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अंबेडकर ने आर्टिकल-370 का किया था विरोध?इतिहास तो ऐसा नहीं कहता...

मायावाती ने बाबा साहब अंबेडकर का जिक्र करते हुए आर्टिकल 370 हटाने का समर्थन किया है.

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वीडियो एडिटर: विवेक गुप्ता

‘जो सपना वल्लभ भाई पटेल का था, बाबा साहेब आंबेडकर का था, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का था, अटल जी और करोड़ों देशभक्तों का था, वो सपना अब पूरा हुआ है’
नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री
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इस तरह 8 अगस्त, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान कर दिया कि जम्मू-कश्मीर का स्पेशल स्टेट्स खत्म करके उनकी सरकार ने बाबा साहब अंबेडकर और कई बड़े-बड़े नेताओं का अधूरा सपना साकार कर दिखाया है. केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने अपने आर्टिकल में भी इसी नैरेटिव का बखान किया उनके मुताबिक भारतीय संविधान के जनक कहलाने वाले अंबेडकर जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 लगाए जाने के खिलाफ थे. यही नहीं, इसके बाद BSP सुप्रीमो मायावती ने भी यही राग अलापा.

मायावाती ने बाबा साहब अंबेडकर का जिक्र करते हुए आर्टिकल 370 हटाने का समर्थन किया था. तो क्या अंबेडकर वाकई आर्टिकल 370 के विरोधी थे? उस वक्त के बाबा अंबेडकर के बयानों पर गौर करें तो आज के नेताओं के बयान तथ्यों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते.

कश्मीर पर अंबेडकर के विचार

अंबेडकर के भाषण, राइटिंग, और पार्लियामेंट डिबेट साफ करते हैं कि वो कश्मीर मुद्दे का जल्द से जल्द हल चाहते थे, इसके लिए वो जनमत संग्रह के पक्ष में भी थे. अंबेडकर ने तो यहां तक कहा था कि विभाजन कश्मीर समस्या का सही समाधान है!

नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा देते हुए 10 अक्टूबर 1951 को संसद में अपने भाषण के दौरान अंबेडकर ने कहा था-

हिंदू और बौद्ध भाग भारत को दे दें और मुस्लिम भाग पाकिस्तान को, जैसा हमने भारत के साथ किया है. हमें वाकई कश्मीर के मुस्लिम बहुल हिस्से से कोई लेना-देना नहीं है. ये कश्मीर के मुस्लिमों और पाकिस्तान के बीच का मसला है, वो अपने हिसाब से इस मुद्दे का हल निकाल सकते हैं.

उन्होंने खासतौर से कश्मीर के एक भाग में जनमत संग्रह की वकालत की और कहा-

…अगर आप चाहें तो पूरे इलाके को तीन भागों में बांट दें – सीजफायर जोन, घाटी और जम्मू-लद्दाख क्षेत्र, जनमत संग्रह सिर्फ घाटी में करवाएं, मुझे डर है कि अगर पूरे इलाके में जनमत संग्रह कराया गया, तो कश्मीर के हिन्दू और बौद्ध बहुल इलाकों को भी उनकी मर्जी के खिलाफ पाकिस्तान में शामिल होना पड़ेगा. उस हालत में हमें उसी समस्या का सामना करना पड़ेगा, जो हम पूर्वी बंगाल में कर रहे हैं.
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यानी, आर्टिकल 370 के समझौते के फॉर्मूला के हिसाब से अंबेडकर कश्मीर के एक हिस्से को भारत में मिलाना चाहते थे लेकिन 'मुस्लिम बहुल हिस्से को पाकिस्तान को दें' देना चाहते थे और ये बात प्रधानमंत्री और मायावती के बयानों के बिलकुल विपरीत है, वजह साफ है कि क्यों नेहरू सरकार अंबेडकर की सलाह से सहमत नहीं थी.

अंबेडकर और आर्टिकल 370

सच्चाई ये है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि अंबेडकर आर्टिकल 370 के खिलाफ थे. आर्टिकल 370 पर अंबेडकर का बयान संसद में अप्रैल 1950 में Representation of People's Bill पर हुई, एक डिबेट में सुनने को मिलता है. जम्मू और कश्मीर के स्पेशल स्टेटस के बारे में अंबेडकर ने कहा-

संसद को रिप्रजेंटेशन से जुड़ा कोई फैसला लेने का अधिकार नहीं है.

उन्होंने ये भी कहा कि जम्मू-कश्मीर की सरकार का फैसला अंतिम है- “कश्मीर से जुड़े आर्टिकल की बात करें तो सिर्फ आर्टिकल 1 कहता है कि- कश्मीर भारत का हिस्सा है. उसी आर्टिकल के मुताबिक संविधान के दूसरे प्रोविजन को लागू करने का फैसला राष्ट्रपति करेंगे, अगर राष्ट्रपति उचित समझें तो कश्मीर की सरकार से सलाह कर दूसरे प्रोविजन को बदलाव के साथ लागू कर सकते हैं.”

अब देखते हैं कि उपराष्ट्रपति नायडू और केंद्रीय मंत्री मेघवाल का क्या कहना है आर्टिकल 370 पर अंबेडकर के बयान के संदर्भ में? उन्होंने डॉक्टर अंबेडकर को ये कहते हुए कोट किया है – “आप चाहते हैं कि भारत कश्मीर की सुरक्षा करे, वहां के निवासियों को सुरक्षा दे और कश्मीरियों को पूरे भारत में समान अधिकार दे. लेकिन आप भारत और भारतवासियों को कश्मीर में सारे अधिकार नहीं देना चाहते, मैं भारत का कानून मंत्री हूं, मैं राष्ट्रीय हितों को इस प्रकार नजरंदाज नहीं कर सकता.”

दिलचस्प बात है कि ये कोट किसी आधिकारिक सरकारी बयान का हिस्सा नहीं है

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