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Himachal: 43 साल में सबसे ज्यादा बारिश, हिमाचल में बाढ़, भूस्खलन, तबाही की वजह क्या?

Himachal Flood and Landslide: IPCC की छठी रिपोर्ट के अनुसार, भारत के हिमालय और तटीय क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं.

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हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) में कुदरत ने कहर बरपाया है. भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से जान-माल का खासा नुकसान हुआ है. प्रदेश में इस हफ्ते हुई तबाही में अब तक कम से कम 70 लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं 7500 करोड़ का अभी तक नुकसान हुआ है. यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है. हालांकि, इन सबके बीच सवाल है कि क्या ये सिर्फ प्राकृतिक आपदा है या फिर मानव निर्मित आपदा? भारी बारिश और भूस्खलन की असल वजह क्या है?

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1980 के बाद 2023 में सबसे ज्यादा बारिश

क्विंट हिंदी से बातचीत में मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के निदेशक डॉ. सुरेंद्र पाल ने बताया कि साल 1980 के बाद 2023 में ही सबसे ज्यादा बारिश हुई है. उन्होंने कहा कि 8 ऐसे जिले हैं जहां पर 100 सालों का रिकॉर्ड ब्रेक हुआ है. इस लिस्ट में ऊना जिला शामिल है. वैसे ही लाहौल स्पिति में 63 सालों के भारी बारिश का रिकॉर्ड टूटा है.

इसके साथ ही उन्होने कहा, "इस साल अब तक पूरे मॉनसून सीजन में 43% ज्यादा बारिश हुई है. इसमें सिरमौर, सोलन, शिमला, मंडी ऐसे जिले हैं जहां बाकि जिलों के अपेक्षा काफी अधिक बारिश हुई है. गौर करने वाली बात यह कि इस साल जुलाई में रिकॉर्ड ब्रेकिंग बारिश हुई है."

इतनी बारिश की क्या वजह है? इस सवाल का जवाब देते हुए वो कहते हैं,

"मॉनसून करंट और वेस्टर्न डिस्टरबेंस दोनों के एक साथ सक्रिय होने से पहाड़ी क्षेत्रों में यह तबाही हुई है. हमेशा मॉनसून में वेस्टर्न डिस्टरबेंस एक्टिव नहीं होता, लेकिन इस बार मानसून और वेस्टर्न डिस्टरबेंस दोनों एक साथ एक्टिव रहे. इस वजह से डबल इंजन करंट के कारण पहाड़ों पर तबाही हुई."

फ्लैश फल्ड पर बात करते हुए मौसम विज्ञान केंद्र शिमला के निदेशक ने कहा कि भारी बारिश के कारण थोड़े समय में नदी या नाले का जलस्तर बढ़ जाता है, जिसके कारण ऐसा होता है. अन्य कारणों के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि खराब जल निकासी लाइनों या पानी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित करने वाले अतिक्रमण के कारण भी ऐसा होता है.

इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की छठी रिपोर्ट के अनुसार, भारत के हिमालय और तटीय क्षेत्र जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं. हिमालय में, कम समय में अधिक बारिश होने का एक उल्लेखनीय पैटर्न है.

'खराब स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग'

हिमाचल के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य में इस हफ्ते हुई तबाही के लिए अंधाधुंध निर्माण कार्य को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा है कि "बिना नक्शे के गलत तरीके से बन रहे मकान" और "प्रवासी वास्तुकारों" के कारण प्रदेश को आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है.

"स्थानीय लोग बिना नक्शे का उपयोग किए घर बना रहे हैं. हाल ही में बनी इमारतों में जल निकासी की व्यवस्था बहुत खराब है. वो बिना यह जाने पानी बहा रहे हैं कि पानी कहीं और नहीं बल्कि पहाड़ियों में जा रहा है, जिससे यहां की स्थिति नाजुक हो रही है."
सुखविंदर सिंह सुक्खू, मुख्यमंत्री

राजधानी शिमला पर टिप्णणी करते हुए सीएम ने कहा, "शिमला डेढ़ सदी से भी अधिक पुराना शहर है और इसकी जल निकासी व्यवस्था उत्कृष्ट थी. लेकिन अब नालों पर इमारतें बन गई हैं. आजकल जो मकान गिर रहे हैं, वो स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग (Structural Engineering) के मानकों से नहीं गुजरे हैं. प्रवासी आर्किटेक्ट जिन्हें मैं 'बिहारी आर्किटेक्ट' कहता हूं, यहां आते हैं और फर्श पर फर्श बनाते हैं. हमारे पास स्थानीय राज मिस्त्री नहीं हैं.”

भविष्य में सख्त भवन निर्माण नियमों का संकेत देते हुए सीएम ने कहा, "

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) को सड़कों को चौड़ा करने के बजाए अधिक सुरंग बनाने की जरूरत है और इसके इंजीनियरों को पहाड़ों को अधिक वैज्ञानिक तरीके से काटने की जरूरत है."

राज्य के बुनियादे ढांचे को फिर से दुरूस्त करने को लेकर सीएम सूक्खू ने कहा, "भारी बारिश के कारण हुए भूस्खलन और बाढ़ में कम से कम 70 लोगों की जान गई है और 1,000 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हो गए हैं. हमें इस नुकसान से उबरने में एक करीब साल लगेगा. चार साल के भीतर हिमाचल प्रदेश आत्मनिर्भर बनकर दिखाएगा. और अगले 10 वर्षों के भीतर, यह देश का नंबर एक राज्य होगा."

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क्या जलविद्युत परियोजनाएं आपदा का कारण हैं?

द हिंदू में छपे आलेख में शिमला के पूर्व मेयर और अर्बन स्पेशलिस्ट तिकेंद्र सिंह पवार ने बताया है कि हिमाचल प्रदेश में बाढ़ के विनाशकारी प्रभाव का एक मुख्य कारण जलविद्युत परियोजनाओं (Hydroelectricity Project) का अनियंत्रित निर्माण भी है, जिसने मूलतः पहाड़ी नदियों को केवल धाराओं में बदल दिया है.

उन्होंने लिखा है कि नियोजित तकनीक, जिसे "रन ऑफ द रिवर" के रूप में जाना जाता है, पानी को पहाड़ों में खोदी गई सुरंगों के माध्यम से मोड़ती है और खुदाई की गई सामग्री (कचरा) को अक्सर नदी के किनारे फेंक दिया जाता है.

अधिक वर्षा या बादल फटने के दौरान, पानी नदी में वापस आ जाता है और अपने साथ डंप की गई गंदगी को भी ले जाता है. यह विनाशकारी प्रक्रिया पार्वती, ब्यास और सतलज जैसी नदियों के साथ-साथ कई अन्य छोटे जलविद्युत बांधों में भी देखने को मिल रहा है.

इसके अलावा, सतलज नदी पर 150 किलोमीटर तक लंबी सुरंगों की योजना बनाई गई है जिससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को काफी नुकसान हुआ है.
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कैसी है हाईवे की स्थिति?

5 अगस्त को, NHAI के क्षेत्रीय प्रमुख अब्दुल बासित ने स्वीकार किया है कि राज्य में प्राधिकरण की पहली परवाणू-सोलन परियोजना में कुछ "खामियां" थीं. राज्य सरकार की उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पिछले एक पखवाड़े में ही राजमार्ग पर लगभग दो दर्जन भूस्खलन की सूचना मिली है. इससे वाहनों को चंडीगढ़ और शिमला के बीच लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है.

पीएस प्रसाद, प्रधान वैज्ञानिक और किशोर कुमार, मुख्य वैज्ञानिक, भू-तकनीकी इंजीनियरिंग प्रभाग (CSIR-CRRI), नई दिल्ली द्वारा की गई विस्तृत जांच में, 67.0 से किमी 106.39 के बीच कुल 95 स्थानों की पहचान भूस्खलन/चट्टान गिरने की संभावना के रूप में की गई है और 18 स्थानों को गंभीर के रूप में सीमांकित किया गया है, जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है.

जानकारों का मानना है कि, आज का विकास मॉडल सार्वजनिक-निजी-भागीदारी (PPP) पर आधारित है और इन परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने पर फोकस रहता है. नतीजतन आवश्यक भूवैज्ञानिक अध्ययन और पर्वतीय इंजीनियरिंग कौशल दरकिनार कर दिए जाते हैं.

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रेवले की रिपोर्ट में क्या है?

उत्तर रेलवे की एक आंतरिक रिपोर्ट में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल, 120 साल पुराने कालका-शिमला रेल ट्रैक को "संकटग्रस्त" बताने के लिए सड़क निर्माण गतिविधि को जिम्मेदार ठहराया गया है.

रेलवे ने 96.6 किलोमीटर लंबे ट्रैक पर लगभग 135 जगहों पर क्षति के लिए NHAI को जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा है कि NHAI द्वारा राजमार्ग से ट्रैक की ओर नालों के अनियंत्रित निर्वहन और ढलानों को काटने के कारण ऐसा हो रहा है.

रेलवे के एक अधिकारी ने कहा, "हालांकि 35 स्थानों पर मरम्मत के बाद सोलन-शिमला खंड पर सेवा बहाल कर दी गई थी, लेकिन 14 अगस्त को बादल फटने से ट्रैक क्षतिग्रस्त होने के बाद इसे फिर से सेवा निलंबित कर दी गई."

अब तक कितने का हुआ नुकसान?

आपदा प्रबंधन के प्रमुख सचिव ओंकार चंद शर्मा ने बताया कि अभी तक 7,500 करोड़ रुपए के नुकसान का आकलन हमारे पास आ चुका है, यह बढ़ सकता है. हालांकि, CM सुक्खू ने समाचार एजेंसी PTI से बात करते हुए कहा कि हम पहले ही 10,000 करोड़ रुपये के अनुमानित नुकसान का अनुमान लगा चुके हैं.

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