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हिंदी के साइनबोर्ड पर कालिख पोतने वाले प्रदर्शनकारी किसान नहीं

पड़ताल में सामने आया वायरल तस्वीरें 3 साल पुरानी हैं, इनका किसान आंदोलन से कोई संबंध नहीं

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वीडियो एडिटर: आशुतोष भारद्वाज

सोशल मीडिया पर कुछ फोटो और वीडियो शेयर किए जा रहे हैं. इनमें देखा जा सकता है कि कुछ लोग हिंदी के साइनबोर्ड पर कालिख पोत रहे हैं. इन फोटो और वीडियो को सोशल मीडिया पर कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन से जोड़कर शेयर किया जा रहा है.

वेबकूफ की पड़ताल में सामने आया कि ये सभी वीडियो और फोटो पुराने हैं. जिनका किसान आंदोलन से कोई संबंध नहीं है.

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दावा

वीडियो के साथ शेयर किया जा रहा मैसेज है : “असली चेहरा अब सामने गया टावर तोड़ने के बाद अब पंजाब में हिंदी नही चलेगी. किसान आन्दोलन बहाना है हिन्दू और हिन्दू विरोध असली मकसद है.ये खालिस्तानी आंदोलन है, किसानों के भेष में आतंकी,उनके समर्थक हैं.”

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पड़ताल में हमने क्या पाया

वायरल हो रही फोटो और वीडियो 2017 से लेकर 2020 के बीच हैं. असल में ये फोटो पंजाब में हिंदी भाषा थोपे जाने के विरोध में चल रहे आंदोलन से जुड़ी हुई हैं. इनका किसान आंदोलन से कोई संबंध नहीं है.

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फोटोज को रिवर्स सर्च करने से हमें टाइम्स ऑफ इंडिया, हिंदुस्तान टाइम्स और द ट्रिब्यून की 2017 की कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यही फोटो मिलीं. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ एक्टिविस्ट साइनबोर्ड में हिदी और अंग्रेजी के नीचे पंजाबी लिखे होने को लेकर नाराज थे. इन एक्टिविस्ट ने ही साइनबोर्ड पर लिखे हुए नामों को मिटाया था.

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हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए पीडब्ल्यूडी को साइनबोर्ड बदलने के आदेश भी दिए थे.

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सितंबर 2020 का है वीडियो

वायरल वीडियो को की-फ्रेम में बांटकर गूगल पर रिवर्स सर्च करने से हमें लोकल तमिल चैनल की रिपोर्ट में यही वीडियो मिला. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पंजाब में हिंदी भाषा को थोपे जाने का जमकर विरोध हुआ था.

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तमिल चैनल की रिपोर्ट से क्लू लेकर हमने गूगल पर पंजाब में हुए हिंदी के विरोध से जुड़े अलग-अलग कीवर्ड सर्च किए. कीवर्ड सर्च करने से यही वीडियो हमें सितंबर 2020 की एक फेसबुक पोस्ट में मिला. ये पोस्ट ‘Stop Hindi Imposition’ नाम के फेसबुक पेज से पोस्ट की गई है.

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क्विंट ये पुष्टि नहीं करता है कि वायरल वीडियो असल में किस समय का है और इसमें दिख रहा शख्स कौन है. लेकिन, चूंकि वायरल वीडियो सितंबर 2020 में ही इंटरनेट पर आ चुका है, फोटोज भी 2017 की मीडिया रिपोर्ट्स से ली गई हैं. इसलिए ये साफ है कि वीडियो और फोटोज का हाल में चल रहे किसान आंदोलन से कोई संबंध नहीं है. सोशल मीडिया पर किया जा रहा दावा फेक है.

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