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कानपुर कोरोना संकट: मौत के सरकारी और असली आंकड़ों में फर्क?

कानपुर से सांसद सत्यदेव पचौरी खुद डिप्टी सीएम को खत लिखकर बता रहे हैं कि बड़ी संख्या में कानपुर में मौतें हो रही हैं

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राज्य
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कोरोना वायरस से सबसे प्रभावित जिलों में से एक है कानपुर. कानपुर, वो जिला जहां से राज्य में कुछ मंत्री भी हैं लेकिन कोरोना का समाधान निकालने में कोई बड़ी पहल नहीं दिख रही. कानपुर से बीजेपी सांसद सत्यदेव पचौरी खुद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को खत लिखकर बता रहे हैं कि बड़ी संख्या में कानपुर में मौतें हो रही हैं. पचौरी का कहना है कि मरने वालों में से ज्यादातर ऐसे हैं जिन्हें सही से इलाज तक नहीं मिल पाया है. ऐसे लोग हॉस्पिटल के बाहर तो कभी एंबुलेंस या घर में दम तोड़ दे रहे हैं.

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‘हॉस्पिटल के बाहर एंबुलेंस में और घरों में हो रही लोगों की मौत’

सत्यदेव पचौरी का ये दर्द और ये अपील कानपुर में मौजूदा स्थिति की हालत बयां कर रहा है. ऐसे में क्विंट हिंदी ने भी ये जानने की कोशिश की है कि सरकारी आंकड़ों में जो मौत के आंकड़े दिखाए जा रहे हैं उससे जमीनी हकीकत कितनी अलग है.

कानपुर कोरोना संकट: मौत के सरकारी और असली आंकड़ों में फर्क?
सरकारी तंत्र के मुताबिक कानपुर में 1 अप्रैल 2021 से 5 मई 2021 तक 541 लोगों की मौत कोरोना वायरस से हुई है. वहीं श्मशान घाटों की बात करें तो अप्रैल महीने में कानपुर के भैरवघाट विद्युत शवदाह गृह में लगभग 1133 शवों का अंतिम संस्कार किया गया है.वहीं, भगवतदास घाट में 174 शवों का अंतिम संस्कार किया गया है.

पिछले 14 महीनों में संक्रमितों की मौत के आकड़ों और अप्रैल महीने में सिर्फ विद्युत शवदाह के आकड़े कुछ और ही बयां कर रहे हैं. दोनों विद्युत शवदाह गृह में 1300 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार किया जा चुका है.

श्मशान घाटों पर काम करने वाले लोग क्या बता रहे हैं?

कोविड-19 की दूसरी लहर में श्मशान घाटों पर बड़ी संख्या में शव अंतिम संस्कार के लिए पहुंच रहे थे. मृतकों के परिजनों को अंत्येष्टी स्थल पर चिता लगाने की जगह नहीं मिल रही थी.सूर्यास्त के बाद देररात तक शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा था.फिलहाल यह सिलसिला पहले की अपेक्षा थोड़ा कम है.लेकिन श्मशाम घाटों पर हुए अंतिम संस्कारों की कहीं कोई गिनती नहीं है.

श्मशान घाट के कर्मचारी क्या कहते हैं?

कानपुर के भैरव घाट में दाह संस्कार के नॉन कोविड के प्रमाण पत्र बनाने वाले राजू पंडा त्रिपाठी कहते हैं कि पूरे अप्रैल के महीने में हर रोज करीब-करीब 90 से 100 शव आते थे. किसी-किसी दिन 100 से भी ज्यादा 105 शव आए.

1 दिन में पूरी दाह संस्कार की कॉपी फुल हो जाती थी .1 कॉपी में 100 दाह प्रमाण पत्र बनाए जाते है. पहले हम लोग 3 से 4 लोग 30 से 35 दाह प्रमाण पत्र बना पाते थे. और जब से ये दोबारा कोविड आया है हम लोगों को पानी तक पीने को फुर्सत नहीं मिली.
राजू पंडा त्रिपाठी, दाह संस्कार प्रमाण पत्र तैयार करने वाले

जब हमने भैरव घाट में स्थित अंतिम संस्कार की सामग्री बेचने वाले एक दुकानदार से बात की तो कमोबेश यही बात वो भी कहते नजर आए. वो ये जरूरत बताते हैं कि पिछले 1-2 से हालत कुछ बेहतर है.

1,2 दिन से कुछ थोड़ा बहुत ठीक है लेकिन पिछले 1 महीने से रोजाना 90 से 100 कभी 105 ऐसे रोजाना डेड बॉडी नॉन कोविड में आती थी. कोविड के पहले 30 से 35 बॉडी पूरे महीने में आया करती थी.
दुकानदार, भैरवघाट

अपने तमाम रिपोर्ट्स में सरकारी आंकड़ों और जमीनी आंकड़ों के बीच अंतर देखा-सुना होगा. इसकी बड़ी वजह ये भी है कि कई लोगों को अस्पताल में दाखिल होने यहां तक टेस्ट कराने को भी नहीं मिला और उनकी मौत हो गई. ऐसे में ये नाम आंकड़ों में तो नहीं आ पाते लेकिन उनके परिरवारवाले जरूर एक अपने को खो देते हैं.

श्मशान घाट पर दाह संस्कार का प्रमाण पत्र बनाने वाले राजू पंडा कहते हैं कि कोविड और नॉन कोविड वाले शरीर में यहां कई बार अंतर समझ ही नहीं आता.

कई केस तो ऐसे आते हैं, जिनमें नॉन-कोविड बताकर अंतिम संस्कार कराने लोग तो आते हैं लेकिन परिवारवाले भी शव को हाथ लगाने को तैयार नहीं होते और जल्द से जल्द अंतिम संस्कार के लिए कहते हैं.
राजू पंडा त्रिपाठी, दाह संस्कार प्रमाण पत्र तैयार करने वाले
अब कानपुर के हेल्थ सिस्टम की बात करें तो अब भी पूरा महकमा मिलकर कोवि़ड और नॉन कोविड मरीजों को बेड, इलाज और ऑक्सीजन मुहैया कराता नहीं दिख रहा है. दर-दर भटकते कुछ मरीज तो अस्पताल के दहलीज पर जान गंवा चुके हैं.

इस व्यवस्था का एक उदाहरण देखिए सबसे बड़े अस्पतालों में नाम दर्ज कराने वाला कानपुर के हैलट हॉस्पिटल की प्रमुख अधीक्षक का हाल ही में एक वीडियो सामने आया, जिसमें डॉ ज्योति सक्सेना बताती दिख रही हैं कि हैलट हॉस्पिटल में 120 वेंटिलेटर हैं जिसमें 34 खराब हैं,86 चालू हैं. अगर बेड बढ़ा भी दे तो ऑक्सीजन नहीं पहुंच सकती है, वहां तक. उसके लिए सिलेंडर चाहिए लेकिन वह भी उपलब्ध नही है..ऐसे में डॉक्टर और जो कर्मचारी काम मे लगे हैं वह भी क्या करें.

ये महज कुछ उदाहरण हैं, कानपुर से कई ऐसे केस सामने आए, जिसने बता दिया कि जिले में हेल्थ सिस्टम को इलाज की जरूरत है, जिससे लोगों का बेहतर तरीके से इलाज हो सके.

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