है कि गठबंधन की सरकार में कांग्रेस को ताक पर रखा जा रहा है.

ऐसे में आने वाले चुनावों के लिए अपनी ताकद बढ़ाने पर कांग्रेस पार्टी अब जोर दे रही है. 2014 से महाराष्ट्र में कांग्रेस का हो रहा पतन देखते हुए इस बार मिली अनअपेक्षित सत्ता कांग्रेस के लिए संजीवनी मानी जा रही है. ऐसे में इस सत्ता का फायदा पार्टी कैडर बढ़ाने में इस्तमाल करने के लिए कांग्रेस को तीखे तेवर दिखाना जरुरी है. पिछले पांच सालों में सत्ता में रहकर शिवसेना ने जो बिजेपी के साथ किया वही अब कांग्रेस शिवसेना और एनसीपी के साथ करेगी ऐसा जानकारों का मानना है.

दरअसल, कांग्रेस और एनसीपी ने कई सालों तक अघाड़ी की गठबंधन सरकार चलाई थी. दोनों पार्टियों के बीच कई बार नोकझोंक होती थी. लेकिन बावजूद उसके सत्ता में टिके रहने की सूझभूझ दोनों पार्टियों को अच्छी तरह से पता है. अब देखना ये होगा कि अलग विचारधारा की शिवसेना जैसे सहयोगी पार्टी के साथ ये ‘समझदारी’ कितने दिनों तक कारगर साबित होती है.

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